राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में इस बार सियासत और अपराध का एक ऐसा समीकरण सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम मतदाताओं तक की चिंता बढ़ा दी है। चुनाव आयोग के पास दाखिल किए गए नामांकन पत्रों और शपथ पत्रों (Affidavits) की छंटनी के बाद जो आंकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं। प्रदेशभर के विभिन्न निकायों में चुनावी समर में उतरे 100 से अधिक ऐसे प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिनके नाम के आगे गंभीर आपराधिक मामलों (Criminal Records) के दाग लगे हुए हैं।
लोकतंत्र के इस पावन पर्व में जहां एक तरफ विकास, शिक्षा, स्वच्छता और स्थानीय बुनियादी सुविधाओं के वादे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दागी चेहरों की मौजूदगी ने इस पूरी चुनावी प्रक्रिया की बानगी पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है। आखिर क्या वजह है कि राजनीतिक दल तमाम दावों और शुचिता की बातों के बावजूद ऐसे चेहरों को टिकट देने से परहेज नहीं करते? यह सवाल आज हर उस आम नागरिक के जेहन में है जो एक पारदर्शी और स्वच्छ प्रशासन की उम्मीद रखता है।
शपथ पत्रों में खुले राज: गंभीर धाराओं में दर्ज हैं मुकदमे
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक, हर उम्मीदवार के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वह अपने नामांकन के साथ एक शपथ पत्र दाखिल करे, जिसमें उसके ऊपर चल रहे आपराधिक मुकदमों का पूरा विवरण हो। जब इन शपथ पत्रों की गहन पड़ताल की गई, तो यह बात खुलकर सामने आई कि छोटे-बड़े सभी दलों और निर्दलीय खेमों से ताल्लुक रखने वाले 100 से ज्यादा उम्मीदवारों ने अपने ऊपर दर्ज मुकदमों को स्वीकार किया है।
इन मामलों में केवल छोटे-मोटे विवाद ही नहीं, बल्कि कई प्रत्याशियों पर मारपीट, बलवा, अवैध कब्जा, सरकारी काम में बाधा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे संगीन आरोप शामिल हैं। कुछ मामलों में तो अदालत में सुनवाई और ट्रायल भी अंतिम चरणों में हैं। इसके बावजूद इन दिग्गजों या उनके समर्थकों का सियासी रसूख इतना मजबूत है कि उन्हें चुनावी मैदान में उतरने से कोई नहीं रोक पाया।
सियासी रसूख बनाम कानून की पारदर्शिता
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय निकाय चुनाव (Local Body Elections) विधानसभा या लोकसभा चुनावों की तुलना में कहीं अधिक व्यक्तिगत और जमीनी स्तर पर लड़े जाते हैं। यहां मुद्दों से ज्यादा जाति, बिरादरी, धनबल और बाहुबल का असर देखने को मिलता है। यही कारण है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले दबंग और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग पार्टियों के लिए 'विनिंग फैक्टर' (Winning Factor) साबित होते हैं।
- दबाव की राजनीति: कई बार प्रत्याशी अपने रसूख के दम पर स्थानीय मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।
- टिकट वितरण की मजबूरी: राजनीतिक दल अक्सर जिताऊ उम्मीदवार (Winability) के पैमानों पर खरे उतरने वाले चेहरों को ही प्राथमिकता देते हैं, चाहे उनकी छवि दागदार ही क्यों न हो।
- मतदाताओं की जागरूकता: हालांकि, जागरूक मतदाता अब ऐसे उम्मीदवारों के रिकॉर्ड को परखने लगे हैं, लेकिन धरातल पर अभी भी बहुत कुछ बदलना बाकी है।
मतदाताओं के सामने बड़ी दुविधा
राजस्थान के इन निकायों में रहने वाले आम लोगों के लिए यह स्थिति किसी दुविधा से कम नहीं है। एक तरफ उन्हें अपने वार्ड और शहर के विकास के लिए एक सक्षम प्रतिनिधि की तलाश है, तो दूसरी तरफ उन्हें ऐसे प्रत्याशियों से भी पाला पड़ रहा है जिनका इतिहास सवालों के घेरे में है। लोकतंत्र में जनता के पास सबसे बड़ी ताकत वोट की होती है, और यही वह समय होता है जब जनता अपने विवेक से सही और गलत का चुनाव कर सकती है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि मतदाताओं को केवल पार्टियों के वादों या उम्मीदवारों के व्यक्तिगत प्रभाव में आने के बजाय उनके द्वारा दिए गए शपथ पत्रों का अध्ययन करना चाहिए। चुनाव आयोग की वेबसाइट और ऐप्स के जरिए अब हर नागरिक आसानी से यह जान सकता है कि किस प्रत्याशी पर कौन से आपराधिक मामले दर्ज हैं।
प्रशासन और चुनाव आयोग की सख्त नजर
इस पूरे घटनाक्रम पर राज्य निर्वाचन आयोग और जिला प्रशासन की टीमें भी पूरी तरह से मुस्तैद हैं। आदर्श आचार संहिता के पालन के साथ-साथ यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि जिन उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं, वे मीडिया और विज्ञापनों के जरिए इसकी जानकारी जनता तक सार्वजनिक रूप से पहुंचाएं। सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्देशों के मुताबिक भी यह अनिवार्य किया गया है कि दागी उम्मीदवारों को अपने मामलों का प्रचार अखबारों और टीवी चैनलों के माध्यम से करना होगा, ताकि मतदाता पूरी तरह से वाकिफ होकर अपना फैसला लें।
बहरहाल, राजस्थान के इन निकाय चुनावों का यह रण अब बेहद दिलचस्प और संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। एक तरफ विकास के हसीन सपने हैं, तो दूसरी तरफ मुकदमों की लंबी फेहरिस्त। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सूबे के मतदाता इन दागी चेहरों को नकारते हैं या फिर उनके सियासी रसूख के आगे अपनी मुहर लगाते हैं। परिणाम चाहे जो भी हों, यह चुनाव राजस्थान की राजनीति में एक लंबी बहस छोड़कर जाने वाला है।