भागदौड़ भरी इस आधुनिक जिंदगी में रिश्तों की डोर अक्सर कमजोर पड़ने लगती है। अहंकार, अपेक्षाएं और छोटी-छोटी गलतफहमियां अपनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी कर देती हैं। ऐसे में क्या आपने कभी सोचा है कि इस जटिल दौर में भी कुछ ऐसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उत्सव मौजूद हैं, जो बिखरे हुए रिश्तों को फिर से पिरोने का जादुई काम करते हैं? उत्तर प्रदेश के मीरजापुर में इन दिनों कुछ ऐसा ही आध्यात्मिक और सामाजिक ताना-बना देखने को मिल रहा है, जो इंसानी मन की तहों को टटोलने का काम कर रहा है।
मीरजापुर में दशलक्षण महापर्व की गूंज
शहर के श्रीपार्श्वनाथ दिगंबर जैन मंदिर, बाजीराव कटरा और चौबे टोला में इन दिनों जैन धर्म के सबसे पवित्र महापर्व 'दशलक्षण पर्व' की धूम है। 16 सितंबर 2026 से शुरू हुआ यह धार्मिक अनुष्ठान आगामी 25 सितंबर तक पूरी तन्मयता के साथ जारी रहेगा। इस पर्व के माध्यम से आत्मनिरीक्षण, आत्मसंयम और क्षमावाणी के उस संदेश को घर-घर तक पहुंचाया जा रहा है, जिसकी आज के समाज में सबसे ज्यादा जरूरत महसूस की जा रही है।
दस दिनों तक चलने वाले इस महाअनुष्ठान में जैन धर्म के दस मूलभूत धर्मों के स्वरूप और मानव जीवन में उनके वास्तविक महत्व पर गहन चर्चाएं हो रही हैं। विद्वानों और धर्म गुरुओं के अनुसार, यह केवल पूजा-पाठ का कर्मकांड नहीं है, बल्कि इंसानी चेतना को झकझोर कर उसे बेहतर इंसान बनाने की एक मुकम्मल पाठशाला है।
जीवन की प्रयोगशाला: दस धर्म और उनके मायने
दशलक्षण पर्व के दौरान जिन दस धर्मों की आराधना की जाती है, वे केवल किताबी ज्ञान नहीं हैं बल्कि व्यावहारिक जीवन जीने की अचूक कला हैं। इस बारे में विस्तार से बताते हुए पं. अतुल जैन शास्त्री का कहना है कि उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, अकिंचन्य और ब्रह्मचर्य—ये दस स्तंभ व्यक्ति को अपने आंतरिक आचरण की ईमानदारी से समीक्षा करने की प्रेरणा देते हैं।
इन दस गुणों का विश्लेषण करें तो साफ हो जाता है कि इनका उद्देश्य किसी बाहरी दुनिया को जीतना नहीं, बल्कि खुद के भीतर छिपे विकारों पर विजय पाना है:
- उत्तम क्षमा: क्रोध को त्यागकर सहनशीलता अपनाना।
- मार्दव और आर्जव: अहंकार का नाश कर विनम्रता और सरलता को जीवन में उतारना।
- शौच और सत्य: मन की पवित्रता और हमेशा सच के मार्ग पर चलना।
- संयम और तप: इंद्रियों पर नियंत्रण और जीवन को अनुशासन में ढालना।
- त्याग और अकिंचन्य: मोह-माया से मुक्ति और परिग्रह (संग्रह करने की प्रवृत्ति) का त्याग।
- ब्रह्मचर्य: उच्च आचार-विचार और संयमित जीवनशैली।
ये सभी मूल्य मिलकर व्यक्ति के भीतर एक सकारात्मक बदलाव लाते हैं और उसे मानसिक रूप से पूरी तरह मजबूत बनाते हैं।
दूसरों में कमियां ढूंढना बंद करें, खुद को सुधारें
आज के समाज की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इंसान दूसरों की गलतियों पर तुरंत उंगली उठा देता है, लेकिन अपने गिरेबान में झांकने से कतराता है। जैन समाज के वरिष्ठ सदस्य ऋषभ जैन इस बात पर बहुत ही गहरा प्रकाश डालते हैं। उनका मानना है कि दशलक्षण पर्व हमें दूसरों की कमियां तलाशने के बजाय अपने ही दोषों को पहचानने और उनमें तुरंत सुधार करने का दुर्लभ अवसर देता है।
जब एक व्यक्ति अपनी गलतियों को स्वीकार करना सीख जाता है, तो अहंकार का पर्वत अपने आप ढह जाता है। यही इस पर्व का मूल मंत्र है। इन दस दिनों में व्यक्ति अपने पूरे साल के कर्मों का लेखा-जोखा तैयार करता है और यह देखता है कि उसने जाने-अनजाने में किसी का दिल तो नहीं दुखाया।
क्षमावाणी: रिश्तों की नई और खूबसूरत शुरुआत
दशलक्षण महापर्व का सबसे भावुक और अहम पड़ाव इसका समापन यानी 'क्षमावाणी' पर्व होता है। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का एक ऐसा महाअभियान है जो वर्षों की कड़वाहट को पल भर में पिघला सकता है।
इस विशेष अवसर पर समाज के सभी लोग छोटे-बड़े का भेद भूलकर एक-दूसरे के गले मिलते हैं और बीते दिनों में हुई भूलों, कटु वचनों या अनजाने में दिए गए दुखों के लिए क्षमा मांगते हैं। 'उत्तम क्षमा' के इन दो शब्दों में इतनी ताकत होती है कि यह बड़े से बड़े पारिवारिक और सामाजिक विवादों को सुलझा देते हैं।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी देखा जाए तो क्षमा मांगना और माफ कर देना—दोनों ही मानसिक शांति के लिए अचूक औषधि हैं। जब आप सामने वाले को माफ करते हैं, तो आप खुद को उस मानसिक कैद से आज़ाद कर लेते हैं जो लंबे समय से आपको भीतर ही भीतर खा रही होती है।
अहिंसा और विश्वबंधुत्व की महक
केवल इंसान ही नहीं, बल्कि इस पर्व के जरिए पूरी प्रकृति और समस्त जीव-जगत के प्रति करुणा का भाव जगाया जाता है। अहिंसा, संयम, त्याग और विश्वबंधुत्व की भावना को इस पर्व की रीढ़ माना गया है। मीरजापुर के जैन मंदिरों में चल रहे इन आयोजनों में समाज के तमाम गणमान्य लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं।
इस धार्मिक और सांस्कृतिक अनुष्ठान में ऋषभ जैन, मनोज जैन, संजीव जैन, विक्रम जैन, विकास जैन, सुमन जैन, किरण जैन, सरिता जैन, और चंद्रकांता जैन सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। सभी की यही भावना है कि इन दस दिनों में सीखे गए सबक केवल मंदिर तक सीमित न रहें, बल्कि उनके दैनिक जीवन का स्थाई हिस्सा बन सकें।
निष्कर्ष: आधुनिकता की दौड़ में आध्यात्मिक ठहराव
भागती-दौड़ती जिंदगी में दशलक्षण पर्व जैसे आयोजन एक खूबसूरत 'पॉज' (ठहराव) की तरह हैं। यह हमें याद दिलाते हैं कि सफलता, धन और शोहरत से बड़ी चीज इंसानी रिश्ते और आंतरिक शांति है। यदि हम इन दस दिनों के संदेश को अपने जीवन में थोड़ा सा भी उतार लें, तो समाज से द्वेष, ईर्ष्या और नफरत का नामोनिशान मिट सकता है। क्षमावाणी का यह संदेश आज के दौर में सिर्फ जैन समाज के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक अमूल्य उपहार है।