साइबर अपराधियों के हौसले किस कदर बुलंद हो चुके हैं, इसकी एक बानगी हाल ही में महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (पूर्व में औरंगाबाद) में देखने को मिली है। डिजिटल अरेस्ट (Digital Arrest) के नाम पर हो रही ठगी के मामलों में लगातार इजाफा हो रहा है, और अब इन ठगों ने बैंक से सेवानिवृत्त (Retired) हो चुके कर्मचारियों को भी अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया है। ताजा मामला एक 67 वर्षीय पूर्व बैंककर्मी का है, जिन्हें ठगों ने आधार कार्ड के दुरुपयोग और आतंकवादियों को फंडिंग (Terror Funding) करने का ऐसा खौफ दिखाया कि उन्होंने अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा जालसाजों के खातों में ट्रांसफर कर दिया।
क्या है पूरा मामला? जानिए कैसे रची गई साजिश
प्राप्त जानकारी के अनुसार, छत्रपति संभाजीनगर के रहने वाले 67 वर्षीय बुजुर्ग, जो एक बैंक से बतौर अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, साइबर ठगी का शिकार बने। ठगों ने इतनी शातिर योजना बनाई कि पीड़ित बुजुर्ग को कुछ ही घंटों में मानसिक रूप से पूरी तरह तोड़ दिया। ठगों ने खुद को टेलीकॉम अथॉरिटी और मुंबई पुलिस का अधिकारी बताया। उन्होंने पीड़ित को वीडियो कॉल पर लेकर डराया कि उनके आधार कार्ड का इस्तेमाल करके एक बैंक खाता खोला गया है और उस खाते के जरिए देश विरोधी गतिविधियों यानी टेरर फंडिंग को अंजाम दिया जा रहा है।
एक बैंककर्मी होने के बावजूद, जब पीड़ित को पुलिस और कानून की धमकियां वीडियो कॉल पर दी गईं, तो वह दहशत में आ गए। ठगों ने उन्हें इस कदर डरा दिया कि उन्होंने बिना किसी से सलाह किए, अपनी बचत से 13 लाख रुपए जालसाजों द्वारा बताए गए खातों में आरटीजीएस (RTGS) और अन्य माध्यमों से ट्रांसफर कर दिए।
डिजिटल अरेस्ट: ठगी का नया और खतरनाक हथियार
हाल के दिनों में 'डिजिटल अरेस्ट' भारत में साइबर क्राइम का सबसे बड़ा और खतरनाक ट्रेंड बनकर उभरा है। इसमें ठग निम्नलिखित तरीकों का इस्तेमाल करते हैं:
- सरकारी एजेंसियों का फर्जी डर: ठग खुद को सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स, सीमा कस्टम या स्थानीय पुलिस का बड़ा अधिकारी बताते हैं।
- वीडियो कॉल पर पहरा: पीड़ित को स्काइप या अन्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप के जरिए घंटों तक वर्चुअली 'अरेस्ट' या नजरबंद रखा जाता है। उन्हें साफ निर्देश दिए जाते हैं कि वे कॉल नहीं काटेंगे और न ही किसी से इस बारे में बात करेंगे।
- फर्जी दस्तावेज दिखाना: पीड़ित के नाम पर अरेस्ट वारंट, सुप्रीम कोर्ट के फर्जी ऑर्डर या मनी लॉन्ड्रिंग के दस्तावेज भेजे जाते हैं।
- टेरर फंडिंग और ड्रग्स का एंगल: घबराहट पैदा करने के लिए अक्सर मनी लॉन्ड्रिंग, पार्सल में ड्रग्स मिलने या आतंकवादियों से तार जुड़े होने जैसी गंभीर बातें कही जाती हैं।
सेवानिवृत्त बैंककर्मी क्यों बने आसान शिकार?
यह सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है कि जो व्यक्ति खुद बैंक में काम कर चुका हो, वह ऐसी ठगी का शिकार कैसे बन गया? जानकारों का मानना है कि साइबर अपराधी अब बेहद मनोवैज्ञानिक तरीकों (Psychological Manipulation) का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे बुजुर्गों और सेवानिवृत्त लोगों को निशाना बनाते हैं क्योंकि:
बुजुर्ग लोग तकनीक (Technology) के मामलों में युवाओं जितने अपडेटेड नहीं होते हैं। इसके अलावा, समाज में उनकी एक प्रतिष्ठा होती है, और जब उन्हें अचानक यह कहा जाता है कि उनके दस्तावेजों का इस्तेमाल किसी गंभीर अपराध (जैसे टेरर फंडिंग) में हुआ है, तो वे कानूनी पचड़ों और बदनामी के डर से बुरी तरह घबरा जाते हैं। इसी घबराहट का फायदा उठाकर ठग उन्हें अपनी उंगलियों पर नचाते हैं।
पुलिस और साइबर सेल की चेतावनी
इस सनसनीखेज घटना के सामने आने के बाद छत्रपति संभाजीनगर की स्थानीय पुलिस और साइबर सेल हरकत में आ गई है। पुलिस अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि:
- कोई भी जांच एजेंसी (चाहे वह पुलिस हो, सीबीआई हो या इनकम टैक्स विभाग) कभी भी वीडियो कॉल पर पूछताछ या 'डिजिटल अरेस्ट' नहीं करती है।
- यदि आपके पास ऐसा कोई कॉल आता है, तो तुरंत फोन काट दें और घबराएं नहीं।
- तत्काल अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन या राष्ट्रीय साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 पर संपर्क करें।
बचाव के उपाय: सतर्कता ही सबसे बड़ा कवच
साइबर एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस तरह के फ्रॉड से बचने का एकमात्र तरीका 'सतर्कता' है। यदि आपको किसी भी अनजान नंबर से वीडियो कॉल आए और उसमें खुद को अधिकारी बताकर डराया जाए, तो तुरंत समझ जाएं कि वह एक फ्रॉड कॉल है। अपनी कोई भी निजी जानकारी, बैंक खाता नंबर, आधार कार्ड या ओटीपी किसी के साथ साझा न करें।
फिलहाल, छत्रपति संभाजीनगर पुलिस ने इस मामले में अज्ञात साइबर अपराधियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और जिन बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर किए गए हैं, उनकी डिटेल खंगाली जा रही है। लेकिन यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि जब तक समाज में डिजिटल साक्षरता और जागरूकता पूरी तरह नहीं फैलती, तब तक ऐसे शातिर ठग आम नागरिकों को अपनी ठगी का शिकार बनाते रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि हम अपने घर के बुजुर्गों को इन नए साइबर खतरों के बारे में समय रहते जागरूक करें।