भक्ति, इतिहास और संस्कृति के अनूठे संगम का प्रतीक गणेशोत्सव साल 2026 में पूरे उल्लास के साथ शुरू हो रहा है। विघ्नहर्ता भगवान गणेश के स्वागत के लिए देश का कोना-कोना सज चुका है। इसी कड़ी में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का ऐतिहासिक गोलबाजार गणेशोत्सव इन दिनों अपनी गौरवशाली परंपरा और 137 साल पुराने इतिहास को लेकर खासी चर्चा में है। आज हम आपको ले चलते हैं उसी ऐतिहासिक पन्नों की ओर, जहां से स्वतंत्रता संग्राम की सुगबुगाहट के साथ इस उत्सव की नींव रखी गई थी और कैसे यह आयोजन आज भव्यता का प्रतीक बन चुका है।
1893 की वह क्रांति और गोलबाजार का पुराना हनुमान मंदिर
वर्ष 1893 में जब महान स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने ब्रिटिश शासन की नींव हिलाने के लिए सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत की थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह परंपरा देश के कोने-कोने में जन-आंदोलन का रूप ले लेगी। महाराष्ट्र के पुणे से शुरू हुई इस सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना की लहर बहुत जल्द देश के अन्य हिस्सों में भी पहुंच गई।
रायपुर के व्यस्ततम इलाके गोलबाजार स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर इस ऐतिहासिक आंदोलन का जीवंत गवाह रहा है। मंदिर के तलघर (Basement) से इस गणेशोत्सव की शुरुआत हुई थी। इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उस दौर में आजादी के दीवाने इसी मंदिर के तलघर में बैठकर गुप्त बैठकें करते थे और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ 'भारत छोड़ो' जैसे आंदोलनों की रूपरेखा तैयार करते थे। यह स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति की अलख जगाने का एक मजबूत ठिकाना भी था।
महज 7-8 लोगों से शुरू हुआ सफर, आज बना विशाल कारवां
शुरुआती दौर में जब इस उत्सव की नींव रखी गई थी, तब इसे महज 7 से 8 लोगों ने मिलकर शुरू किया था। श्री बजरंग नवयुवक मित्र मंडल गणेश उत्सव समिति हनुमान मंदिर गोलबाजार के बैनर तले यह आयोजन हर साल अपनी भव्यता और अनुशासन के लिए जाना जाता है। इस समिति के माध्यम से परंपराओं को जीवित रखने का अनूठा प्रयास पिछले कई दशकों से लगातार जारी है।
इस ऐतिहासिक उत्सव को पिछले 37 वर्षों से अधिक समय से संवार रहे और इसका नेतृत्व कर रहे प्रमुख मार्गदर्शक केदारनाथ गुप्ता बताते हैं कि, 'हमारे गोलबाजार का गणेश उत्सव इतिहास के कई अहम पड़ावों से गुजरकर आज इस मुकाम पर पहुंचा है। जब इसकी शुरुआत हुई थी, तब बालचंद केशरवानी, मनीमजी और सुखनंदन लाल जैसे गिने-चुने लोगों ने इसकी बागडोर संभाली थी।' समय के साथ कारवां बढ़ता गया और आज लगभग 70 समर्पित सदस्यों की एक मजबूत टीम इस पूरे आयोजन का कुशल संचालन कर रही है, जिसमें विवेकानंद गुप्ता, अध्यक्ष राजा पंसारी, सचिव निनय राजू गुप्ता, सत्यनारायण देवांगन और कोषाध्यक्ष देवनायण पंसारी, दीपक गुप्ता, गणेश राव रावत जैसे नाम प्रमुख रूप से शामिल हैं।यहीं से हुई थी अमरनाथ गुफा की अनूठी झांकी की शुरुआत
आज के दौर में गणेश पंडालों में तरह-तरह की भव्य झांकियां देखना आम बात हो गई है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में भव्य झांकियां बनाने का चलन कहां से शुरू हुआ था? इसका श्रेय भी इसी गोलबाजार के हनुमान मंदिर गणेशोत्सव समिति को जाता है।
साल 1999 तक पंडालों में झांकियां बनाने का ज्यादा प्रचलन नहीं था। लेकिन गोलबाजार समिति ने लीक से हटकर कुछ नया करने की ठानी और वर्ष 1999 में पहली बार यहां साक्षात बाबा अमरनाथ गुफा की भव्य झांकी का निर्माण किया गया। इस अद्भुत प्रयोग ने लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद यहां पाताल भैरवी, हनुमान लीला और चारों धाम के दर्शन कराने वाली एक से बढ़कर एक मनमोहक झांकियां बनाई गईं, जिन्हें देखने के लिए दूर-दूर से लोग उमड़ने लगे।
750 ग्राम सोने के मुकुट से होता है प्रथम अभिषेक
इस गणेशोत्सव की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बप्पा के शृंगार के लिए विशेष तैयारियां की जाती हैं। आज से करीब सात साल पहले भगवान गणेश के लिए एक भव्य और चमचमाता हुआ 750 ग्राम शुद्ध सोने का मुकुट तैयार कराया गया था। हर साल गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर इसी स्वर्ण मुकुट से बप्पा का पहला अभिषेक किया जाता है।
इस आयोजन की दिव्यता इतनी है कि इसमें राज्य के मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, सांसद, विधायक और समाज के तमाम प्रतिष्ठित लोग अपनी हाजिरी लगाने पहुंचते हैं। गणेश चतुर्थी के दिन से शुरू होने वाले इस अनुष्ठान में सोने का यह मुकुट भगवान गणेश के साथ विसर्जन कुंड तक यात्रा करता है। वहां पूरी विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ अर्चना करने के बाद इसे सुरक्षित वापस लाया जाता है, ताकि अगले साल फिर से इसी से अभिषेक किया जा सके।
वर्ष 2026 में तिरुपति बालाजी के स्वरूप में दर्शन देंगे विघ्नहर्ता
हर साल गोलबाजार के इस प्राचीन पंडाल में भगवान गणेश अपनी माता रिद्धि और सिद्धि के साथ विराजते हैं, जो कि यहां की एक पारंपरिक विशेषता है। लेकिन इस बार (वर्ष 2026) का आयोजन कुछ बेहद खास होने जा रहा है।
इस बार भक्तों को भगवान गणेश के साथ-साथ दक्षिण भारत के प्रसिद्ध धाम 'तिरुपति बालाजी' के अद्भुत दर्शन प्राप्त होंगे। तिरुपति बालाजी के साथ माता पद्मावती और महालक्ष्मी भी एक ही पावन फ्रेम में भक्तों को आशीर्वाद देती हुई नजर आएंगी। इस दिव्य स्वरूप के दर्शन के लिए भक्तों में अभी से भारी उत्साह देखा जा रहा है। इसके साथ ही, यहाँ रोजाना भगवान को 3 से 4 किलो शुद्ध लड्डुओं का महाभोग अर्पित किया जाता है, जिसका प्रसाद लेने के लिए भक्तों की लंबी कतारें लगती हैं।
स्थापना का शुभ मुहूर्त और शास्त्रों के नियम
महामाया मंदिर के प्रख्यात पंडित मनोज शुक्ला के अनुसार, विघ्नहर्ता भगवान गणेश की स्थापना के लिए किसी विशेष या जटिल मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती है। शास्त्रों में इस बात का स्पष्ट वर्णन मिलता है कि गणपति स्वयं पधारते हैं, इसलिए उनका आह्वान कभी भी किया जा सकता है। पंचांग के अनुसार, गणेश चतुर्थी की तिथि पर सुबह से लेकर देर रात तक कभी भी बप्पा को अपने घर या पंडाल में विराजित करने का आह्वान करना पूरी तरह से शास्त्र सम्मत और मंगलकारी माना गया है।
निष्कर्ष
गोलबाजार का यह 137 साल पुराना गणेशोत्सव सिर्फ एक धार्मिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह हमारी उस सांस्कृतिक धरोहर और स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों की याद दिलाता है, जिसे हमारे पुरखों ने सींचा था। आधुनिकता की दौड़ में जहां आज सब कुछ डिजिटल हो गया है, वहीं रायपुर का यह प्राचीन उत्सव अपनी पुरानी मिट्टी की खुशबू, परंपरा की पवित्रता और ऐतिहासिक महत्व को आज भी पूरी शान के साथ संजोए हुए है।