मध्य प्रदेश के सुदूर और आदिवासी बाहुल्य जिलों में शुमार बालाघाट से एक बेहद झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है। यहां स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और प्रशासनिक लापरवाही के चलते एक के बाद एक कई मासूमों की जान चली गई है। आधिकारिक आंकड़ों और स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब तक लगभग 30 से अधिक आदिवासी बच्चों की इस क्षेत्र में मौत हो चुकी है, जिसके बाद से राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। इस गंभीर स्थिति का जायजा लेने के लिए हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दीपके व्यक्तिगत रूप से बालाघाट के प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात कर उनका दर्द बांटा।
अभिजीत दीपके का तीखा हमला: 'सरकार और मंत्री सीधे तौर पर जिम्मेदार'
बालाघाट के दौरे के दौरान अभिजीत दीपके ने राज्य सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इन मासूम आदिवासी बच्चों की मौत कोई सामान्य घटना नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से प्रशासनिक और व्यवस्थागत हत्या है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की अनदेखी के कारण इन क्षेत्रों के बच्चों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं तक नसीब नहीं हो रही हैं। समय पर टीकाकरण न होना और पीने के लिए शुद्ध पानी का अभाव इन मौतों का सबसे बड़ा कारण बन रहा है।
दीपके ने मीडिया और स्थानीय लोगों से बात करते हुए कहा, "आदिवासी इलाकों के बच्चे जिस तरह से लगातार बीमार होकर दम तोड़ रहे हैं, वह शासन-प्रशासन के मुंह पर एक बड़ा तमाचा है। आज भी हमारे देश के कई हिस्सों में लोग झीरिया का गंदा पानी पीने को मजबूर हैं। हमने और जनता ने अपने जनप्रतिनिधियों को इसलिए नहीं चुना था कि वे केवल हेलीकॉप्टरों में उड़ान भरें या आलीशान सरकारी बंगले बनाएं। जनता की सुध लेना उनका पहला कर्तव्य है।" उन्होंने इस पूरी त्रासदी के लिए सीधे तौर पर संबंधित विभागों के मंत्रियों और प्रमुख सचिवों को जिम्मेदार ठहराया है।
बुनियादी सुविधाओं का टोटा: झीरिया का पानी पीने को मजबूर ग्रामीण
ग्राउंड जीरो पर जाकर स्थिति का जायजा लेने वाले अभिजीत दीपके ने बताया कि गांवों की जमीनी हकीकत दावों से कोसों दूर है। सुदूर वनों और पहाड़ियों के बीच बसे इन आदिवासी गांवों में न तो अस्पताल समय पर खुलते हैं और न ही डॉक्टरों की उपलब्धता रहती है। पीने के शुद्ध पानी के नाम पर लोगों के पास केवल प्राकृतिक स्रोत या झीरिया का दूषित पानी बचा है, जिसे पीने से बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
- शुद्ध पेयजल की कमी: पीने के साफ पानी के अभाव में लोग दूषित जल पीने को विवश हैं।
- चिकित्सा सुविधाओं का अभाव: समय पर इलाज और दवाइयां न मिलने से सामान्य बीमारियां भी गंभीर रूप ले लेती हैं।
- पोषण की भारी कमी: बच्चों को आंगनवाड़ी या अन्य योजनाओं के तहत मिलने वाला पोषण आहार नियमित रूप से नहीं मिल रहा है।
- टीकाकरण में लापरवाही: स्वास्थ्य विभाग की टीमें समय पर इन दुर्गम इलाकों में नहीं पहुंचती हैं।
अंतिम संस्कार को लेकर गंभीर आरोप और आंकड़ों का फेर
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट के जरिए दावा किया है कि मृतकों की वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों (जो कि 36 तक बताए जा रहे हैं) से कहीं ज्यादा हो सकती है। उनका यह भी आरोप है कि विरोध-प्रदर्शन और मामले के तूल पकड़ने के बाद हाल ही में बड़ी संख्या में यानी लगभग 86 बच्चों को एक साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
इससे भी ज्यादा संवेदनशील मामला यह उठाया गया है कि कुछ बच्चों के शवों का अंतिम संस्कार बिना पोस्टमार्टम के ही जल्दबाजी में कर दिया गया। यहां तक कि कई मामलों में माता-पिता की गैर-मौजूदगी में भी अंतिम संस्कार किए जाने की बात सामने आ रही है, जो प्रशासनिक पारदर्शिता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।
बड़ा आंदोलन छेड़ने की चेतावनी
पीड़ित परिवारों से मिलने के बाद अभिजीत दीपके ने प्रशासन को स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने मांग की है कि इस पूरी लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को तुरंत प्रभाव से निलंबित किया जाना चाहिए और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। दीपके ने घोषणा की है कि यदि पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिला और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में सुधार नहीं हुआ, तो उनकी पार्टी की ओर से बालाघाट में एक बहुत बड़ा जन-आंदोलन किया जाएगा। यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक दोषियों को सजा नहीं मिल जाती।
राष्ट्रीय स्तर पर भी गूंज चुका है मुद्दा
बालाघाट की यह घटना केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रही है, बल्कि इसकी गूंज राष्ट्रीय राजधानी तक पहुंच चुकी है। कुछ दिन पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी इस मामले पर गहरी चिंता जताई थी। उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से इस पूरी घटना को बेहद दुखद करार देते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव से व्यक्तिगत रूप से इस मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की थी।
भले ही राज्य सरकार की तरफ से पीड़ित परिवारों के लिए आर्थिक सहायता की घोषणा कर दी गई हो, लेकिन विपक्ष और विभिन्न सामाजिक संगठनों का मानना है कि केवल मुआवजे से बच्चों की जान वापस नहीं आएगी। सरकार को नीतिगत स्तर पर बदलाव करके इन आदिवासी बहुल जिलों में पक्की चिकित्सा व्यवस्था और शुद्ध पेयजल की स्थायी आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी, ताकि भविष्य में किसी अन्य मां को अपने जिगर के टुकड़े को इस तरह न खोना पड़े।