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मुजफ्फरनगर में फिर भड़की 2013 दंगों की आग? राकेश टिकैत ने खोला बड़ा राज

मुजफ्फरनगर में फिर भड़की 2013 दंगों की आग? राकेश टिकैत ने खोला बड़ा राज

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर गर्माहट आ गई है। साल 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की बरसी के मौके पर शहर में अचानक से कुछ ऐसे पोस्टर सामने आए, जिन्होंने डेढ़ दशक पुरानी कड़वी यादों को फिर से हवा दे दी है। इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद भारतीय किसान यूनियन (BKU) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने तीखा रुख अपनाया है। उन्होंने सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल और राजनीतिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

पोस्टर विवाद पर टिकैत का कड़ा तेवर: 'किसने छपवाए, किसकी शह पर लगे?'

मुजफ्फरनगर शहर के विभिन्न हिस्सों में अचानक से प्रकट हुए इन विवादित पोस्टरों ने स्थानीय प्रशासन और पुलिस के माथे पर भी बल ला दिए हैं। इन पोस्टरों पर 2013 के दंगों की याद दिलाने वाले और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की क्षमता रखने वाले संदेश होने का दावा किया जा रहा है।

राकेश टिकैत ने इस मामले पर कड़ा विरोध जताते हुए सवाल किया कि आखिर इन पोस्टरों को छपवाने वाला कौन था और इन्हें लगाने के पीछे किसका हाथ था? टिकैत ने मांग की है कि इस पूरे मामले की उच्च स्तर पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने आश्चर्य जताया कि शहर के संवेदनशील इलाकों में इस तरह के पोस्टर लग जाते हैं और पुलिस-प्रशासन को इसकी भनक तक नहीं लगती। इसे उन्होंने प्रशासनिक मिलीभगत या बड़ी चूक करार दिया है।

'यह कोई इत्तेफाक नहीं, आने वाले चुनावों की प्रैक्टिस है'

राकेश टिकैत ने राजनीतिक विश्लेषकों की भाषा में अपनी बात रखते हुए कहा कि जब भी चुनाव नजदीक आते हैं, इस तरह के हथकंडे अपनाए जाना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा,

"जिस तरह कोई खिलाड़ी मैदान में उतरने से पहले नेट्स पर प्रैक्टिस करता है, ठीक उसी तरह चुनाव पास आते ही कुछ लोग अपने पुराने सांप्रदायिक मुद्दों की प्रैक्टिस शुरू कर देते हैं। मुजफ्फरनगर के ये पोस्टर और सहारनपुर का विवाद उसी सुनियोजित अभ्यास का हिस्सा हैं।"

उनका स्पष्ट आरोप है कि जैसे-जैसे विधानसभा चुनावों का समय नजदीक आ रहा है, राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए समाज को ध्रुवीकृत करने के पुराने और आजमाए हुए नुस्खे फिर से निकाले जा रहे हैं।

सहारनपुर मस्जिद-कुआं विवाद पर भी साधा निशाना

मुजफ्फरनगर के पोस्टर विवाद के साथ-साथ राकेश टिकैत ने सहारनपुर में हाल ही में सामने आए मस्जिद और कुएं से जुड़े विवाद पर भी तीखी टिप्पणी की। सहारनपुर में एक विशेष धार्मिक स्थल के जीर्णोद्धार या कार्रवाई के दौरान एक पुराने कुएं के मिलने के दावे पर उन्होंने व्यंग्य किया।

टिकैत ने कहा कि अब चुनाव नजदीक आ रहे हैं तो ऐसे नए-नए 'मुद्दे' और 'ढांचे' जमीन से बाहर निकलेंगे। इन मुद्दों के इर्द-गिर्द माहौल गर्म किया जाएगा और धार्मिक भावनाओं को उकसाने का प्रयास होगा। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर कोई ऐतिहासिक या प्राचीन ढांचा मिला भी है, तो उसकी सत्यता की वैज्ञानिक और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन उसे चुनावी लाभ के लिए हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।

'जनता अब होशियाਰ है, बहकावे में नहीं आएगी'

अपने कड़े बयानों के बीच राकेश टिकैत ने मुजफ्फरनगर और आसपास के इलाकों की आम जनता की परिपक्वता की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि साल 2013 के दंगों का जो जख्म इस क्षेत्र ने झेला है, उसने यहां के लोगों को बहुत कुछ सिखा दिया है।

  • क्षेत्र के लोग अब धर्म और जाति के नाम पर लड़ने के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और विकास जैसे बुनियादी मुद्दों पर बात करना चाहते हैं।
  • साप्रदायिक तनाव फैलाने वाली ताकतों को अब जनता अच्छी तरह पहचान चुकी है।
  • लोग यह समझ चुके हैं कि जब भी चुनाव करीब आते हैं, कुछ खास लोग भाईचारे में दरार डालने की कोशिश करते हैं।

टिकैत ने मुजफ्फरनगर की सर्वसमाज की जनता से अपील की कि वे किसी भी तरह के बहकावे में न आएं और शांति तथा आपसी सौहार्द को बनाए रखें।

प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम ने साल 2026 की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कानून-व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। स्थानीय लोगों और किसान संगठनों के दबाव के बाद पुलिस और खुफिया तंत्र हरकत में आ गया है। हालांकि, सवाल यह बना हुआ है कि क्या समय रहते इन भड़काऊ पोस्टरों के असली गुनहगारों तक प्रशासन पहुंच पाएगा या फिर यह मामला सिर्फ बयानबाजी तक ही सीमित रह जाएगा।

फिलहाल, राकेश टिकैत के इस आक्रामक रुख ने एक बार फिर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का पारा चढ़ा दिया है और सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में प्रशासन इस मामले में क्या ठोस कार्रवाई करता है।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

Content Writer (देश खबरें)

अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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