मध्य प्रदेश के चर्चित बागेश्वर धाम नाबालिग दुष्कर्म मामले में न्याय की मांग और कानूनी प्रक्रिया में एक नया और बेहद अहम मोड़ आ चुका है। राज्य के उच्च न्यायालय ने इस गंभीर प्रकरण की गहराई से तह तक जाने के लिए विशेष जांच दल यानी एसआईटी (SIT) के गठन का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत का यह सख्त कदम ऐसे समय में सामने आया है जब इस मामले की कड़ियां उलझती हुई नजर आ रही थीं और डीएनए रिपोर्ट तथा पीड़िता के बयानों में विरोधाभास देखने को मिला था।
हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच का बड़ा फैसला
मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच के न्यायमूर्ति अजय कुमार निरंकारी की सिंगल बेंच ने इस मामले की सुनावई करते हुए छतरपुर जिले के पुलिस अधीक्षक (SP) को एक विशेष जांच टीम (SIT) गठित करने का हुक्म दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि इस हाई-प्रोफाइल मामले से जुड़े हर एक पहलू की नए सिरे से निष्पक्ष और बारीकी से जांच की जानी चाहिए ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके। इसी सुनवाई के दौरान अदालत ने मुख्य आरोपी राजू जाटव की तरफ से दाखिल की गई दूसरी जमानत याचिका को भी सिरे से खारिज कर दिया है।
क्या है पूरा घटनाक्रम और कैसे शुरू हुआ विवाद?
यह पूरा मामला इसी साल यानी मार्च 2026 का है, जब लगभग 16 साल की एक नाबालिग अपने घर से अचानक लापता हो गई थी। शुरुआती पुलिस जांच में जो बातें सामने आईं, उनके मुताबिक 15 मार्च को यह नाबालिग घर छोड़कर सीधे बागेश्वर धाम पहुंच गई थी। धाम पहुंचने के दो दिन बाद उसकी मुलाकात आरोपी राजू जाटव से हुई। आरोप है कि इसके बाद राजू जाटव उसे अपने साथ बहला-फुसलाकर ले गया और करीब 15 दिनों तक उसे अपने कब्जे में रखा।
परिवार की शिकायत और पुलिस की सक्रियता के बाद आखिरकार पुलिस ने आरोपी की पत्नी की निशानदेही पर नाबालिग को सुरक्षित बरामद कर लिया था। बरामदगी के दौरान पुलिस को यह चौंकाने वाला मेडिकल तथ्य पता चला कि नाबालिग करीब दो महीने की गर्भवती थी। चूंकि मामला एक नाबालिग से जुड़ा हुआ था और कानूनन यह बेहद संवेदनशील था, इसलिए मेडिकल बोर्ड की सलाह पर उसका गर्भपात कराया गया। इस प्रक्रिया के दौरान भ्रूण और प्लेसेंटा (Placenta) को सुरक्षित रखवाकर फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया था ताकि आगे की कानूनी कार्रवाई में ठोस सबूत मिल सकें।
डीएनए रिपोर्ट और बयानों में बदलाव ने उलझाई गुत्थी
इस केस में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब फोरेंसिक लैब से डीएनए (DNA) रिपोर्ट सामने आई। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य उजागर हुआ कि आरोपी राजू जाटव के डीएनए का मिलान नाबालिग के गर्भ से मिले भ्रूण से नहीं हुआ है। यानी वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर राजू जाटव को उस भ्रूण का जैविक (Biological) पिता नहीं पाया गया।
इसके अलावा, कानूनी प्रक्रिया और ट्रायल के दौरान एक और दिलचस्प मोड़ आया। सुनवाई के दौरान जब पीड़िता यानी नाबालिग के बयान दर्ज किए गए, तो उसने अपने शुरुआती पुलिस बयानों से कुछ अलग बातें कहीं। बयानों में आए इस बदलाव और डीएनए रिपोर्ट के निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए ही हाईकोर्ट ने महसूस किया कि इस मामले की ऊपरी सतह के पीछे कुछ और अनसुलझे पहलू हो सकते हैं, जिसके चलते जांच का दायरा बढ़ाया जाना जरूरी था।
दो महीने के भीतर SIT को सौंपनी होगी रिपोर्ट
माननीय उच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के मुताबिक, गठित की जाने वाली एसआईटी (SIT) को आगामी दो महीनों के भीतर पूरे घटनाक्रम की नए सिरे से तफ्तीश करनी होगी। यह विशेष टीम तमाम परिस्थितियों, मेडिकल रिपोर्ट्स, गवाहों के बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों का गहराई से विश्लेषण करेगी।
एसआईटी मूल रूप से इन दो बड़े सवालों के जवाब तलाशेगी:
- नाबालिग के साथ यौन अपराध का असल और पूरा घटनाक्रम क्या था?
- नाबालिग के गर्भ से मिले भ्रूण का वास्तविक जैविक पिता आखिर कौन है?
जांच टीम डीएनए रिपोर्ट और ट्रायल के दौरान पीड़िता द्वारा दिए गए बयानों के विरोधाभास को भी अपनी मुख्य जांच का हिस्सा बनाएगी, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की पुरानी अपील फिर चर्चा में
इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री द्वारा पूर्व में की गई एक अपील की चर्चा एक बार फिर से तेज हो गई है। घटना से पहले और विभिन्न अवसरों पर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री सार्वजनिक तौर पर महिलाओं, युवतियों और बच्चियों से यह अपील कर चुके हैं कि वे अकेले आश्रम न आएं।
उन्होंने अपने श्रद्धालुओं और भक्तों को कड़े शब्दों में आगाह किया था कि कोई भी महिला या युवती अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के बिना उनके धाम का रुख न करे। उन्होंने यह भी कहा था कि यदि किसी अनिवार्य परिस्थिति में आना पड़े भी, तो वहां मौजूद किसी भी अज्ञात सेवादार या अन्य पुरुष पर आंख मूंदकर भरोसा न करें। बाबा ने तर्क दिया था कि बागेश्वर धाम का आश्रम परिसर लगभग 5 किलोमीटर के बड़े दायरे में फैला हुआ है, और इतने विशाल क्षेत्र में आने वाले हर एक व्यक्ति पर व्यक्तिगत रूप से नजर रखना या सुरक्षा व्यवस्था संभालना उनके या प्रशासन के लिए हर समय मुमकिन नहीं होता है।
आगे क्या होगी कानूनी कार्रवाई?
चूंकि आरोपी राजू जाटव की दूसरी जमानत याचिका भी अदालत द्वारा खारिज की जा चुकी है, ऐसे में उसका जेल से बाहर आना फिलहाल मुमकिन नहीं है। अब सबकी निगाहें छतरपुर पुलिस द्वारा गठित की जाने वाली उस एसआईटी पर टिकी हैं जिसे अगले दो महीनों के भीतर अपनी रिपोर्ट अदालत के सामने पेश करनी है। इस हाई-प्रोफाइल मामले में आने वाले दिन और भी ज्यादा खुलासे कर सकते हैं, क्योंकि वैज्ञानिक साक्ष्यों और बयानों की टकराहट के बीच असली सच का बाहर आना बेहद जरूरी हो गया है।