भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय प्रतीकों और उनके इतिहास को लेकर एक बार फिर से सरगर्मी तेज हो गई है। हाल ही में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के पूर्ण सम्मान और उसके ऐतिहासिक स्वरूप को बचाने के लिए एक बेहद अहम और कड़ा 10-सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया है। यह कदम कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) के उस हालिया फैसले के जवाब में उठाया गया है, जिसमें पार्टी कार्यक्रमों के दौरान वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंदों को ही गाने की अपनी 1937 की नीति को फिर से दोहराया गया था।
महात्मा गांधी के विचारों का दिया गया हवाला
बीजेपी के इस नए प्रस्ताव में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उन ऐतिहासिक बयानों को प्रमुखता से सामने लाने का संकल्प लिया गया है, जिसमें उन्होंने 'वंदे मातरम' को एक 'साम्राज्यवाद-विरोधी हुंकार' (Anti-Imperialist Cry) बताया था। पार्टी का कहना है कि महात्मा गांधी ने इसे 'शुद्धतम राष्ट्रीय भावना' से जोड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति के जरिए बीजेपी एक बार फिर राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वैचारिक बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रही है।
सत्तारूढ़ दल ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय गीत को किसी भी तरह के 'सांप्रदायिक दबाव', 'राजनीतिक तुष्टिकरण' या 'संकीर्ण वोट बैंक की राजनीति' के अधीन नहीं होने दिया जाएगा। पार्टी का तर्क है कि 1937 का कोई राजनीतिक समझौता भारत गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था और संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता।
बीजेपी के 10-सूत्रीय प्रस्ताव की मुख्य बातें
पार्टी द्वारा जारी किए गए इस विस्तृत प्रस्ताव में निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं को शामिल किया गया है:
- कांग्रेस के फैसले की निंदा: सीडब्ल्यूसी द्वारा 1937 के प्रस्ताव को बहाल करने और वंदे मातरम को केवल दो छंदों तक सीमित रखने के निर्णय का पुरजोर विरोध।
- राष्ट्रीय गौरव की रक्षा: भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में वंदे मातरम की पूर्ण गरिमा, विरासत और राष्ट्रीय दर्जे को सर्वोच्च रखना।
- संवैधानिक स्थिति: 1950 में संविधान सभा की घोषणा और संसद द्वारा इसे दिए गए विधिक संरक्षण को रेखांकित करना।
- तुष्टिकरण का विरोध: वोट बैंक की राजनीति या राजनीतिक समझौते के लिए राष्ट्रीय गीत से समझौता न करना।
- ऐतिहासिक संदर्भ को उजागर करना: 1937 में इसके कतरन (Truncation) के पीछे मुस्लिम लीग की आपत्तियों और सांप्रदायिक राजनीति के इतिहास से जनता को अवगत कराना।
- गांधी जी के दृष्टिकोण का प्रसार: महात्मा गांधी की गवाही को घर-घर तक पहुंचाना कि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का अमर प्रतीक है।
- राष्ट्रव्यापी अभियान: बीजेपी कार्यकर्ताओं द्वारा देश के हर कोने में वंदे मातरम के इतिहास और महत्व को ले जाने के लिए विशेष अभियान चलाना।
- युवा पीढ़ी को जागरूक करना: देश के युवाओं को स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान और इस गीत से जुड़े संघर्षों के बारे में शिक्षित करना।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक मायने
वंदे मातरम के इतिहास पर नजर डालें तो बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा रचित इस आनंदमठ के गीत ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों में जो ऊर्जा फूंकी थी, वह अद्वितीय थी। हालांकि, ब्रिटिश काल के दौरान ही इसके कुछ हिस्सों को लेकर राजनीतिक और सांप्रदायिक आपत्तियां उठनी शुरू हो गई थीं। 1937 में कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिम तुष्टिकरण और असहमतियों के चलते इसके शुरुआती दो छंदों को ही आधिकारिक रूप से गाने का फैसला किया था, ताकि सभी पक्षों को साथ रखा जा सके।
अब बीजेपी इसी ऐतिहासिक फैसले को आधार बनाकर कांग्रेस पर हमलावर है। पार्टी का कहना है कि आज की राजनीति में भी कुछ दल अपने राजनीतिक स्वार्थ और वोट बैंक के लिए राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दों पर पीछे हट जाते हैं, जिसे देश की जनता अब और बर्दाश्त नहीं करेगी।
देशभर में चलेगा जन-जागृति अभियान
इस प्रस्ताव के तहत बीजेपी ने देश भर में अपने कार्यकर्ताओं को मैदान में उतारने का फैसला किया है। पार्टी का लक्ष्य है कि गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों को वंदे मातरम के पूरे छह छंदों, उसके इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान के बारे में बताया जाए। विशेष तौर पर स्कूल और कॉलेजों के युवाओं के बीच इस दिशा में कार्यशालाएं और कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे ताकि नई पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी रहे।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की है कि यह प्रस्ताव आने वाले दिनों में एक बड़ी वैचारिक बहस का रूप ले सकता है, जहां राष्ट्रवाद बनाम राजनीतिक समझौते की पुरानी बहस एक बार फिर केंद्र में आ गई है।
