पुणे महानगर क्षेत्र से लगा हुआ सिंहगढ़ क्षेत्र का ऐतिहासिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण खानापुर गांव इन दिनों एक ऐसी विकट समस्या से जूझ रहा है, जिसने वहां के स्थानीय नागरिकों की नींद उड़ा दी है। आज अक्टूबर 2026 के इस दौर में, जहां एक तरफ देश स्वच्छता और स्मार्ट सिटी की ओर तेजी से कदम बढ़ा रहा है, वहीं पुणे-पानशेत मार्ग पर स्थित खानापुर गांव कचरे के बड़े-बड़े ढेरों के बीच जीने को मजबूर है। करीब 7 हजार की घनी आबादी वाले इस गांव की गलियां, मुख्य सड़कें और यहां तक कि जलस्रोत भी अब कचरे के आगोश में समाते जा रहे हैं।
कचरे के ढेर में बदला व्यापारिक केंद्र
खानापुर गांव केवल एक साधारण ग्रामीण बस्ती नहीं है, बल्कि यह पुणे-पानशेत मार्ग का एक प्रमुख व्यापारिक और प्रशासनिक केंद्र माना जाता है। इस क्षेत्र की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां कई राष्ट्रीयकृत और सहकारी बैंक, बिजली वितरण कार्यालय, मंडल राजस्व कार्यालय, परिमंडल वन कार्यालय और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी महत्वपूर्ण संस्थाएं संचालित होती हैं। इन कार्यालयों की मौजूदगी के कारण रोजाना न केवल स्थानीय ग्रामीण, बल्कि आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों लोगों का आना-जाना लगा रहता है।
लेकिन विडंबना यह है कि जिस इलाके में रोजाना हजारों लोगों का की आना-जाना होता है, वहां आज गंदगी और कचरे के अंबार ने स्वागत करना शुरू कर दिया है। जगह-जगह लगे कूड़े के ढेरों ने इस खूबसूरत इलाके की सूरत ही बिगाड़ दी है।
महानगरपालिका के इनकार से बिगड़े हालात
इस पूरे संकट के केंद्र में पुणे महानगरपालिका (PMC) का वह फैसला है, जिसके तहत उन्होंने खानापुर गांव का कचरा अपने डंपिंग यार्ड में लेने से साफ इनकार कर दिया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, पहले ग्राम पंचायत की ओर से गांवभर से कचरा एकत्र किया जाता था और उसे पुणे महानगरपालिका के आधिकारिक डंपिंग यार्ड में निस्तारण के लिए भेज दिया जाता था। यह व्यवस्था लंबे समय तक सुचारू रूप से चल रही थी। हालांकि, महानगरपालिका द्वारा पाबंदियां लगाए जाने और कचरा स्वीकार करने से मना किए जाने के बाद ग्राम पंचायत के हाथ बंध गए। गांव के पास अपने स्तर पर इस विशाल मात्रा में निकलने वाले कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम या प्लांट मौजूद नहीं है, जिसके चलते यह संकट विकराल रूप धारण करता जा रहा है।
प्रतिदिन निकलता है एक टन कचरा
आबादी के विस्तार और व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने के कारण खानापुर में प्रतिदिन औसतन एक टन कचरा उत्पन्न होता है। इस कचरे में प्लास्टिक, थर्माकोल और अन्य अजैविक (non-biodegradable) कचरे की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो पर्यावरण में आसानी से घुलता-मिलता नहीं है।
- जमीन की कमी: ग्राम पंचायत के पास अपना खुद का कचरा प्रसंस्करण संयंत्र (Waste Processing Plant) स्थापित करने के लिए कोई भी गावरान या उपयुक्त सरकारी जमीन उपलब्ध नहीं है।
- संसाधनों का अभाव: वित्तीय और ढांचागत कमियों के कारण स्थानीय स्तर पर कचरे का पृथक्करण और रीसाइक्लिंग करना असंभव साबित हो रहा है।
- बंद पड़ी गाड़ियां: कचरा उठाने वाली ग्राम पंचायत की गाड़ियां कई दिनों से खड़ी हुई हैं, जिससे स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गई है।
बीमारियों का मंडराता साया और स्थानीय आक्रोश
वर्तमान में मानसून या मौसमी बदलाव के चलते बारिश और बहते हुए गंदे पानी के संपर्क में आकर यह कचरा सड़ने लगा है। सड़ते हुए कचरे से उठने वाली भीषण दुर्गंध ने आसपास के घरों में रहना मुहाल कर दिया है। इसके अलावा, इस कचरे पर पनपने वाले मच्छर और मक्खियों के भारी प्रकोप के कारण मलेरिया, डेंगू, टायफाइड और पेट से जुड़ी संक्रामक बीमारियों के फैलने की आशंका अपने चरम पर है।
स्थानीय निवासियों और बुजुर्गों का कहना है कि इस नरकीय स्थिति में सांस लेना भी दूभर हो गया है। बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर इसका सबसे बुरा असर पड़ रहा है। खडकवासला विधानसभा क्षेत्र के भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष शरद जावलकर ने इस मामले पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन के सुस्त रवैये की कड़ी आलोचना की है। उन्होंने मांग की है कि प्रशासन तुरंत प्रभाव से रोजाना कचरा उठाने की व्यवस्था करे और गीले तथा सूखे कचरे के अलग-अलग वैज्ञानिक प्रसंस्करण का पुख्ता प्रबंध किया जाए।
प्रशासनिक स्तर पर गुहार, समाधान की आस
मामले की गंभीरता को देखते हुए खानापुर की सरपंच शिल्पा गायकवाड़ ने प्रशासनिक तंत्र के उच्च अधिकारियों का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने मीडिया और जिला प्रशासन के सामने अपनी लाचारी बयां करते हुए स्पष्ट किया है कि,
"गांव में कचरा प्रसंस्करण प्रोजेक्ट लगाने के लिए हमारे पास भूमि उपलब्ध नहीं है। यही वजह थी कि हम एकत्रित कचरा महानगरपालिका को भेजते थे। अब पालिका ने बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के कचरा लेना बंद कर दिया है। हमने जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और त्वरित समाधान निकालने की मांग की है।"
यह समस्या केवल खानापुर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन तमाम ग्रामीण-शहरी सीमावर्ती इलाकों की पोल खोलती है जो तेजी से शहरीकरण की चपेट में तो आ रहे हैं, लेकिन उनके पास बुनियादी नागरिक सुविधाओं और स्वच्छता के नाम पर कुछ नहीं है। राज्य विधानमंडल में भी इस मुद्दे पर पहले आवाज उठाई जा चुकी है, लेकिन धरातल पर अब तक कोई ठोस प्रशासनिक कदम न उठाए जाने से ग्रामीणों में भारी रोष व्याप्त है।
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन और पुणे महानगरपालिका आपसी तालमेल बिठाकर इस गांव को इस कचरा कुंड बनने से बचाने के लिए क्या आपातकालीन कदम उठाते हैं, या फिर यहां के 7 हजार लोग यूं ही बीमारी के साये में जीने को मजबूर रहेंगे।