न्याय के मंदिर में जब व्यवस्था की सुस्ती पर सवाल उठते हैं, तो प्रशासनिक अमले में हड़कंपमच जाना लाजमी है। कुछ ऐसा ही नजारा इन दिनों पटना हाईकोर्ट में देखने को मिल रहा है, जहां अदालत के सख्त रुख के बाद बिहार सरकार के शीर्ष अधिकारियों की नींद खुली है। मामला राज्य की बेहद महत्वपूर्ण न्यायिक अकादमी (Judicial Academy) की सुरक्षा, सौंदर्यीकरण और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ा है। अदालत की तल्ख टिप्पणियों के बाद आखिरकार सरकार के बड़े अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से अदालत में हाजिर होना पड़ा और उन्होंने तय समय-सीमा के भीतर सभी पेंडिंग कार्यों को पूरा करने का लिखित आश्वासन दिया है।
अदालत के तीखे तेवर और प्रशासनिक हलचल
पटना हाईकोर्ट द्वारा न्यायिक अकादमी से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिखाए गए सख्त तेवरों का असर अब मैदानी स्तर पर दिखाई देने लगा है। कार्यवाहक मुख्य जस्टिस (Acting Chief Justice) सुधीर सिंह और जस्टिस राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ के समक्ष जब इस मामले की सुनवाई हुई, तो माहौल काफी गंभीर था। अदालत ने पिछली बैठकों में दिए गए आदेशों के अनुपालन में हो रही भारी देरी और प्रशासनिक सुस्ती पर गहरी नाराजगी जाहिर की थी।
न्यायालय का साफ मानना था कि न्यायिक अकादमी जैसा संवेदनशील और प्रतिष्ठित संस्थान, जहां भविष्य के न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जाता है, उसकी सुरक्षा और परिसर के आसपास के इलाके की व्यवस्था को लेकर इतनी लापरवाही क्यों बरती जा रही है? कोर्ट के इन्हीं तीखे सवालों और बढ़ते दबाव के चलते राज्य शासन को हरकत में आना पड़ा।
शीर्ष अधिकारियों को होना पड़ा व्यक्तिगत रूप से पेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए बिहार सरकार के कई वरिष्ठ और प्रमुख आईएएस अधिकारियों को अदालत में खुद उपस्थित होना पड़ा। सुनवाई के दौरान पर्यावरण एवं वन विभाग के अपर मुख्य सचिव आनंद किशोर, पथ निर्माण विभाग के सचिव पंकज कुमार पाल और नगर विकास विभाग के प्रधान सचिव विनय कुमार व्यक्तिगत रूप से कोर्ट रूम में मौजूद रहे।
सूत्रों और अदालती कार्रवाइयों के मुताबिक, पिछली सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष की तरफ से बिना पूरे रिकॉर्ड के महज मौखिक दलीलें पेश किए जाने पर बेंच ने कड़ी आपत्ति जताई थी। एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG-3) पीके वर्मा के एक हलफनामे में किए गए दावों की जब फाइल निकालकर पड़ताल की गई, तो संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड में नहीं मिले। इस पर अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि गंभीर मामलों में बिना पुख्ता दस्तावेजों के मौखिक बयानों के आधार पर सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकती। इसी कानूनी सख्ती का नतीजा था कि अगली सुनवाई में राज्य के शीर्ष नौकरशाहों को खुद कोर्ट में आकर स्थिति साफ करनी पड़ी।
30 नवंबर 2026 तक सभी कार्य पूरे करने का मिला आश्वासन
अदालत के कड़े तेवरों के बाद शासन के नुमाइंदों ने न्यायिक अकादमी परिसर और उसके आसपास चल रहे विकास, सुरक्षा तथा सौंदर्यीकरण कार्यों की पूरी समय-सीमा (Timeline) अदालत के समक्ष रखी। अधिकारियों ने पीठ को आश्वस्त किया कि आने वाले कुछ महीनों के भीतर यानी 30 नवंबर 2026 तक सभी अटके हुए प्रोजेक्ट्स को हर हाल में पूरा कर लिया जाएगा।
इन कार्यों में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
- अकादमी परिसर की सुरक्षा के लिए मजबूत बाउंड्री वॉल का निर्माण।
- महात्मा गांधी सेतु के नीचे के क्षेत्र का व्यापक सौंदर्यीकरण।
- परिसर के चारों ओर आधुनिक बाड़ लगाने (Fencing) का काम।
- पर्यावरण संतुलन और हरियाली के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण।
अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण पर थी गाज
इस पूरी कानूनी प्रक्रिया के पीछे की मुख्य वजह न्यायिक अकादमी के आस-पास फैला अतिक्रमण और अवैध निर्माण था। पिछली सुनवाइयों में कोर्ट ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई थी कि प्रतिष्ठित संस्थान के चारों तरफ अवैध कब्जे बढ़ रहे हैं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। अदालत ने शहरी विकास विभाग को इस मामले में विशेष रूप से पक्षकार बनाते हुए एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया था।
कोर्ट की मंशा थी कि केवल कागजी घोड़े दौड़ाने के बजाय जमीन पर ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि अकादमी परिसर में आने-जाने वाले न्यायाधीशों, प्रशिक्षुओं और गणमान्य लोगों की सुरक्षा में कोई सेंध न लगा सके।
निगरानी के लिए वकील को सौंपी गई जिम्मेदारी
सिर्फ प्रशासनिक आश्वासनों पर भरोसा करने के बजाय पटना हाईकोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग के लिए एक पुख्ता तंत्र तैयार किया है। अदालत ने याचिकाकर्ता के योग्य अधिवक्ता पीयूष लाल को इन तमाम निर्माण और सौंदर्यीकरण कार्यों की निगरानी (Monitoring) करने की अहम जिम्मेदारी सौंपी है।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि कार्य के दौरान किसी भी स्तर पर कोई प्रशासनिक अड़चन या लापरवाही सामने आती है, तो अधिवक्ता महोदय बिना किसी संकोच के सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इसके साथ ही, न्यायिक अकादमी के निदेशक को भी यह निर्देश दिया गया है कि वे अलग-अलग विभागों (जैसे पथ निर्माण, वन विभाग और नगर विकास) के बीच आपसी तालमेल (Coordination) स्थापित करें ताकि तय समय-सीमा के भीतर हर हाल में काम पूरा हो सके।
कानून और व्यवस्था पर जनता की नजर
बिहार के इस चर्चित कानूनी घटनाक्रम पर अब आम जनता और कानूनी गलियारों की पैनी नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक न्यायपालिका इस प्रकार की प्रशासनिक शिथिलता पर खुद डंडा नहीं चलाती, तब तक सरकारी फाइलों में योजनाओं का आगे बढ़ना मुश्किल होता है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या निर्धारित डेडलाइन यानी 30 नवंबर 2026 तक न्यायिक अकादमी की सुरक्षा और सौंदर्यीकरण का यह पूरा खाका जमीन पर उतर पाता है या एक बार फिर मामला तारीखों में उलझ कर रह जाता है।