महाराष्ट्र के वर्धा जिले से एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है, जहां राजनीति के पेंच में फंसकर एक गरीब किसान का शव पिछले पांच दिनों से शवागार (मर्चुरी) में रखा हुआ है। मामला वर्धा जिले की सेलू तहसील के रायपुर जंगली गांव का है, जहां एक खूंखार बाघ के हमले में किसान भगवान धुर्वे की दर्दनाक मौत हो गई थी। इस घटना ने एक तरफ जहां जंगलों के पास रहने वाले ग्रामीणों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक और राजनीतिक उदासीनता ने मानवीय संवेदनाओं को तार-तार कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, भगवान धुर्वे अपने खेतों और जंगलों के आसपास के इलाके में वन्यजीव के अचानक हुए हमले का शिकार हो गए थे। इस दुखद हादसे में उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी। वन्यजीवों के हमलों में जनहानि होने पर शासन के नियमों के तहत पीड़ित परिवार को मुआवजा देने का स्पष्ट प्रावधान है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि भगवान धुर्वे की मौत अब एक परिवार के दुखद हादसे से आगे निकलकर राजनीतिक बयानबाजी और खींचतान का मुख्य केंद्र बन चुकी है।
स्थिति यह है कि जिस परिवार ने अपने घर का मुख्य कमाऊ सदस्य खो दिया है, वह पिछले पांच दिनों से अपने प्रियजन के अंतिम संस्कार के लिए तरस रहा है। शवागार में शव के पड़े रहने से परिजनों की मानसिक और भावनात्मक स्थिति का अंदाजा आसानी लगाया जा सकता है, लेकिन सियासत में व्यस्त लोगों को शायद इसकी कोई परवाह नहीं है।
राजनीतिक दखल और मुआवजे की मांग
इस पूरे प्रकरण में राजनेताओं की एंट्री के बाद मामला उलझता चला गया। नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) के सांसद अमर काले ने इस मामले में सीधे तौर पर हस्तक्षेप किया है। उनकी तरफ से मृतक के परिवार के एक आश्रित सदस्य को सरकारी नौकरी और 25 लाख रुपये के मुआवजे की मांग रखी गई है। इतना ही नहीं, यदि सरकार या प्रशासन नौकरी देने में असमर्थ रहता है, तो मुआवजे की राशि बढ़ाकर एक करोड़ रुपये किए जाने की मांग भी सामने आई है।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी मांगें प्रशासनिक नियमों और शासन के मौजूदा प्रावधानों के दायरे में आती हैं? यदि सरकारी नियमों में वन्यजीव हमले के मामलों में इस तरह की भारी-भरकम नौकरी या करोड़ों के मुआवजे का कोई प्रावधान ही नहीं है, तो फिर इस जिद पर अड़े रहना कि 'पहले मांगें पूरी हों, तभी अंतिम संस्कार होगा' किसके हित में है? क्या इससे मृतक की आत्मा को शांति मिल रही है या फिर पीड़ित परिवार की मुसीबतें और बढ़ रही हैं?
परिवार की वास्तविक स्थिति और संघर्ष
भगवान धुर्वे के परिवार में उनकी पत्नी और दो जवान बेटे हैं। इन दोनों बेटों की स्थिति ऐसी नहीं है कि वे उच्च वर्गीय जीवन जी सकें; वे रोजमजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। ऐसे संघर्षपूर्ण जीवन जीने वाले परिवार के लिए शासन के नियमों के तहत मिलने वाला तय मुआवजा भी एक बहुत बड़ा सहारा बन सकता है।
लेकिन विडंबना यह है कि इस साधारण और सीधे मुआवजे की प्रक्रिया को राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया गया है। जब हर रोज राजनीति के नाम पर बयान दागे जा रहे हैं, तब गरीब परिवार की वह पीड़ा दब कर रह गई है, जिसे इस वक्त सबसे ज्यादा सांत्वना और आर्थिक मदद की दरकार थी।
सत्ता और विपक्ष के बीच सियासी दंगल
इस घटना का एक और पहलू बेहद राजनीतिक है। यह दुर्घटना महाराष्ट्र के पालक मंत्री डॉ. पंकज भोयर के अपने निर्वाचन क्षेत्र (संसदीय या विधानसभा क्षेत्र) के अंतर्गत आती है। ऐसे में, स्थानीय राजनीति गरमाना स्वाभाविक था। विपक्ष को सरकार और सत्तापक्ष को घेरने का एक बड़ा मौका मिल गया है, और वे इस संवेदनशील घटना का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए कर रहे हैं।
जंगल के पास रहने वाले ग्रामीण पहले से ही बाघ और अन्य वन्यजीवों के खौफ के साए में जीने को मजबूर हैं। लेकिन इस तरह की घटनाओं पर जब राजनीति हावी हो जाती है, तो मूल समस्या यानी 'वन्यजीवों के आतंक से सुरक्षा' कहीं पीछे छूट जाती है।
जरूरी सवाल और समाधान की ओर कदम
- नियमों की स्पष्टता: सरकार और जिला प्रशासन को बिना किसी देरी के सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि मौजूदा नियमों के तहत नौकरी का कोई प्रावधान है या नहीं।
- तत्काल राहत: यदि नियम नौकरी की अनुमति नहीं देते हैं, तो जो कानूनी और वित्तीय मुआवजा तय है, उसे बिना एक भी दिन गंवाए तत्काल पीड़ित परिवार के बैंक खाते में या उनके सुपुर्द किया जाना चाहिए।
- जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी: राजनेताओं और जनप्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अव्यवहारिक और नियमों से बाहर की शर्तों पर अड़ने के बजाय, पीड़ित परिवार को जल्द से जल्द राहत दिलाने के लिए प्रशासन पर सकारात्मक दबाव बनाएं।
मानवता सर्वोपरी
पाँच दिन बीत जाने के बाद भी एक शव का शवागार में रखा रहना किसी भी सभ्य और संवेदनशील समाज के माथे पर कलंक की तरह है। राजनीति जीवन के बाद भी की जा सकती है, चुनाव और सियासी रोटियां सेकने के मौके आगे भी मिलते रहेंगे, लेकिन किसी की अंतिम विदाई और उसके परिवार की गरिमा से बड़ा कुछ नहीं हो सकता।
अब समय आ गया है कि तमाम दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी पक्ष एक साथ आएं। मृतक भगवान धुर्वे को सम्मानजनक अंतिम विदाई दी जाए और उनके गरीब परिवार को तुरंत आर्थिक संबल प्रदान किया जाए, ताकि वे इस भारी दुख की घड़ी से उबर सकें।