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भारत की संस्कृति और विविधता पर डॉ. मनमोहन वैद्य का बड़ा बयान, काशी में कही ये बात

भारत की संस्कृति और विविधता पर डॉ. मनमोहन वैद्य का बड़ा बयान, काशी में कही ये बात

वाराणसी की पावन भूमि पर हाल ही में आयोजित एक विशेष शिक्षक संवाद संगोष्ठी ने शैक्षणिक और वैचारिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के शताब्दी भवन सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य ने भारतीय संस्कृति, इतिहास और वर्तमान सामाजिक परिदृश्य पर खुलकर अपने विचार रखे। इस दौरान उन्होंने देश की सांस्कृतिक विविधता, वैचारिक स्वतंत्रता और नई पीढ़ी की भूमिका जैसे गंभीर विषयों पर विस्तार से चर्चा की।

विविधता और आध्यात्मिकता ही भारत की मूल पहचान

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. मनमोहन वैद्य ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता विभिन्नताओं को स्वीकार करना और उन्हें एक उत्सव के रूप में मनाना है। भारत कभी भी सांस्कृतिक विविधता में किसी प्रकार का भेद नहीं मानता। इसके विपरीत, यह देश अलग-अलग मानवीय समूहों को एक सूत्र में पिरोकर एक साथ आगे बढ़ने की अद्भुत और विलक्षण क्षमता रखता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की पहचान का मुख्य आधार इसकी समृद्ध आध्यात्मिकता है, जिसका प्रभाव और प्रसार देश के कोने-कोने में सहज ही देखा जा सकता है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि आज भी कई लोग अपनी पहचान को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं और वे 'इंडिया' के मानसिक मोह से बाहर निकलने में संघर्ष कर रहे हैं।

इतिहास और विकास की नई दृष्टि

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इंग्लैण्ड, जर्मनी, जापान और इजरायल जैसे राष्ट्रों ने शून्य से शुरुआत कर अपनी विकास यात्रा को नए आयाम दिए। इसी तर्ज पर भारत को भी गहराई से समझने के लिए अपने प्राचीन इतिहास, पूर्वजों और सांस्कृतिक जड़ों के प्रति एक स्पष्ट और सटीक दृष्टिकोण अपनाने की सख्त आवश्यकता है।

डॉ. वैद्य ने भारत की तुलना एक सुंदर बगीचे से करते हुए कहा कि हम इस बगीचे के रखवाले या माली नहीं, बल्कि इसके अभिन्न पौधे हैं। यदि बगीचे में कोई संकट आता है, तो माली भले ही दूरी बना ले, लेकिन पौधा उसी मिट्टी के साथ झुलस जाता है। हमारा और हमारी मातृभूमि का रिश्ता ठीक इसी प्रकार अटूट और गहरा है।

उद्योग, व्यापार और प्राचीन वैभव

देश के आर्थिक इतिहास पर बात करते हुए उन्होंने 'गंगा-जमुना तहजीब' और भारत को केवल एक कृषि प्रधान देश बताने वाली पारंपरिक अवधारणाओं पर भी नए सिरे से विचार करने की बात कही। उन्होंने याद दिलाया कि प्राचीन काल में भारत केवल कृषि तक सीमित नहीं था, बल्कि उद्योग और व्यापार के क्षेत्र में भी दुनिया का सिरमौर था। हमारे पूर्वजों ने पूरी दुनिया के विभिन्न हिस्सों में व्यापारिक संबंध स्थापित किए, लेकिन अपनी संस्कृति का विस्तार करते हुए कभी किसी पर अपनी सत्ता बलपूर्वक नहीं थोपी और न ही किसी को गुलाम बनाया।

भौतिकता और आध्यात्मिकता का संतुलन

जीवन के मूल सत्यों को समझाते हुए उन्होंने कहा कि केवल भौतिक विज्ञान या केवल आध्यात्मिकता मनुष्य के जीवन की श्रेष्ठता और पूर्णता को नहीं समझा सकती। इन दोनों के बीच एक स्वस्थ सामंजस्य होना अनिवार्य है। आज की युवा पीढ़ी को केवल उपदेश देने के बजाय उनके साथ संवाद स्थापित करने की पद्धति अपनानी होगी। इसके लिए हमें पहले सही मायनों में 'पढ़ने के लिए सीखना' और फिर 'सीखने के लिए पढ़ना' होगा।

सामाजिक कुरीतियों और धर्म परिवर्तन जैसे संवेदनशील विषयों पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह के कार्यों को केवल शासन या सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। कुटुंब प्रबोधन और समाज के भीतर आपसी समरसता जैसे मूल प्रयासों के जरिए समाज के हर वर्ग को आगे आकर अपनी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

अध्यक्षीय उद्बोधन और विद्वानों की उपस्थिति

इस गरिमामयी कार्यक्रम की अध्यक्षता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजित चतुर्वेदी ने की। अपने संबोधन में उन्होंने संस्कृति और इतिहास के अध्ययन-अध्यापन को आज के समय में अत्यधिक प्रासंगिक बताया तथा अर्जित ज्ञान का उपयोग सीधे तौर पर समाज के कल्याण के लिए करने पर विशेष बल दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के तैलचित्र पर दीप प्रज्ज्वलन और माल्यार्पण के साथ हुआ। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की छात्राओं ने पारंपरिक कुलगीत प्रस्तुत कर कार्यक्रम में एक नई ऊर्जा का संचार किया।

तरुणी संवाद: बालिकाओं के नेतृत्व पर जोर

मुख्य संगोष्ठी से इतर, आर्य महिला पीजी कॉलेज में आयोजित 'तरुणी संवाद' कार्यक्रम में भी डॉ. मनमोहन वैद्य ने युवा शक्ति, विशेषकर छात्राओं से सीधा संवाद किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में बालिकाओं को आगे आकर समाज का नेतृत्व संभालना होगा।

अपने वक्तव्य को और अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने मानव हाथ के अंगूठे का एक बहुत ही सुंदर उदाहरण दिया। उन्होंने समझाया कि जिस प्रकार हाथ का अंगूठा बाकी सभी उंगलियों के साथ पूर्ण सामंजस्य बैठाकर किसी भी कार्य को संभव बनाता है, ठीक उसी प्रकार बालिकाओं को भी समाज में आपसी सहयोग, सामंजस्य और मित्रता की भावना को बढ़ावा देना चाहिए। संकट के कठिन समय में उन्हें आगे बढ़कर नेतृत्व करना चाहिए और सफलता मिलने पर अपने साथियों को भी आगे बढ़ने का अवसर देना चाहिए।

  • भारत को समझने के तीन अचूक सूत्र: पढ़कर, देखकर और सुनकर ज्ञान प्राप्त करना।
  • जीवन में किसी भी बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए समय प्रबंधन (Time Management) की अनिवार्य भूमिका।
  • नई पीढ़ी के साथ संवाद की संस्कृति को बढ़ावा देना।

कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय की प्रधानाचार्या प्रो. रचना दूबे सहित कई गणमान्य शिक्षाविद् और अतिथि मौजूद रहे। इस पूरे आयोजन का संचालन शेफाली कश्यप ने बेहद कुशलता से किया। इन दोनों ही कार्यक्रमों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी, प्रतिष्ठित शिक्षाविद, शहर के प्रबुद्ध नागरिक और बड़ी संख्या में मातृशक्ति उपस्थित रही, जिसने इस वैचारिक मंथन को ऐतिहासिक बना दिया।

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रोशनी गुप्ता

रोशनी गुप्ता

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रोशनी गुप्ता जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं।...

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