महामारी के उस दौर को याद करके आज भी रूह कांप जाती है, जब अपनों को बचाने के लिए लोग दर-दर भटक रहे थे। अस्पतालों में बिस्तरों की कमी और ऑक्सीजन के लिए संघर्ष के बीच कई परिवारों ने अपने कमाने वाले सदस्यों को हमेशा के लिए खो दिया। सरकार ने ऐसे प्रभावित परिवारों की मदद के लिए सहायता राशि यानी अनुग्रह अनुदान का ऐलान किया था, ताकि इन टूटे हुए परिवारों को कुछ आर्थिक संबल मिल सके। लेकिन, इस मदद को पाने के लिए भी कई लोगों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़े। ताजा मामला बिहार से जुड़ा है, जहां एक विधवा महिला को उसका हक दिलाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
अदालत का कड़ा रुख: तकनीकी अड़चनें मानवीय मदद के आड़े नहीं आ सकतीं
पटना उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि केवल कागजी औपचारिकताओं या तकनीकी कमियों के आधार पर किसी जरूरतमंद को कोविड मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि अस्पताल द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्र में संक्रमण से मौत की पुष्टि होती है, तो RT-PCR रिपोर्ट न होने को आधार बनाकर किसी का दावा खारिज करना पूरी तरह से अनुचित है।
यह फैसला न्याय की आस लगाए बैठी उन तमाम महिलाओं और परिवारों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है, जिन्हें सिर्फ इसलिए सरकारी सहायता नहीं मिल पा रही थी क्योंकि उनके पास कोरोना की पॉजिटिव टेस्ट रिपोर्ट नहीं थी। न्याय मूर्ति ने व्यवस्था दी है कि राज्य तंत्र का उद्देश्य नागरिकों की मदद करना होना चाहिए, न कि नियमों का हवाला देकर उन्हें उनके वाजिब हक से दूर करना।
क्या था पूरा मामला? जानिए जमीनी हकीकत
यह पूरा कानूनी संघर्ष आशा देवी नाम की महिला की लंबी लड़ाई का नतीजा है। उनके पति अजय कुमार शर्मा का निधन 21 मई 2021 को मुंगेर के एक निजी अस्पताल (सिटी क्रिटिकल हॉस्पिटल) में इलाज के दौरान हो गया था। उस समय कोरोना की दूसरी लहर अपने चरम पर थी और स्वास्थ्य तंत्र पर भारी दबाव था। अस्पताल की ओर से जारी किए गए आधिकारिक मृत्यु प्रमाण पत्र में साफ तौर पर दर्ज किया गया था कि अजय कुमार शर्मा की मौत कोविड-19 के कारण हुई है।
पति की मौत के बाद दुखों का पहाड़ झेल रही आशा देवी ने सरकार द्वारा घोषित कोविड सहायता राशि के लिए आवेदन किया। हैरानी की बात यह है कि शुरुआती स्तर पर प्रक्रिया आगे बढ़ी और जिला प्रशासन के स्तर पर जारी एक मेमो (संख्या 299, दिनांक 20 मार्च 2023) के जरिए उनका नाम कोविड मृतकों की आधिकारिक सूची में शामिल भी कर लिया गया। इतना ही नहीं, उनके नाम पर राशि भी आवंटित कर दी गई, लेकिन इसके बावजूद भुगतान के नाम पर फाइलें अटकी रहीं।
तीन सदस्यीय जिला स्वास्थ्य समिति का फैसला और अड़ंगे
जब लंबे समय तक मुआवजे की रकम खाते में नहीं पहुंची, तो पीड़ित महिला ने आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग और मुंगेर के जिला मजिस्ट्रेट (DM) के पास कई बार गुहार लगाई। अधिकारियों के चक्कर काटने के बाद मामले को तीन सदस्यीय जिला स्वास्थ्य समिति के पास भेजा गया।
समिति ने अजीबोगरीब तर्क देते हुए आशा देवी के दावे को यह कहकर खारिज कर दिया कि उनके पास कोरोना की पॉजिटिव RT-PCR रिपोर्ट मौजूद नहीं है। समिति का यह रवैया एक संवेदनशील मामले में पूरी तरह से संवेदनहीन और नौकरशाही की लकीर पीटने वाला साबित हुआ, जबकि हकीकत यह थी कि उस समय कई लोग बिना टेस्ट के ही गंभीर अवस्था में अस्पतालों में भर्ती हो रहे थे और इलाज के दौरान दम तोड़ रहे थे।
स्वास्थ्य विभाग के अपने ही नियमों का उल्लंघन
इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि खुद बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने पहले ही इस तरह की अड़चनों को दूर करने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए थे। स्वास्थ्य विभाग के पत्र संख्या 186(11) (दिनांक 9 मार्च 2022) में साफ तौर पर कहा गया था कि यदि किसी कारणवश पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड नहीं हो पाते हैं या कोरोना टेस्ट की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है, तो सिर्फ इस आधार पर किसी भी पात्र परिवार को सहायता राशि देने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
इसके बावजूद, स्थानीय स्तर के अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी करते हुए फाइल को दबाए रखा, जिसके चलते मजबूरन पीड़ित परिवार को अदालत की शरण लेनी पड़ी।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया गया हवाला
सुनवाई के दौरान अदालत ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के पूर्व के कई ऐतिहासिक फैसलों का भी जिक्र किया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि महामारी के दौरान यदि किसी व्यक्ति की मौत कोविड के लक्षणों या अस्पताल के प्रमाण पत्र के आधार पर हुई है, तो उसे कोरोना से हुई मौत ही माना जाएगा। कोविड सर्टिफिकेट या टेस्ट रिपोर्ट का अभाव इस बात का निर्णायक सबूत नहीं हो सकता कि मरीज को कोरोना नहीं था।
न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि जब अस्पताल का प्रमाण पत्र यह गवाही दे रहा है कि मौत का कारण संक्रमण था और जिला स्तर पर भी मृतक का नाम स्वीकृत सूची में दर्ज है, तो ऐसी स्थिति में केवल तकनीकी बहाने बनाकर मानवीय सहायता रोकना कानून और न्याय दोनों की नजरों में गलत है।
चार सप्ताह के भीतर भुगतान करने का सख्त निर्देश
पटना उच्च न्यायालय ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित जिला और प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे आदेश मिलने के चार सप्ताह के भीतर इस पूरे मामले पर नए सिरे से विचार करें। अदालत ने साफ कहा है कि बिहार कोविड सहायता योजना, 2022 के प्रावधानों के तहत पात्र अनुग्रह राशि का भुगतान बिना किसी देरी के पीड़िता के खाते में किया जाए।
इस फैसले के दूरगामी प्रभाव क्या होंगे?
- लाखों प्रभावितों को राहत: यह फैसला केवल एक मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उन हजारों परिवारों को कानूनी मजबूती मिलेगी जिनके कागजात किसी न किसी कारण से अधूरे रह गए थे।
- प्रशासनिक लापरवाही पर अंकुश: निचले स्तर के अधिकारियों और कमेटियों द्वारा मनमाने ढंग से दावे खारिज करने की प्रवृत्ति पर इससे लगाम लगेगी।
- न्यायपालिका में बढ़ा विश्वास: आम जनता का यह विश्वास और मजबूत हुआ है कि न्याय व्यवस्था हर हाल में मानवीय दृष्टिकोण को प्राथमिकता देती है।
यह फैसला उन तमाम सरकारी और प्रशासनिक मशीनरी के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि आपदा के समय नियमों की आड़ लेकर जनता के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। आशा देवी की यह कानूनी लड़ाई अंततः सत्य और न्याय की जीत के रूप में सामने आई है, जो आने वाले समय में ऐसे कई अन्य मामलों के लिए एक मजबूत मिसाल बनेगी।