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नुआखाई पर्व पर सीएम साय ने दी बधाई, प्रकृति और अन्नदाता को किया नमन

नुआखाई पर्व पर सीएम साय ने दी बधाई, प्रकृति और अन्नदाता को किया नमन

छत्तीसगढ़ में लोक संस्कृति और परंपराओं का रंग इन दिनों बेहद गहरा और जीवंत नजर आ रहा है। अवसर है कृषि और प्रकृति के अनूठे पर्व नुआखाई का। इस पावन अवसर पर राज्य के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। मुख्यमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि यह पर्व हमारी समृद्ध कृषि परंपरा, प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता और अन्नदाता किसानों के कठिन परिश्रम का सबसे बड़ा उत्सव है।

नुआखाई: नई फसल के स्वागत का पवित्र अनुष्ठान

भारतीय संस्कृति में कृषि को हमेशा से पूजा गया है और प्रकृति को जीवन का आधार माना गया है। नुआखाई मुख्य रूप से पश्चिम उड़ीसा और छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती इलाकों में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाने वाला एक प्रमुख कृषि पर्व है। 'नुआ' का अर्थ होता है नया और 'खाई' का अर्थ है खाना। यानी नई फसल के आने की खुशी में ईश्वर और प्रकृति का आभार व्यक्त करते हुए उस अन्न को ग्रहण करना ही इस पर्व का मुख्य उद्देश्य है।

जब खेतों में धान की बालियां लहलहाने लगती हैं और किसान की महीनों की मेहनत रंग लाने लगती है, तब इस खुशी को पूरे समाज के साथ साझा करने का समय आता है। नुआखाई इसी सामूहिक उल्लास और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। इस दिन लोग अपने इष्टदेव को नई फसल का भोग लगाते हैं और इसके बाद परिवार के सभी सदस्य मिलकर नया अन्न ग्रहण करते हैं।

प्रकृति और मानव का अटूट रिश्ता

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने संदेश में विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच हमें अपनी उन जड़ों को नहीं भूलना चाहिए जो हमें प्रकृति से जोड़ती हैं। नुआखाई पर्व हमें यह सिखाता है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति और पर्यावरण के बिना अधूरा है। किसान हमारे अन्नदाता हैं, जो धूप, छांव, सर्दी और बारिश की परवाह किए बिना खेतों में दिन-रात पसीना बहाते हैं, ताकि देश की थाली में भोजन पहुंच सके।

मुख्यमंत्री ने कहा कि यह त्योहार केवल एक परंपरा नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही उस संस्कृति का हिस्सा है जो हमें मिलजुलकर रहना और एक-दूसरे के सुख-दुःख में साझीदार बनना सिखाती है।

पारंपरिक उल्लास और मेल-मिलाप का दौर

नुआखाई के दिन सुबह से ही घरों में एक अलग ही चहल-पहल देखने को मिलती है। लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं, पारंपरिक परिधान पहनते हैं और विशेष पकवान बनाते हैं। इस दिन की सबसे खूबसूरत रस्म 'भेटा-घाट' (मेल-मिलाप) होती है। उम्र में बड़े लोगों से आशीर्वाद लिया जाता है और छोटे को प्यार दिया जाता है। इस दौरान पुरानी कटुता को भुलाकर लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं और रिश्तों में मिठास घोलते हैं।

त्योहारों से मजबूत होती है सांस्कृतिक एकता

  • सामूहिक सद्भाव: यह पर्व समाज के हर वर्ग को एक धागे में पिरोने का काम करता है।
  • कृषि का सम्मान: किसानों के अथक परिश्रम को समर्पित यह एक अनूठा मंच है।
  • सांस्कृतिक धरोहर: आने वाली पीढ़ी को अपनी संस्कृति और मिट्टी से जोड़े रखने का सशक्त माध्यम।

शांति और समृद्धि की कामना

अपने आधिकारिक संदेश के अंत में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने राज्य के सभी नागरिकों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। उन्होंने कहा कि यह नया अन्न सभी के जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मकता लेकर आए। छत्तीसगढ़ सरकार राज्य की संस्कृति, लोक पर्वों और परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रतिबद्ध है। ऐसे पावन पर्व हमारी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करते हैं और हमें अपनी मिट्टी से जोड़े रखते हैं।

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रोली सिंह

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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