जम्मू-कश्मीर के स्वास्थ्य क्षेत्र से एक बेहद चौंकाने वाली और गंभीर जानकारी सामने आई है। प्रशासनिक स्तर पर लाख कोशिशों के बावजूद सरकारी मेडिकल कॉलेज (जीएमसी) बारामूला में वेंटिलेटरों की खरीद और उनकी सुचारू सर्विसिंग की प्रक्रिया ठप पड़ गई है। स्थिति यह है कि बार-बार डेडलाइन बढ़ाने और टेंडर आमंत्रित करने के बाद भी किसी भी एजेंसी या वेंडर ने इसमें रुचि नहीं दिखाई है और एक भी बोली (Bid) प्राप्त नहीं हुई है।
विधानसभा में सरकार का आधिकारिक बयान
इस संवेदनशील मामले पर स्थिति तब स्पष्ट हुई जब सरकार की ओर से इस संबंध में आधिकारिक आंकड़े सदन के पटल पर रखे गए। स्वास्थ्य मंत्री ने विधानसभा सत्र के दौरान इस बात का खुलासा किया कि अस्पताल में जीवन रक्षक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने हरसंभव प्रयास किए, लेकिन एजेंसियों की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
मंत्री ने सदन को बताया कि जीएमसी बारामूला में क्रिटिकल केयर यूनिट्स के लिए वेंटिलेटरों की खरीद और उनके रखरखाव के वास्ते नियमानुसार टेंडर जारी किए गए थे। हालांकि, बाजार की ओर से अपेक्षित रिस्पांस न मिलने के कारण यह प्रक्रिया अधर में लटक गई है।
क्यों नहीं आगे आ रहीं एजेंसियां? प्रशासनिक चुनौतियां
चिकित्सा विशेषज्ञों और प्रशासनिक गलियारों में इस बात पर मंथन शुरू हो गया है कि आखिर क्यों मेडिकल उपकरणों की सप्लाई करने वाली बड़ी कंपनियां और एजेंसियां इस टेंडर से दूर रहीं। इसके पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं:
- शर्तों की जटिलता: तकनीकी और वित्तीय शर्तों के प्रावधान इतने कड़े हो सकते हैं कि स्थानीय स्तर पर वेंडर उन्हें पूरा करने में असमर्थ महसूस कर रहे हों।
- सर्विसिंग और मेंटेनेंस के पेंच: वेंटिलेटर केवल खरीदना ही चुनौती नहीं है, बल्कि सुदूर इलाकों में उनके स्पेयर पार्ट्स और समय पर सर्विसिंग की गारंटी देना कंपनियों के लिए जोखिम भरा साबित हो सकता है।
- बाजार की प्राथमिकताएं: कई बार बड़ी कंपनियां दूर-दराज के सरकारी अस्पतालों की बजाय महानगरों या निजी संस्थानों के साथ काम करने को प्राथमिकता देती हैं।
स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ने वाला प्रभावबारामूला और आसपास के इलाकों के मरीजों के लिए जीएमसी एक बड़ा और मुख्य स्वास्थ्य केंद्र है। ऐसे में क्रिटिकल केयर के लिए सबसे अहम माने जाने वाले वेंटिलेटरों की खरीद में आ रही इस तरह की बाधाएं स्थानीय स्वास्थ्य ढांचे के लिए चिंता का विषय बन गई हैं। गंभीर रोगियों को समय पर उच्च स्तरीय इलाज मिलने में इस तरह की प्रशासनिक और टेंडर संबंधी अड़चनें बड़ी बाधा बन सकती हैं।
आगे की क्या है रणनीति?
सरकार और स्वास्थ्य विभाग इस समस्या के समाधान के लिए अब नए विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, नियमों में कुछ ढील देने या फिर टेंडर की शर्तों को संशोधित कर दोबारा प्रक्रिया शुरू करने पर विचार किया जा रहा है ताकि अधिक से अधिक वेंडर इसमें हिस्सा ले सकें। आम जनता और मरीज कल्याण संगठनों ने भी उम्मीद जताई है कि सरकार जल्द ही इस समस्या का कोई व्यावहारिक हल निकाल लेगी, जिससे अस्पताल में जीवन रक्षक उपकरणों की कमी को दूर किया जा सके।
फिलहाल, यह मामला इस बात का सटीक उदाहरण है कि किस तरह जमीनी स्तर पर प्रशासनिक प्रक्रियाएं और वेंडरों की उदासीनता स्वास्थ्य सेवाओं की राह में एक बड़ी दीवार बन जाती है। आने वाले दिनों में देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस दिशा में क्या त्वरित कदम उठाता है।