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नौकरी छोड़ शुरू किया फूड कार्ट, इंजीनियर की कहानी देख चौंक गए लोग

नौकरी छोड़ शुरू किया फूड कार्ट, इंजीनियर की कहानी देख चौंक गए लोग

कैरियर के शुरुआती दौर में जब किसी युवा के हाथ में मल्टीनेशनल कंपनी का ऑफर लेटर होता है, तो समाज उसे सफलता की सबसे बड़ी सीढ़ी मान लेता है। लोग इस बात की परवाह नहीं करते कि उस चमकदार केबिन के पीछे कर्मचारी के मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत जीवन पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन, उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने इस लीक से हटकर सोचने पर मजबूर कर दिया है। एक युवा इंजीनियर ने दो साल तक MNC की दौड़-भाग वाली नौकरी में अपनी जिंदगी खपाने के बाद अचानक कुछ ऐसा किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

एमएनसी के केबिन से सीधे सड़क के किनारे तक का सफर

ग्रेटर नोएडा के रहने वाले उपेंद्र सिंह ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर या तकनीकी क्षेत्र में बतौर इंजीनियर अपनी सेवाएं शुरू की थीं। कागजों पर यह एक शानदार शुरुआत थी। एक स्थिर सैलरी, एसी ऑफिस और कॉर्पोरेट जगत का रुतबा। लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई कुछ और ही थी। उपेंद्र बताते हैं कि यूं तो उनकी शिफ्ट आठ घंटे की थी, लेकिन कॉर्पोरेट की इस अंधी दौड़ में उन्हें अक्सर नौ से दस घंटे तक सिस्टम के आगे बैठना पड़ता था।

काम का यह दबाव धीरे-धीरे उनकी मानसिक शांति पर हावी होने लगा था। इसी बीच, उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उनके सोचने का नजरिया ही बदल दिया। उनके पिता अपने सरकारी या प्राइवेट महकमे से रिटायर हो गए। परिवार की जिम्मेदारियों का वह दौर और खुद के भीतर सुलग रही कुछ अपना करने की इच्छा ने उपेंद्र को एक कड़ा फैसला लेने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने तय किया कि अब वे किसी और के लिए अपने जीवन के घंटे नहीं बेचेंगे, बल्कि अपना खुद का कारोबार शुरू करेंगे।

बिना किसी होटल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग या बड़े रेस्टोरेंट का अनुभव हासिल किए, उपेंद्र ने साल 2023 में ग्रेटर नोएडा की सड़कों पर अपना एक फूड कार्ट (ठेला) लगाने का जोखिम भरा फैसला लिया। एक इंजीनियर के लिए समाज के तानों को दरकिनार कर यह कदम उठाना आसान नहीं था। लेकिन उनके भीतर का आत्मविश्वास इस बात पर अडिग था कि छोटा कारोबार भी किसी की गुलामी से बेहतर होता है।

व्लॉगिंग के जरिए साझा किया जिंदगी का कड़वा सच

अपने इस नए सफर और संघर्ष को दुनिया तक पहुंचाने के लिए उपेंद्र ने सोशल मीडिया का सहारा लिया। उन्होंने व्लॉगिंग की दुनिया में कदम रखा और अपने पहले ही वीडियो में ग्रेटर नोएडा में सजे अपने फूड कार्ट की पूरी झलक दिखाई। वीडियो में उनके चेहरे पर जो संतुष्टि और सुकून दिखाई दिया, वह किसी बड़ी एमएनसी के सीईओ के चेहरे पर भी शायद ही कभी देखने को मिले।

अपने वीडियो में उपेंद्र बड़े बेबाक अंदाज में कहते हैं कि जिंदगी में लीक से हटकर कुछ नया करने पर कम से कम एक कीमती अनुभव जरूर मिलता है। उनके मुताबिक, नौकरी छोड़कर खुद का ठेला लगाना सिर्फ एक प्रोफेशन बदलना भर नहीं है, बल्कि अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की एक पुरजोर कोशिश है। उनका यह वीडियो देखते ही देखते इंटरनेट पर आग की तरह फैल गया।

सोशल मीडिया पर मिल रही है वाहवाही

आज के दौर में जहां युवा सरकारी नौकरी या आईटी सेक्टर की सुरक्षित नौकरियों के पीछे भाग रहे हैं, वहां एक इंजीनियर द्वारा फूड कार्ट का काम शुरू करने की खबर ने नेटिज़न्स को हैरान भी किया और प्रेरित भी। वीडियो वायरल होने के बाद कमेंट सेक्शन में शुभकामनाओं का तांता लग गया है।

  • साहसिक कदम: ज्यादातर यूजर्स ने उनके इस कदम को बेहद साहसिक करार दिया है। लोगों का कहना है कि समाज क्या कहेगा, इस डर से लोग अपने सपनों का गला घोंट देते हैं, लेकिन उपेंद्र ने इस दीवार को तोड़ दिया।
  • सोच से परे हकीकत: एक यूजर ने लिखा कि दुनिया में करोड़ों लोग केवल योजनाएं बनाते रह जाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जो उस सोच को मैदान पर उतारकर दिखाते हैं।
  • जिज्ञासा: कई युवा सोशल मीडिया पर उनके इंजीनियरिंग कॉलेज और इस कारोबार की अंदरूनी बारीकियों के बारे में भी पूछते नजर आ रहे हैं।

सफलता की परिभाषा और व्यावहारिक चुनौतियां

उपेंद्र सिंह की यह दास्तान हमें यह सिखाती है कि सफलता का कोई एक तय पैमाना नहीं होता। किसी के लिए सफलता करोड़ों रुपये का पैकेज हो सकती है, तो किसी के लिए शाम को चैन की नींद सोना और खुद का मालिक होना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। हालांकि, जानकारों का यह भी मानना है कि इस तरह के बड़े फैसले लेने से पहले व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति, परिवार की जिम्मेदारियों और बाजार के जोखिमों का आकलन करना बेहद आवश्यक होता है। हर किसी की परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए बिना सोचे-समझे केवल ट्रेंड के पीछे भागना घातक भी साबित हो सकता है।

फिलहाल, उपेंद्र अपने इस छोटे से फूड कार्ट के बिजनेस से बेहद खुश हैं। उनका यह सफर उन तमाम युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है जो अपनी मौजूदा नौकरी से नाखुश हैं लेकिन बदलाव से डरते हैं। यह कहानी बताती है कि रास्ते भले ही कठिन हों और समाज की नजरों में उनका कद छोटा लगे, लेकिन अगर इरादे पक्के हों तो सफलता और मानसिक शांति दोनों हासिल की जा सकती हैं।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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