शिक्षा का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या यह केवल कुछ वर्षों की पढ़ाई और उसके बाद एक बेहतर नौकरी हासिल करने तक सीमित है, या फिर इसके दायरे में मनुष्य के भीतर छिपे संपूर्ण सामर्थ्य को जगाना भी शामिल है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने इस विषय पर एक बेहद गंभीर और विचारणीय दृष्टिकोण सामने रखा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली को केवल आजीविका कमाने का माध्यम नहीं बनना चाहिए, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य एक श्रेष्ठ, समर्थ और संवेदनशील इंसान का निर्माण होना चाहिए।
यह बात उन्होंने राजस्थान के नागौर जिले के गोटन स्थित प्रतिष्ठित एल.के. सिंघानिया एजुकेशन सेंटर के 37वें वार्षिक पारितोषिक वितरण समारोह 'स्वराज' को संबोधित करते हुए कही। उनके इस संबोधन ने शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका और आज के दौर में दी जा रही शिक्षा की दिशा पर एक बार फिर से गहन मंथन शुरू कर दिया है।
परिवार और संस्कारों की नींव: मनुष्य और पशु में अंतर
डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि केवल स्कूल या कॉलेज के चार दीवारों के भीतर मिलने वाली किताबी शिक्षा ही काफी नहीं होती। विद्यार्थी के व्यक्तित्व और उसके आचरण की मजबूत नींव तैयार करने में उसके परिवार, आस-पास के परिवेश और समाज से मिलने वाले संस्कारों की सबसे बड़ी भूमिका होती है।
उन्होंने प्रकृति और जीव जगत का उदाहरण देते हुए समझाया कि आहार, निद्रा, भय और मैथुन जैसी मूल प्रवृत्तियां तो पशुओं में भी समान रूप से पाई जाती हैं। फिर इंसानों और पशुओं में असल फर्क क्या है? प्रकृति ने मनुष्य को एक विशिष्ट उपहार दिया है—वह है विवेक और विचार करने की असीम शक्ति। इसी बौद्धिक और मानसिक शक्ति के बल पर एक साधारण मनुष्य 'नर से नारायण' बनने की उच्च यात्रा तय कर सकता है।
'सद्विचार से प्रेरित कर्म इंसान को देवत्व की ऊंचाइयों तक ले जाते हैं, जबकि गलत विचार और आचरण उसके पतन का मार्ग प्रशस्त करते हैं।'
— डॉ. मोहन भागवत, सरसंघचालक (आरएसएस)
सत्य और सामर्थ्य का अटूट संबंध
कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक ने सामर्थ्य और सत्य के बीच के गहरे और व्यावहारिक समीकरण पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि इतिहास इस बात गवाह है कि केवल सत्य होना ही पर्याप्त नहीं होता, यदि उसके साथ शक्ति या सामर्थ्य न हो तो सत्य भी कई बार प्रभावहीन होकर रह जाता है।
- व्यक्ति से लेकर राष्ट्र स्तर तक शरीर, मन, बुद्धि और ज्ञान का सामर्थ्य होना अनिवार्य है।
- जब देश का आर्थिक और सामरिक सामर्थ्य मजबूत होता है, तभी दुनिया उसके विचारों को पूरी गंभीरता से सुनती है।
- कमजोर पक्षों की बात को अक्सर वैश्विक मंचों पर वह तरजीह नहीं मिलती जो एक सक्षम राष्ट्र को मिलती है।
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत की बढ़ती हुई साख और उसकी मजबूत होती स्थिति इसी सामर्थ्य का परिणाम है, जिसके चलते आज पूरी दुनिया भारतीय संस्कृति, दर्शन और ज्ञान को न केवल सुन रही है बल्कि उसका अनुसरण भी कर रही है।
सफलता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है जीवन की सार्थकता
आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती करियर में सफल होने की अंधी दौड़ है। इस पर चर्चा करते हुए डॉ. भागवत ने बहुत ही गहरा संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जीवन में केवल 'सफल' हो जाना ही सब कुछ नहीं है, बल्कि जीवन का 'सार्थक' होना उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण और संतोषजनक है।
उन्होंने समझाया कि किसी भी व्यक्ति के जीवन में सफलता या असफलता उसके अपने कड़े प्रयासों के साथ-साथ उसके प्रारब्ध (भाग्य) पर भी निर्भर कर सकती है, लेकिन परमार्थ की भावना यानी दूसरों की भलाई के लिए किया गया कर्म इंसान को ऐसा स्थायी सम्मान दिलाता है जो सदियों तक याद रखा जाता है।
इतिहास भी उन्हीं महान हस्तियों के नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करता है जिन्होंने अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इस श्रेणी में दानवीर भामाशाह, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, स्वामी विवेकानंद और देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले महान क्रांतिकारियों के नाम सबसे ऊपर आते हैं।
पंचकोशों का विकास और सर्वांगीण शिक्षा प्रणाली
शिक्षा के स्वरूप पर बात करते हुए संघ प्रमुख ने शिक्षा में 'पंचकोशों के विकास' पर विशेष बल दिया। उन्होंने माना कि शिक्षण संस्थानों का दायरा केवल विज्ञान, गणित या अन्य बौद्धिक विषयों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। शिक्षा का कैनवास बहुत बड़ा होना चाहिए जिसमें कला, संगीत, खेल और योग जैसे तमाम क्षेत्र शामिल हों।
पारंपरिक खेलों का महत्व समझाते हुए उन्होंने कबड्डी का विशेष जिक्र किया। उनके अनुसार, कबड्डी जैसे खेल विद्यार्थियों को जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाते हैं—यह सिखाते हैं कि मैदान पर चाहे कितनी भी बार गिरना पड़े, हर बार फिर से उठकर खड़े होना ही असली विजेता की पहचान है। इसी प्रकार, संगीत और वाद्यवृंद छात्रों के मन, बुद्धि और शरीर के बीच एक अद्भुत सामंजस्य स्थापित करते हुए सामूहिक चेतना का विकास करते हैं।
मनुष्य निर्माण के तीर्थ बनें शिक्षण संस्थान
अपने संबोधन के अंत में डॉ. मोहन भागवत ने देश के सभी शिक्षण संस्थानों और विश्वविद्यालयों के संचालकों से एक आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्कूल और कॉलेज केवल छात्रों को डिग्रियां और उपाधियां बांटने वाले केंद्र बनकर न रह जाएं, बल्कि इन्हें 'मनुष्य निर्माण का जीवंत तीर्थ' बनना चाहिए।
इन परिसरों में युवा विद्यार्थियों के भीतर आत्मविश्वास, अडिग चरित्र, समाज के प्रति संवेदनशीलता और सबसे बढ़कर राष्ट्रभक्ति के मजबूत संस्कार सींचे जाने चाहिए। उन्होंने बहुत ही प्रेरक बात कही कि अपने लिए तो इस दुनिया में सभी जीते हैं और अपनी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, लेकिन जो व्यक्ति अपना संपूर्ण जीवन समाज और राष्ट्र के उत्थान के लिए समर्पित कर देता है, उसका जीवन ही वास्तविक अर्थों में सार्थक और प्रेरणादायक बनता है।