सुपौल। बिहार के सुपौल जिले के त्रिवेणीगंज में एक परिवार पर पहले तीन साल के मासूम की मौत का पहाड़ टूटा और उसके बाद शव को घर तक पहुंचाने के लिए वाहन की व्यवस्था नहीं होने से उनकी परेशानी और बढ़ गई। सर्पदंश के बाद अनुमंडलीय अस्पताल लाए गए तीन वर्षीय शहवाज को चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया। इसके बाद दादा याकूब अपने पोते का शव कंधे पर लेकर वाहन की तलाश करते रहे।
मामला त्रिवेणीगंज क्षेत्र के कुमयाही वार्ड संख्या 13 का बताया जा रहा है। शहवाज, मो. वासिम का तीन वर्षीय बेटा था। रविवार शाम वह घर के आसपास खेल रहा था, इसी दौरान उसे सांप ने डस लिया।
परिजन बच्चे को तत्काल त्रिवेणीगंज अनुमंडलीय अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन जांच के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
अस्पताल से घर तक शव ले जाना बन गया दूसरी चुनौती
बच्चे की मौत के बाद परिवार उसे घर ले जाना चाहता था, लेकिन परिजनों के सामने वाहन की समस्या खड़ी हो गई।
परिवार के मुताबिक, शव ले जाने के लिए तत्काल कोई साधन उपलब्ध नहीं हो सका। इसके बाद बच्चे के दादा याकूब शव को कंधे पर लेकर अस्पताल परिसर से बाहर निकले।
उन्होंने सड़क पर गुजर रहे ऑटो और ई-रिक्शा चालकों से मदद मांगी। रिपोर्ट के अनुसार, शव होने की जानकारी मिलने के बाद वाहन चालक उसे ले जाने को तैयार नहीं हुए।
इस दौरान बच्चे की मां रबीना खातून और परिवार की अन्य महिलाएं भी अस्पताल के आसपास मौजूद रहीं।
सिविल सर्जन तक पहुंची बात, फिर हुई वाहन की व्यवस्था
मामले की जानकारी बाद में सुपौल के सिविल सर्जन तक पहुंची। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन सक्रिय हुआ और परिवार के लिए वाहन की व्यवस्था की गई।
आखिरकार बच्चे के शव को वाहन के जरिए उसके घर भेजा गया।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है कि किसी सरकारी अस्पताल में मरीज की मृत्यु होने के बाद जरूरतमंद परिवार के लिए शव परिवहन की तत्काल व्यवस्था किस स्तर पर उपलब्ध होनी चाहिए और ऐसी स्थिति में परिजन किससे संपर्क करें।
बिहार में शव वाहन बढ़ाने की पहले बन चुकी थी योजना
इस घटना का एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक संदर्भ भी है।
जनवरी 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बिहार के स्वास्थ्य विभाग ने राज्य की 102 एम्बुलेंस सेवा में 700 नई बेसिक लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस और 57 शव वाहन जोड़ने की योजना बनाई थी। उस समय राज्य में 1,575 एम्बुलेंस उपलब्ध होने की बात कही गई थी।
हालांकि उस योजना की अक्टूबर 2026 तक जिलेवार वास्तविक तैनाती की अद्यतन आधिकारिक सूची मुझे उपलब्ध स्रोतों में नहीं मिली। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि प्रस्तावित शव वाहनों में से कोई वाहन त्रिवेणीगंज अनुमंडलीय अस्पताल के लिए निर्धारित था या घटना के समय उसकी स्थिति क्या थी।
लेकिन इस घटना के बाद स्थानीय स्तर पर तीन सवाल महत्वपूर्ण हो जाते हैं—त्रिवेणीगंज में शव वाहन की वास्तविक उपलब्धता कितनी है, घटना के समय कोई वाहन उपलब्ध था या नहीं और परिवार को शुरुआत में ही वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं मिल पाई।
इन सवालों पर स्वास्थ्य विभाग का विस्तृत पक्ष सामने आने से स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
सर्पदंश केवल स्थानीय घटना नहीं, देश के लिए बड़ी स्वास्थ्य चुनौती
शहवाज की मौत का मामला सर्पदंश से जुड़ी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती की ओर भी ध्यान खींचता है।
भारत ने सर्पदंश से होने वाली मौतों और दिव्यांगता को कम करने के लिए National Action Plan for Prevention and Control of Snakebite Envenoming (NAPSE) तैयार किया है। इसका लक्ष्य 2030 तक snakebite से होने वाली मौतों और दिव्यांगता में 50 प्रतिशत कमी लाना है।
इस रणनीति में एंटी-स्नेक वेनम की उपलब्धता, स्वास्थ्यकर्मियों की ट्रेनिंग, बेहतर रेफरल सिस्टम, निगरानी और मरीज को समय पर स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचाने पर जोर दिया गया है।
सर्पदंश के मामलों में समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। विशेषज्ञ दिशानिर्देशों के अनुसार मरीज को जल्द से जल्द चिकित्सा सुविधा तक पहुंचाना चाहिए और झाड़-फूंक, घाव काटने, विष चूसने या बहुत कसकर बांधने जैसी पद्धतियों के कारण अस्पताल पहुंचने में देरी नहीं करनी चाहिए।
घटना इलाज से आगे अस्पताल की 'लास्ट-माइल' व्यवस्था पर भी सवाल
त्रिवेणीगंज की घटना में बच्चे को अस्पताल तक पहुंचाया गया, लेकिन मौत के बाद परिवार के सामने एक दूसरी समस्या खड़ी हुई—मृत बच्चे को सम्मानपूर्वक घर तक कैसे ले जाया जाए।
यही पहलू इस घटना को सिर्फ सर्पदंश से हुई मौत की खबर तक सीमित नहीं रखता।
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में एम्बुलेंस की संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि जरूरत के समय अस्पताल स्तर पर वाहन कितनी जल्दी उपलब्ध कराया जा सकता है, परिजनों को किस नंबर या अधिकारी से संपर्क करना है और वाहन उपलब्ध न होने पर तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था का प्रोटोकॉल क्या है।
यदि त्रिवेणीगंज मामले में प्रशासन विस्तृत जांच या स्पष्टीकरण जारी करता है तो इन सवालों का जवाब घटना की पूरी तस्वीर समझने के लिए अहम होगा।
तीन साल के शहवाज की मौत से परिवार में मातम
तीन वर्षीय शहवाज की अचानक मौत के बाद परिवार में मातम पसरा है। खेलने के दौरान सांप के डसने के बाद परिवार उसे बचाने की उम्मीद में अस्पताल लेकर पहुंचा था, लेकिन बच्चे की जान नहीं बचाई जा सकी।
इसके बाद शव घर ले जाने के लिए इंतजार और दादा का पोते को कंधे पर लेकर वाहन तलाशना परिवार के लिए इस दुखद घटना को और कठिन बना गया।
- अब इस मामले में स्वास्थ्य विभाग की ओर से यह स्पष्ट होना बाकी है कि घटना के समय त्रिवेणीगंज अनुमंडलीय अस्पताल में शव परिवहन की क्या व्यवस्था थी और वाहन उपलब्ध कराने में देरी किन परिस्थितियों में हुई।