रसोई की चारदीवारी में हमेशा से एक ऐसी चीज रही है, जिसे लेकर कभी किसी ने ज्यादा माथापच्ची नहीं की। चाय बनानी हो, हलवा तैयार करना हो या फिर बच्चों के लिए कोई मीठी डिश, चीनी का डिब्बा हमेशा बेफिक्र होकर खुलता था। चम्मच भर-भरकर चीनी डाली जाती थी और किसी को यह हिसाब लगाने की जरूरत महसूस नहीं होती थी कि इससे महीने का बजट कितना हिलेगा। लेकिन वक्त बदलते देर नहीं लगती। आज हालात यह हैं कि वही साधारण सी चीनी अब हमारी रसोई की 'वीआईपी' बन चुकी है।
त्योहारों का सीजन नजदीक आते ही जब बाजारों में रौनक बढ़नी चाहिए, तब मिठास के इस सबसे बड़े और बुनियादी घटक के तेवर तल्ख हो चुके हैं। चीनी की बढ़ती कीमतें अब सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं रह गई हैं, बल्कि यह सीधे तौर पर आम आदमी की जेब पर भारी पड़ने लगी हैं। त्योहारी मौसम में जब घर-घर में पकवानों की खुशबू फैलनी चाहिए, उससे पहले ही महंगाई की इस आंच ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
क्यों बढ़ रहे हैं चीनी के दाम?
चीनी की कीमतों में इस अचानक आए उछाल के पीछे कई बड़े कारण छिपे हैं। कृषि विशेषज्ञों और बाजार विश्लेषकों का मानना है कि इस साल गन्ने के उत्पादन पर मौसम की मार पड़ी है। देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मॉनसूनी अनिश्चितता और कीटों के प्रकोप के कारण फसल को नुकसान हुआ है। इसके अलावा, एथेनॉल की बढ़ती मांग ने भी चीनी मिलों के समीकरण को बदला है। सरकार की ओर से पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के जो लक्ष्य तय किए गए हैं, उसके चलते एक बड़े हिस्से का गन्ना सीधे एथेनॉल निर्माण की तरफ डायवर्ट हो रहा है।
तीसरा बड़ा कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतों का उतार-चढ़ाव है। वैश्विक स्तर पर सप्लाई चेन प्रभावित होने के कारण घरेलू बाजार में भी इसका सीधा असर देखने को मिल रहा है। जमाखोरों और सटोरियों की नजरें भी हमेशा ऐसे मौकों पर टिकी रहती हैं, जब त्योहारी मांग चरम पर होती है। ऐसे में कृत्रिम कमी या कीमतों में हेरफेर की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।
त्योहारों की खुशियों पर महंगाई का साया
भारत में त्योहारों का मतलब ही मेल-जोल, मिठाइयां और एक-दूसरे के मुंह मीठा कराना है। दिवाली, भाई दूज और आने वाले अन्य पर्वों पर घरों में तरह-तरह के पकवान बनते हैं। लेकिन जब मुख्य सामग्री यानी चीनी ही इतनी महंगी हो जाए, तो मध्यम वर्ग और गरीब परिवार क्या करें? बाजार में मिलने वाली मिठाइयों के दाम पहले ही आसमान छू रहे हैं। अब अगर लोग घर पर भी कुछ मीठा बनाने की सोचें, तो उन्हें अपने हाथ खींचने पड़ रहे हैं।
"पहले हम एक किलो चीनी लाने से पहले कभी नहीं सोचते थे। अब दुकान पर जाते हैं तो रेट देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई कीमती सामान खरीद रहे हों। त्योहारों पर मेहमानों का स्वागत करना भी अब भारी पड़ने लगा है।" - सुनीता देवी, गृहिणी, दिल्ली
"त्योहारों के वक्त कीमतों का इस तरह बढ़ना पूरी तरह से अनुचित है। सरकार को इस पर कड़ी नजर रखनी चाहिए ताकि जमाखोरी पर लगाम लगाई जा सके और आम जनता को राहत मिल सके।" - राजेश कुमार, व्यापारी
बजट पर कैसे पड़ रहा है असर?
एक आम भारतीय परिवार के महीने के बजट में चीनी का खर्च बहुत ज्यादा नहीं आंका जाता था। लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में प्रति किलोग्राम कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, उसने किराने के पूरे बिल को प्रभावित किया है। सिर्फ घर के इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि छोटे चाय विक्रेताओं, हलवाइयों और बेकरी उत्पादों से जुड़े छोटे कारोबारियों के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा चुनौतीपूर्ण बन गई है।
छोटे व्यापारियों का कहना है कि वे न तो ग्राहकों से अचानक बहुत ज्यादा दाम बढ़ा सकते हैं और न ही अपना मुनाफा घटाकर व्यवसाय चला सकते हैं। ऐसे में उनके सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है।
सरकार और प्रशासन की क्या है तैयारी?
बढ़ती कीमतों को थामने के लिए अक्सर सरकार स्टॉक लिमिट तय करने जैसे कदम उठाती है। प्रशासनिक स्तर पर यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि त्योहारी सीजन के दौरान देश में चीनी की कोई कमी न हो। सरकार के गोदामों में बफर स्टॉक मौजूद है, जिसे जरूरत पड़ने पर बाजार में उतारा जा सकता है ताकि कीमतों को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, जमीनी स्तर पर इन उपायों का असर दिखने में थोड़ा वक्त लग सकता है।
आगे क्या उम्मीद करें?
आने वाले हफ्तों में जब त्योहार अपने चरम पर होंगे, तब चीनी की मांग और अधिक बढ़ने की संभावना है। ऐसे में उपभोक्ताओं को थोड़ी सूझबूझ से काम लेना होगा। फिजूलखर्ची से बचना और जरूरत के हिसाब से ही खरीदारी करना इस समय सबसे समझदारी भरा कदम होगा। इसके साथ ही, स्थानीय प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि कालाबाजारी करने वालों पर नकेल कसी जाए।
