अदालतों के गलियारों में आए दिन बच्चों की कस्टडी (Child Custody) को लेकर तमाम मुकदमे सुनने को मिलते हैं, लेकिन कई बार कुछ ऐसे फैसले आते हैं जो समाज के स्थापित मानदंडों और इंसानी जज्बातों को एक नई दिशा दे जाते हैं। पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court) ने हाल ही में एक ऐसा ही बेहद संवेदनशील और विचारणीय फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ लफ्जों में यह तल्ख टिप्पणी की है कि सिर्फ इसलिए कि एक पिता की आर्थिक स्थिति बेहतर है, उसे उस बच्चे की स्थायी कस्टडी का हकदार नहीं माना जा सकता, जिसे मां के आंचल की छांव की सबसे ज्यादा जरूरत है। एक पिता की तिजोरी की मजबूती कभी भी एक मां की ममता, दुलार और उसकी नैसर्गिक देखरेख का विकल्प नहीं बन सकती।
क्या है पूरा मामला?
यह कानूनी लड़ाई एक पांच साल के मासूम बच्चे की कस्टडी को लेकर थी। पारिवारिक कलह और मतभेदों के चलते माता-पिता अलग रह रहे थे। बच्चा अपने पिता के पास था, जो आर्थिक रूप से काफी संपन्न बताए जाते हैं। दूसरी ओर, बच्चे की मां एक साधारण जीवन व्यतीत कर रही हैं और उनके पास आय के बहुत सीमित साधन हैं। इसी आधार पर पिता ने निचली अदालत से लेकर उच्च न्यायालय तक यह दलील दी थी कि वह बच्चे को एक उच्च स्तरीय जीवन शैली, बेहतरीन शिक्षा और तमाम भौतिक सुख-सुविधाएं दे सकते हैं, जो कि मां अपने सीमित संसाधनों के साथ शायद नहीं कर पाएगी।
लेकिन उच्च न्यायालय ने पिता के इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कानून और समाज की नजरों में बचपन की परिभाषा सिर्फ पैसों की चमक-धमक से तय नहीं होती। एक बच्चे के समग्र विकास (Holistic Development) के लिए वित्तीय संपन्नता से कहीं ज्यादा जरूरी भावनात्मक सुरक्षा (Emotional Security) और मां का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन होता है, जिसकी भरपाई दुनिया की कोई भी दौलत नहीं कर सकती।अदालत की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी पहलू
- सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति महोदय ने गार्जियनशिप और वार्ड्स एक्ट (Guardianship and Wards Act) के प्रावधानों और बच्चों के कल्याण (Welfare of the Child) से जुड़े तमाम ऐतिहासिक फैसलों का बारीकी से अध्ययन किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब भी कस्टडी का विवाद अदालत के सामने आता है, तो उसमें सर्वोपरि पैमाना बच्चे का हित (Best Interest of the Child) होता है, न कि माता-पिता की हैसियत या अहंकार की लड़ाईभावनात्मक जरूरतें सर्वोपरि: पांच साल की उम्र एक ऐसी संवेदनशील अवस्था होती है, जहां बच्चे को अपनी मां के स्पर्श, उनकी लोरियों और ममता की सबसे अधिक आवश्यकता होती है। इस उम्र में भौतिक सुख-सुविधाएं गौण हो जाती हैं।
- आर्थिक स्थिति कोई पैमाना नहीं: अदालत ने कहा कि यदि मां के पास पैसों की कमी है, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि वह अपने बच्चे की परवरिश पूरी शिद्दत और जिम्मेदारी से नहीं कर सकती। भारतीय समाज में मां का त्याग और संघर्ष हमेशा से अतुलनीय रहा है।
पिता के विजिटेशन राइट्स सुरक्षित: बच्चे की मां को कस्टडी सौंपने के साथ-साथ अदालत ने पिता के अधिकारों का भी पूरा ध्यान रखा है। पिता को नियमित अंतराल पर बच्चे से मिलने और उसके साथ समय बिताने की छूट दी गई है, ताकि बच्चे को पिता के प्यार से भी वंचित न होना पड़े।बाल मनोविज्ञान और समाज पर इसका प्रभाव
मनोवैज्ञानिकों का भी यही मानना रहा है कि शुरुआती वर्षों में बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए मां की उपस्थिति सबसे अहम होती है। कई बार संपन्न परिवारों में बच्चों को सारे सुख मिल जाते हैं, लेकिन उन्हें वह आत्मीयता नहीं मिल पाती जिसकी एक छोटे बच्चे को तलाश होती है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का यह फैसला उन तमाम मामलों में एक मजबूत मिसाल पेश करेगा जहां अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर मांओं को केवल इस बिना पर उनके बच्चों से दूर कर दिया जाता है कि वे उनका खर्च उठाने में असमर्थ हैं।
इस फैसले ने एक बार फिर से इस बात पर मुहर लगा दी है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में मानवीय संवेदनाएं और बच्चों का भविष्य सबसे ऊपर है। कोर्ट का यह नज़रिया निश्चित तौर पर उन हजारों माताओं के लिए एक बड़ी राहत है जो कानूनी दांव-पेच और अपने पूर्व जीवनसाथी के आर्थिक दबाव के आगे खुद को लाचार महसूस कर रही थीं।निष्कर्ष
कानून की किताबों में भले ही धाराएं और उप-धाराएं लिखी हों, लेकिन जब बात बच्चों के बचपन और उनके भविष्य की आती है, तो अदालतें भी अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए न्याय की वास्तविक परिभाषा गढ़ती हैं। पांच साल के इस मासूम को उसकी मां की छांव वापस मिलना सिर्फ एक मां की जीत नहीं है, बल्कि उस ममता की जीत है जिसे दुनिया की कोई भी बैलेंस शीट खरीद नहीं सकती।