हिमालय केवल भारत का एक भौगोलिक भू-भाग या पहाड़ नहीं है, बल्कि यह हमारी सभ्यता, संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और संपूर्ण प्राकृतिक जीवन-व्यवस्था का मूल आधार है। यह बात हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता ने शनिवार को धर्मशाला में आयोजित एक उच्चस्तरीय संगोष्ठी के दौरान कही। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि हिमालय हमारी पहचान भी है, हमारी विरासत भी है और हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है। यदि समय रहते इसके संरक्षण को लेकर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
धर्मशाला में 'हिमालय संरक्षण से राष्ट्र निर्माण की ओर' विषय पर मंथन
शनिवार को धर्मशाला स्थित हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय और 'हिमालय परिवार, हिमाचल प्रदेश' के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय “हिमालय संरक्षण से राष्ट्र निर्माण की ओर” रखा गया था। इस गरिमामयी समारोह में राज्यपाल कविंद्र गुप्ता बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। उनके साथ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस.पी. बंसल और हिमालय परिवार के संस्थापक डॉ. इंद्रेश कुमार जैसे प्रबुद्ध विचारक भी मंच पर मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण और समाज से जुड़े कई अहम मुद्दों पर गहन चर्चा की गई। राज्यपाल ने अपने संबोधन की शुरुआत में ही देश और विशेषकर उत्तर भारत की जीवन-रेखा कही जाने वाली हिमालयी नदियों का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि हिमालय की गोद से निकलने वाली नदियां ही देश के विशाल भू-भाग को जीवन का वरदान देती हैं। यहां की अनमोल जैव विविधता, पारंपरिक ज्ञान, समृद्ध लोक संस्कृति और प्राकृतिक संसाधन हमारे लिए किसी अमूल्य धरोहर से कम नहीं हैं।
जलवायु परिवर्तन और आपदाओं की बढ़ती चेतावनी
अपने संबोधन में राज्यपाल ने हाल ही के वर्षों में पर्वतीय क्षेत्रों में बदले मौसम और गंभीर होती प्राकृतिक आपदाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज जलवायु परिवर्तन का असर साफ तौर पर देखा जा सकता है। जलस्रोतों का लगातार सूखना, वनाग्नि (जंगल की आग) की घटनाएं, बड़े पैमाने पर भूस्खलन और बादल फटने जैसी त्रासदियां इस बात का गंभीर संकेत हैं कि हिमालयी क्षेत्र अत्यधिक संवेदनशील हो चुका है।
राज्यपाल ने विशेष रूप से हाल ही में नेपाल में आई प्राकृतिक आपदा का उदाहरण देते हुए कहा कि हमें इस संवेदनशीलता को पूरी गंभीरता से समझना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब विकास और पर्यावरण के बीच किसी भी प्रकार के संघर्ष की कोई गुंजाइश नहीं है। विकास ऐसा होना चाहिए जो पर्यावरण के अनुकूल हो। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, समयबद्ध पूर्व चेतावनी प्रणाली (Early Warning System), आपदा प्रबंधन की पुख्ता तैयारी और स्थानीय समुदायों को प्रशिक्षित करना आज के समय की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री के 'एक पेड़ मां के नाम' अभियान का जिक्र
पर्यावरण को बचाने के लिए सामूहिक प्रयासों की वकालत करते हुए राज्यपाल ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लोकप्रिय अभियान “एक पेड़ मां के नाम” का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण का यह काम केवल सरकारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसमें देश के युवाओं और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी सबसे ज्यादा जरूरी है। भारत का वास्तविक विकास तभी संभव और सार्थक माना जाएगा, जब हमारी आर्थिक प्रगति के साथ-साथ पर्यावरणीय स्थिरता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण भी पूरी तरह सुनिश्चित हो सके।
'धर्मशाला घोषणा-2026' और जन आंदोलन की जरूरत
इस संगोष्ठी के दौरान 'धर्मशाला घोषणा-2026' भी प्रस्तुत की गई, जिसका राज्यपाल ने खुला स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने यह भी चेताया कि किसी भी नीति या घोषणा की सफलता केवल कागजी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन जमीन पर दिखना चाहिए।
उन्होंने आम जनता से आह्वान किया कि हिमालय के संरक्षण की शुरुआत हमें अपने घरों, स्कूलों, गांवों और अपने आसपास के परिवेश से करनी होगी। इसके लिए कुछ छोटे लेकिन बेहद असरदार कदम उठाए जा सकते हैं:
- दैनिक जीवन में प्लास्टिक का उपयोग न्यूनतम करना।
- अपने आसपास अधिक से अधिक पेड़ों की रक्षा करना और नए पौधे लगाना।
- स्थानीय जैव विविधता और पारिस्थितिकी को समझना।
- आपदा के समय आगे आकर स्वयंसेवा (Volunteering) करना।
- अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, भाषा और परंपराओं को सहेजकर आगे बढ़ाना।
यदि हर नागरिक इन बातों का ध्यान रखे, तो इसका व्यापक और सकारात्मक प्रभाव पूरे हिमालयी क्षेत्र पर पड़ेगा।
महत्वपूर्ण पुस्तकों का हुआ विमोचन
संगोष्ठी के इस महत्वपूर्ण अवसर पर विभिन्न विषयों पर आधारित दो प्रमुख पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। राज्यपाल ने अपने कर-कमलों से इन पुस्तकों को जारी किया:
- अशोक बेरी द्वारा लिखित पुस्तक: ”समरस समाज- विकसित भारत का आधार“
- प्रेम कैथ द्वारा लिखित पुस्तक: “हैंडबुक आॅन हिमाचल प्रदेश एक्साईज लाॅ“
लेखकों को बधाई देते हुए राज्यपाल ने कहा कि ऐसी पुस्तकें समाज में समरसता की भावना जगाती हैं, राष्ट्र निर्माण के मार्ग को प्रशस्त करती हैं और प्रशासनिक क्षेत्र से जुड़े लोगों को व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करती हैं।
दिग्गजों ने रखे अपने विचार
कार्यक्रम के दौरान हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. एस.पी. बंसल ने विश्वविद्यालय की शैक्षणिक और शोध गतिविधियों के बारे में बताया जो पर्यावरण और हिमालयी अध्ययन से जुड़ी हैं। वहीं, हिमालय परिवार के संस्थापक डॉ. इंद्रेश कुमार ने भी अपने उद्बोधन में हिमालय की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिमालय को बचाना केवल भौगोलिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता को बचाने की लड़ाई है।
इस आयोजन में राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अशोक बेरी, राष्ट्रीय कार्यकारिणी अध्यक्ष डॉ. परमजीत सिंह गिल, पंजाब विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के चेयरमैन हिमांशु अग्रवाल, हिमालय परिवार हिमाचल प्रदेश के प्रांतीय अध्यक्ष मोहिंदर सिंह सलारिया सहित कई गणमान्य पदाधिकारी, विश्वविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी, प्रशासनिक अधिकारी और बड़ी संख्या में युवा प्रतिभागी उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि हिमालय के संरक्षण के लिए वे समाज के हर वर्ग को जागरूक करेंगे।