सरकारी दफ्तरों की लाल फीताशाही और बाबूशाही के किस्से तो आम हैं, लेकिन जब कोई फाइल सात दिनों में निबटने के बजाय पूरे 25 साल तक धूल फांकती रहे, तो न्याय व्यवस्था का चिंतित होना लाजिमी है। ऐसा ही एक आंखें खोल देने वाला मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट की छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ ने इस लचर व्यवस्था का स्वतः संज्ञान (Suo Motu PIL) लेते हुए राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
अदालत के सामने यह चौंकाने वाला तथ्य आया है कि हर साल हाईकोर्ट में जितनी याचिकाएं पहुंचती हैं, उनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा केवल इस बात के लिए होता है कि सरकार लंबित आवेदनों पर कोई फैसला ले ले। आइए जानते हैं इस पूरे मामले की गहराई और क्या कहते हैं हमारे देश के प्रशासनिक कानून।
हर साल हजारों याचिकाएं सिर्फ 'निर्णय' के लिए
मुंबई हाईकोर्ट की छत्रपति संभाजीनगर खंडपीठ के आंकड़ों पर गौर करें तो स्थिति बेहद चिंताजनक है। अदालत में हर साल लगभग 18 हजार से 19 हजार याचिकाएं दाखिल होती हैं। इनमें से चौंकाने वाली बात यह है कि करीब 7 हजार से 8 हजार याचिकाएं केवल इस प्रार्थना के साथ लाई जाती हैं कि माननीय न्यायालय संबंधित सरकारी विभाग को आदेश दे कि वह नागरिक के लंबित आवेदन पर कम से कम हां या ना में फैसला तो ले।
कल्पना कीजिए, एक आम नागरिक जब सरकार के पास अपनी किसी वाजिब मांग या शिकायत के साथ पहुंचता है, तो उसे न्याय या समाधान पाने के लिए सीधे अदालत की शरण लेनी पड़ती है, सिर्फ इसलिए क्योंकि दफ्तरों में उसकी फाइल पर कुर्सियां और धूल जम चुकी होती हैं।
25 साल पुराना आवेदन, जिसे कोई सुध लेने वाला नहीं मिला
इस पूरी सुओ मोटो जनहित याचिका की नींव बने कुछ बेहद चौंकाने वाले मामले। खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान ऐसे उदाहरण रखे जो प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं:
- लातूर का वह मामला: लातूर में भूमि अधिग्रहण के मुआवजे को बढ़ाने की मांग को लेकर एक नागरिक ने 31 मई 1999 को आवेदन किया था। हैरानी की बात यह है कि 25 साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी इस आवेदन पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।
- सामाजिक न्याय विभाग: एक अन्य मामले में सामाजिक न्याय विभाग के सचिव के पास 4 सितंबर 2018 से एक प्रस्ताव लंबित पड़ा हुआ है, जिस पर आज तक कोई सुध नहीं ली गई।
इन गंभीर मामलों को न्यायमूर्ति नितिन बी. सूर्यवंशी और न्यायमूर्ति बाबासाहेब डी. शिंदे की खंडपीठ ने बेहद संवेदनशीलता और सख्ती के साथ लिया है। अदालत का मानना है कि इस तरह की देरी नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
कानून कहता है - 'सात दिन', हकीकत कहती है - 'साढ़े तीन दशक'
सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि देश और राज्यों में फाइलों के निपटारे के लिए कड़े कानून मौजूद हैं। महाराष्ट्र सरकार ने सरकारी कामकाज में अनावश्यक देरी को रोकने के लिए साल 2005 में एक विशेष कानून बनाया था, जो 1 जुलाई 2006 से पूरे राज्य में प्रभावी रूप से लागू हुआ।
इस कानून के प्रावधान बेहद स्पष्ट और सख्त हैं:
- नियमों के मुताबिक, किसी भी आम सरकारी फाइल को सात दिन से अधिक समय तक लंबित नहीं रखा जा सकता।
- अति आवश्यक फाइलों का निपटारा या तो उसी दिन किया जाना चाहिए या फिर अगले दिन सुबह तक।
- महत्वपूर्ण फाइलों के लिए अधिकतम चार दिन की समयसीमा तय की गई है।
- जिन मामलों में किसी अन्य विभाग की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती, वहां अधिकतम 45 दिनों के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य है।
- यदि दूसरे विभाग की सहमति जरूरी हो, तो भी तीन महीने के भीतर फाइल का निपटारा हो जाना चाहिए।
- जानबूझकर देरी करने वाले या लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान इस कानून में है।
दो दशक बाद भी कागजों पर ही दम तोड़ रहा है कानून
सवाल यह उठता है कि जब कानून इतना स्पष्ट है और इसमें सख्त सजा या कार्रवाई का प्रावधान भी है, तो फिर फाइलें 25-25 साल तक क्यों अटकी रहती हैं? खंडपीठ ने इसी विसंगति पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से यह सवाल पूछा है कि क्या नागरिकों के अधिकारों और सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कोई 'नागरिक सनद' (Citizen Charter) तैयार की गई है? इसके साथ ही, क्या उस कानून के अनुसार प्रशासनिक ऑडिट (Administrative Audit) कराया गया है या नहीं?
न्यायालय ने सरकारी वकील को इन तमाम बिंदुओं पर एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया है। इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में अदालत की मदद के लिए अधिवक्ता एस. एस. बोरा को 'न्याय मित्र' (Amicus Curiae) के रूप में नियुक्त किया गया है, ताकि इस व्यवस्था की जड़ों तक पहुंचकर सुधार किया जा सके।
आम जनता का बढ़ता आक्रोश और प्रशासनिक जवाबदेही
आज के दौर में जब हर प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाने के दावे किए जा रहे हैं, तब इस तरह के मामले व्यवस्था की पोल खोलते हैं। एक आम इंसान जब सरकारी दफ्तर के चक्कर काटता है, तो उसका समय, पैसा और मानसिक संतुलन तीनों दांव पर लगते हैं। सात दिन में फाइल निपटाने का नियम फाइलों के बंडल के नीचे कहीं दफन हो चुका है और नागरिक 25 साल तक इंतजार करने को मजबूर हैं।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद शासन और प्रशासन अपनी कार्यशैली में कितना सुधार लाता है। क्या वाकई अब लापरवाह अधिकारियों पर गाज गिरेगी या फिर यह मामला भी कुछ तारीखों के बाद ठंडे बस्ते में चला जाएगा? इसका जवाब आने वाले दिनों में कोर्ट में पेश होने वाली रिपोर्ट से ही मिलेगा।