डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां एक कप चाय से लेकर बड़ी गाड़ियों की खरीद तक के लिए लोग जेब में कैश रखने के बजाय स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं, वहीं देश के दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पेमेंट सेक्टर में हलचल मचा दी है। भोपाल के ऐतिहासिक और व्यस्ततम बाजारों में शुमार चौक बाजार में बुधवार को एक अनोखा नजारा देखने को मिला। यहां के व्यापारियों ने यूपीआई (UPI) पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर (MDR) के विरोध में सड़क पर उतरकर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। इसे 'नो यूपीआई डे' नाम दिया गया था, जिसके तहत दुकानदारों ने 2 हजार रुपये से अधिक के डिजिटल भुगतान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
चौक बाजार में काले कपड़े से ढके गए क्यूआर कोड
विरोध प्रदर्शन का यह तरीका भी काफी अलग और सांकेतिक था। भोपाल के चौक बाजार की कई दुकानों पर सरेआम यूपीआई के क्यूआर (QR) स्कैनर पर काले कपड़े डाले हुए नजर आए। दुकानदारों ने साफ कर दिया कि जब तक इस अतिरिक्त शुल्क के प्रस्ताव को वापस नहीं लिया जाता, तब तक वे इस नीति के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करते रहेंगे। व्यापारियों का यह गुस्सा उस प्रस्तावित नियम को लेकर है, जिसके तहत 2 हजार रुपये से ज्यादा के मर्चेंट यूपीआई ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत तक का एमडीआर वसूले जाने की बात सामने आ रही है।
व्यापार जगत से जुड़े जानकारों का मानना है कि यदि यह नियम लागू होता है, तो इससे न सिर्फ छोटे और मध्यम व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ेंगी, बल्कि देश में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के प्रयासों को भी झटका लग सकता है। यही वजह है कि भोपाल के व्यापारियों ने एक दिन का सांकेतिक विरोध जताते हुए सरकार और संबंधित वित्तीय संस्थाओं तक अपनी बात पहुंचाने का यह जरिया चुना।
अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल का कड़ा रुख
इस पूरे मामले पर स्थिति स्पष्ट करते हुए अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल मध्य प्रदेश के महासचिव अनुपम अग्रवाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि व्यापारी वर्ग तकनीकी प्रगति और डिजिटल भुगतान के बिल्कुल भी खिलाफ नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यूपीआई ने पिछले कुछ वर्षों में व्यापार को बेहद आसान, पारदर्शी और तेज बना दिया है, जिसे कोई भी व्यापारी नकार नहीं सकता।
हालांकि, श्री अग्रवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सहूलियत की आड़ में व्यापारियों पर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं डाला जाना चाहिए। उनके मुताबिक, आगामी 15 अक्टूबर से 2 हजार रुपये से अधिक के व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होने की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। इसी संभावित फैसले के विरोध में व्यापारियों ने 'नो यूपीआई डे' का आयोजन किया ताकि हुक्मरानों को समय रहते इस बात का अंदाजा हो सके कि जमीनी स्तर पर इसका कितना गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
किन सेक्टरों पर पड़ेगा सबसे बुरा असर?
व्यापारी संगठनों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि एमडीआर का यह प्रस्ताव यदि धरातल पर उतरता है, तो इसका सबसे ज्यादा असर उन सेक्टरों पर पड़ेगा जहां औसत लेनदेन की राशि काफी बड़ी होती है। इनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित क्षेत्र शामिल हैं:
- थोक व्यापार (Wholesale Market): थोक बाजारों में रोजाना लाखों-करोड़ों का माल बिकता है, जहां एक-एक बिल की राशि हजारों और लाखों में होती है।
- सराफा कारोबार (Jewellery Market): सोने और चांदी की खरीदारी आम तौर पर बड़े बजट की होती है, ऐसे में हर डिजिटल पेमेंट पर प्रतिशत के हिसाब से कटने वाला शुल्क व्यापारियों का मुनाफा निगल जाएगा।
- वाहन क्षेत्र (Automobile Sector): कार और दोपहिया वाहनों की डीलरशिप पर होने वाले डिजिटल भुगतान पर यह शुल्क भारी-भरकम बोझ साबित होगा।
इन तमाम व्यवसायों से जुड़े लोगों का तर्क है कि जब सरकार खुद कैशलेस इकोनॉमी को प्रमोट कर रही है, तो ऐसे में डिजिटल ट्रांजैक्शन पर पेनल्टी या टैक्स जैसे चार्ज वसूलना पूरी तरह से तार्किक नहीं है। इससे व्यापारियों के लिए वर्किंग कैपिटल की लागत काफी ज्यादा बढ़ जाएगी।
आगे क्या हो सकता है? सरकारी एजेंसियों के रुख पर टिकी नजरें
राजधानी भोपाल से उठी यह विरोध की चिंगारी अब धीरे-धीरे अन्य व्यापारिक संगठनों तक भी पहुंचने लगी है। व्यापारियों का यह स्पष्ट संदेश है कि वे डिजिटल व्यवस्था के समर्थक हैं, लेकिन वे अपने मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा अतिरिक्त शुल्क के रूप में गंवाने को तैयार नहीं हैं।
अब देखना यह होगा कि इस विरोध प्रदर्शन के बाद देश के नीति निर्माताओं, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) और बैंकिंग सेक्टर से जुड़ी नियामक संस्थाओं का क्या रुख रहता है। क्या व्यापारियों की इस आपत्ति को ध्यान में रखते हुए एमडीआर के इस प्रस्ताव में कोई संशोधन किया जाएगा या इसे पूरी तरह से वापस लिया जाएगा? फिलहाल, भोपाल के व्यापारियों का यह कदम देश भर के व्यापारी वर्ग के लिए एक बड़ी चर्चा का विषय बन चुका है और सबकी निगाहें आगामी फैसलों पर टिकी हुई हैं।