अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में भारतीय-अमेरिकी दानदाताओं और मतदाताओं की पसंद में स्पष्ट विरोधाभास सामने आया है। संघीय चुनाव आयोग (FEC) के दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि समुदाय के प्रमुख दानदाताओं ने रिपब्लिकन उम्मीदवारों और समितियों को दिल खोलकर चंदा दिया है, जबकि आम मतदाता इसके विपरीत डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में झुके हुए हैं।
FEC के आंकड़ों के अनुसार, 11 प्रमुख भारतीय-अमेरिकी राजनीतिक दानदाताओं की समीक्षा में पाया गया कि उन्होंने 2026 के मध्यावधि चुनाव चक्र के दौरान रिपब्लिकन समितियों और समूहों को लगभग 1.08 करोड़ डॉलर (लगभग 10.8 मिलियन डॉलर) का योगदान दिया। इसके मुकाबले, डेमोक्रेटिक समितियों और समूहों को लगभग 33 लाख डॉलर (3.3 मिलियन डॉलर) ही मिले। इसका मतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी को मिलने वाला चंदा डेमोक्रेट्स की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक है। हालांकि, यह आंकड़ा सभी भारतीय-अमेरिकी राजनीतिक चंदे का प्रतिनिधित्व न करके केवल चुनिंदा बड़े दानदाताओं के एक नमूने पर आधारित है।
दानदाताओं और मतदाताओं की प्राथमिकताओं में अंतर
चुनिंदा बड़े दानदाताओं की वित्तीय प्राथमिकताओं और आम मतदाताओं के रुझान में बड़ा अंतर देखा गया है। 2026 के एपीपीआई वोटर सर्वे (AAPI Voter Survey) के अनुसार, सर्वे में शामिल एशियाई भारतीय उत्तरदाताओं में से 66 प्रतिशत ने सीनेट के डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों का समर्थन किया, जबकि रिपब्लिकन के पक्ष में केवल 18 प्रतिशत लोग थे। हालांकि, इस उप-समूह में सीनेट के उम्मीदवार वाले सवाल का जवाब देने वाले एशियाई भारतीय उत्तरदाताओं की संख्या केवल 148 थी, इसलिए इन आंकड़ों को सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए। कुल 2,066 उत्तरदाताओं में से 242 भारतीय-अमेरिकी पंजीकृत मतदाता इस सर्वेक्षण का हिस्सा थे।
दूसरी ओर, बड़े दानदाताओं में यह झुकाव रिपब्लिकन पार्टी की ओर साफ नजर आता है। इस सूची में सबसे आगे आशा जडेजा मोटवानी हैं, जिन्होंने अकेले 51 लाख डॉलर से अधिक का योगदान दिया। इसके अलावा, कृष्णा त्रिपुरनेनी और अंजनी सिन्हा ने मिलकर लगभग 20 लाख डॉलर का चंदा दिया। पेलेंटिर के कार्यकारी श्याम संकर के प्रत्यक्ष राजनीतिक योगदान का कुल योग लगभग 1.5 मिलियन डॉलर है, जबकि संकर फैमिली ट्रस्ट ने मई 2025 में रिपब्लिकन नेशनल कमेटी को 2.5 लाख डॉलर दिए। संकर ने 15 जुलाई को अमेरिकन 4 सिक्योरिटी पीएसी को भी 2.5 लाख डॉलर का योगदान दिया।
भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेट्स के खिलाफ भी गया फंड
समीक्षा में यह भी सामने आया कि संयुक्त धन जुटाने वाली समितियों के माध्यम से दिए गए चंदे का कुछ हिस्सा उन उम्मीदवारों के खिलाफ भी इस्तेमाल हुआ, जिनके सामने भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेट उम्मीदवार मैदान में हैं। हाउस रिपब्लिकन समिति 'ग्रो द मेजॉरिटी' (Grow the Majority) ने मोटवानी और संकर के चंदे से जेय फीली को 7,000 डॉलर दिए, जो एरिज़ोना के पहले जिले में डेमोक्रेट अमीश शाह के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। इसी तरह, 'इम्मर मेजॉरिटी बिल्डर्स' के जरिए संकर के नाम से जुड़ा 3,500 डॉलर का हिस्सा केसी अस्कर को गया, जो फ्लोरिडा के 22वें जिले में डेमोक्रेट पिया डंडिया के खिलाफ ताल ठोक रहे हैं। बहरी समूहों ने शाह और डंडिया के खिलाफ लगभग 1.16 करोड़ डॉलर खर्च किए हैं, हालांकि इस खर्च को सीधे इन दानदाताओं से नहीं जोड़ा गया है।
दूसरी तरफ, डेमोक्रेटिक पाले में वेंचर कैपिटलिस्ट विनोद खॉस्ला सबसे बड़े भारतीय-अमेरिकी दानदाता रहे, जिन्होंने लगभग 21 लाख डॉलर का योगदान दिया। उनका लगभग पूरा चंदा सीनेट मेजॉरिटी पीएसी को गया। इसके अलावा, 'इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट' के राजनीतिक विंग 'द इम्पैक्ट फंड' ने अभियान वित्त रिकॉर्ड के अनुसार लगभग 19.2 लाख डॉलर की प्राप्ति दर्ज की और 30 सितंबर तक उनके पास लगभग 3,31,000 डॉलर की नकदी बची थी। इस फंड को वेस्टब्रिज कैपिटल के सुमीर चड्ढा से 500,000 डॉलर का सबसे बड़ा योगदान मिला। समिति के कुल प्राप्तियों को केवल भारतीय-अमेरिकी दानदाताओं के चंदे का एकमात्र पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।