संस्कृति, कला और संगीत की त्रिवेणी कहे जाने वाले ऐतिहासिक चक्रधर समारोह का आगाज़ इस वर्ष बेहद भव्य और अनूठे अंदाज में हुआ है। आयोजन के पहले ही दिन छत्तीसगढ़ी लोकधुनों और पारंपरिक कला की गूंज ने पूरे रायगढ़ शहर को संगीत के समंदर में डुबो दिया। महोत्सव के पहले दिन उमड़ी भारी भीड़ और दर्शकों का उत्साह यह बताने के लिए काफी था कि इस आयोजन का क्रेज लोगों के सिर चढ़कर बोल रहपारंपरिक वाद्ययंत्रों और लोकनृत्यों से सजी पहली शाम
समारोह के उद्घाटन सत्र के बाद जैसे ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शुरुआत हुई, पूरा वातावरण छत्तीसगढ़ी माटी की खुशबू से महक उठा। राज्य के कोने-कोने से पहुंचे लोक कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से ऐसा समां बांधा कि दर्शक अपनी कुर्सियों पर थिरकने को मजबूर हो गए। मांदड़, ढोल, ताशा और बांसुरी की गूंज के साथ जब करमा, सुआ और पंडवानी की प्रस्तुतियां हुईं, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
कलाकारों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा में छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का जो सजीव चित्रण किया, उसने नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का एक बेहतरीन अवसर प्रदान किया। स्थानीय लोगों का कहना था कि इस बार के समारोह की शुरुआत जिस ऊर्जा के साथ हुई है, उसने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ संगीत प्रेमियों में दिखा भारी उत्साह
रायगढ़ का यह प्रतिष्ठित समारोह केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हर साल कला प्रेमियों के लिए किसी महाकुंभ से कम नहीं होता। पहले दिन की शुरुआत को लेकर शहरवासियों में सुबह से ही गज़ब का उत्साह देखा गया। शाम ढलते ही मुख्य आयोजन स्थल पर दर्शकों का हुजूम उमड़ पड़ा। सुरक्षा और व्यवस्था को लेकर भी प्रशासन द्वारा पुख्ता इंतजाम किए गए थे, ताकि दर्शक बिना किसी बाधा के इस सांस्कृतिक धरोहर का आनंद ले सकपारंपरिक प्रस्तुतियां: छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और पारंपरिक नृत्यों का अद्भुत संगम।ेदर्शकों की भारी भीड रायगढ़ के इतिहास में पहले दिन जुटी सबसे बड़ी भीड़ में से एभव्य मंच सज्जा: कला और संगीत के अनुकूल बेहद आकर्षक और भव्य सेट डिजाइन।कसंस्कृति और कला का महाकुंभ।कला जगत के जानकारों का मानना है कि चक्रधर समारोह जैसे आयोजन हमारी विलुप्त होती लोक कलाओं को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाते हैं। आधुनिकता की दौड़ में जहां आज की पीढ़ी पश्चिमी संगीत की ओर आकर्षित हो रही है, वहीं ऐसे मंच हमारे युवाओं को अपनी समृद्ध विरासत पर गर्व करना सिखाते हैं। रायगढ़ की पावन भूमि पर आयोजित होने वाला यह उत्सव राजा चक्रधर सिंह की कला-साधना को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करता है।़आने वाले दिनों में क्या रहेगा खास?:समारोह के पहले दिन की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि आने वाले दिनों में मंच पर होने वाली प्रस्तुतियां और भी अधिक रोमांचक होने वाली हैं। देश के कोने-कोने से आने वाले प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक, नर्तक और वादक आने वाली शामों में अपनी कला का जादू बिखेरेंगे। संगीत प्रेमियों के लिए यह हफ्ता किसी उत्सव से कम नहीं रहने वाला है, जहां हर दिन एक नया सांस्कृतिक अनुभव देखने को मिलेगा फिलहाल, पहले दिन की सुरीली शुरुआत और छत्तीसगढ़ी लोकधुनों की थाप पर थिरकते रायगढ़ शहर की चर्चा हर तरफ हो रही है। इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती, यह सीधे दिलों से जुड़ता है