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रतलाम में अनोखी परंपरा: दिन में जलमग्न हुए शिवलिंग, रात में झूम उठा आसमान

रतलाम में अनोखी परंपरा: दिन में जलमग्न हुए शिवलिंग, रात में झूम उठा आसमान

सितंबर 2026 के इस दौर में मौसम की बेरुखी ने देश के कई हिस्सों में किसानों की नींद उड़ा दी है। मानसून की चाल धीमी होने और पर्याप्त पानी न मिलने के कारण खेतों में लहलहाती फसलें अब सूखने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में भी कमोबेश यही स्थिति बनी हुई है, जहां अल्प वर्षा के चलते किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। सोयाबीन, मक्का और कपास जैसी प्रमुख फसलें इस समय पकने की अवस्था में हैं, लेकिन पानी के अभाव में उनपर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे हालात में जब विज्ञान और तकनीक के सारे प्रयास कमतर लगने लगते हैं, तब सदियों पुरानी लोक आस्था और परंपराएं उम्मीद की आखिरी किरण बनकर सामने आती हैं।

कल्याण केदारेश्वर मंदिर में उमड़ी आस्था की भीड़

रतलाम जिले के सैलाना क्षेत्र में स्थित प्राचीन और ऐतिहासिक छोटा कल्याण केदारेश्वर महादेव मंदिर इन दिनों अंचल के लोगों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। सरवन मार्ग पर स्थित इस पावन तीर्थ स्थल पर हाल ही में कुछ ऐसा नजारा देखने को मिला, जिसने आधुनिकता के इस दौर में भी हमारी प्राचीन संस्कृति और सामूहिक विश्वास की ताकत को उजागर कर दिया। क्षेत्र में मानसून की लंबी खेंच और सूखे की आहट से सहमे ग्रामीण किसानों ने इंद्रदेव और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए एक विशेष अनुष्ठान का बीड़ा उठाया।

ग्रामीणों ने मिलकर भगवान शिव के पावन शिवलिंग को जलमग्न कर विशेष रुद्राभिषेक किया। लोगों की अटूट मान्यता है कि जब प्रकृति रूठ जाती है और पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पड़ता है, तब देवाधिदेव महादेव की शरण में जाने से सभी संकट टल जाते हैं। इस अनुष्ठान में केवल एक गांव नहीं, बल्कि आसपास के कई गांवों के लोग अपनी तमाम चिंताओं को छोड़कर पूरी श्रद्धा के साथ शामिल हुए।

इन गांवों के किसानों ने थामा एक-दूसरे का हाथ

इस सामूहिक अनुष्ठान की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी सामाजिक एकता रही। सिर्फ सैलाना ही नहीं, बल्कि हरसोला, कोटड़ा, आम्बाकुड़ी और रिछी समेत कई ग्रामीण इलाकों से सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु सुबह-सुबह ही कल्याण केदारेश्वर मंदिर परिसर में एकत्र होने लगे। हर किसी की जुबान पर बस एक ही प्रार्थना थी—क्षेत्र में समय पर अच्छी बारिश हो, ताकि खेतों में खड़ी फसलें बच सकें और किसानों के परिवार भूखे रहने से बच जाएं।

मंदिर के गर्भगृह में पंडित युवराज त्रिवेदी ने वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ इस कठिन अनुष्ठान को संपन्न कराया। उनकी मंत्रोच्चार की गूंज और उपस्थित जनसमूह के 'हर-हर महादेव' के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर गुंजायमान हो गया। भक्तों ने घंटों शिवलिंग पर जल अर्पित किया और प्रार्थना की कि भोलेनाथ उनकी सुधि लें।

"हमारा पूरा जीवन और आजीविका सीधे तौर पर खेती और बारिश पर निर्भर करती है। अगर आसमान से पानी नहीं बरसेगा, तो हमारे सालभर की मेहनत मिट्टी में मिल जाएगी। इसलिए हम सबने मिलकर भगवान से गुहार लगाई है।" — स्थानीय ग्रामीण

अल्प वर्षा और फसलों पर मंडराता संकट

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सितंबर महीने का यह समय फसलों के दाने भरने और उनके पकने के लिए बेहद संवेदनशील होता है। इस वक्त यदि पर्याप्त सिंचाई या बारिश न मिले, तो बंपर पैदावार की उम्मीद रखने वाले किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। रतलाम के जिन इलाकों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं, वहां के किसानों ने तो जैसे-तैसे अपने पंप सेट और ट्यूबवेल चलाकर फसलों को बचाने की कोशिश शुरू कर दी है, लेकिन जिन क्षेत्रों में पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भरता है, वहां स्थिति बेहद गंभीर हो चली है। यही कारण है कि ग्रामीण अब पूरी तरह से धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजनों के जरिए प्रकृति को मनाने में जुटे हैं।

सकरावदा में मनाई गई पारंपरिक 'उज्जैनी'

सिर्फ रुद्राभिषेक ही नहीं, बल्कि रतलाम के ग्रामीण अंचल में वर्षा की कामना के लिए पारंपरिक 'उज्जैनी' मनाने की प्राचीन परंपरा का भी पूरी शिद्दत से पालन किया गया। ग्राम पंचायत सकरावदा, महुड़ीपाड़ा और मकनपुरा के ग्रामीणों ने एकजुट होकर सामूहिक रूप से उज्जैनी पर्व का आयोजन किया। इस आयोजन की एक और खास बात यह रही कि इसमें पूरे गांव ने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और बाजारों को स्वेच्छा से बंद रखने का निर्णय लिया, ताकि हर व्यक्ति इस धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठान में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सके।

व्यापारियों ने भी बिना किसी संकोच के अपनी दुकानें बंद रखीं और आयोजन को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया। उज्जैनी की परंपरा के तहत ग्रामीणों ने अपने-अपने खेतों पर जाकर विशेष पूजा-अर्चना की। खेतों में जाकर इंद्रदेव को दाल, बाटी और चूरमा का पारंपरिक भोग लगाया गया।

उज्जैनी पर्व से जुड़ी मान्यताएं

ग्रामीणों का यह दृढ़ विश्वास है कि जब पूरा गांव मिलकर एक मन से इंद्रदेव की आराधना करता है और उन्हें खेतों में भोग अर्पित करता है, तो प्रकृति की रुष्ट शक्तियां शांत होती हैं। सौहार्दपूर्ण और भाईचारे के माहौल में संपन्न हुए इस आयोजन ने यह साबित कर दिया कि आज भी ग्रामीण भारत अपनी संस्कृति और परंपराओं से कितना जुड़ा हुआ है।

प्रकृति ने सुनी पुकार: रात में बरसे बदरा

शायद इसे ही सच्ची आस्था और सामूहिक प्रार्थना का चमत्कार कहते हैं। दिनभर जहां ग्रामीण मंदिरों में पूजा-पाठ और खेतों में अनुष्ठान कर रहे थे, वहीं उसी दिन रात करीब 9:30 बजे के बाद शहर और आसपास के इलाकों में अचानक मौसम ने करवट ली। आसमान में छाए बादलों ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ी और रिमझिम बूंदों के साथ धरती को भिगोना शुरू कर दिया।

रात के समय हुई इस बारिश की फुहारों ने न केवल गर्मी और उमस से बेहाल आम नागरिकों को बड़ी राहत दी, बल्कि किसानों के मुरझाए चेहरों पर भी मुस्कान लौटा दी। लोगों ने माना कि जैसे उनकी प्रार्थना सीधे देवलोक तक पहुंच गई हो और इंद्रदेव ने उनकी पुकार सुन ली हो। हालांकि कृषि जानकारों का मानना है कि फसलों को अभी और अधिक पानी की आवश्यकता है, लेकिन इस शुरुआती बारिश ने एक बड़ी राहत जरूर दी है और लोगों का विश्वास अपनी प्राचीन परंपराओं पर और अधिक मजबूत कर दिया है।

निष्कर्ष

आधुनिकता की दौड़ में भले ही हम विज्ञान और तकनीक पर बहुत अधिक निर्भर हो गए हैं, लेकिन रतलाम के इन गांवों की यह घटना यह याद दिलाती है कि आस्था, सामूहिक एकता और प्रकृति के प्रति समर्पण आज भी संकट के समय मनुष्य का सबसे बड़ा संबल हैं। कल्याण केदारेश्वर मंदिर की यह पूजा और सकरावदा की उज्जैनी इस बात का प्रमाण है कि जब इंसान मिलकर प्रयास करता है, तो कुदरत भी उसकी सुन ही लेती है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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