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ऐप पर दिखा 1500, बिल में वसूले 2200; स्विगी और रेस्टोरेंट पर गिरा गाज, देना होगा 1 लाख मुआवजा

ऐप पर दिखा 1500, बिल में वसूले 2200; स्विगी और रेस्टोरेंट पर गिरा गाज, देना होगा 1 लाख मुआवजा

आज के समय में जब हम और आप रेस्टोरेंट में जाने या बाहर खाने का प्लान बनाते हैं, तो सबसे पहले मोबाइल ऐप्स का रुख करते हैं। अलग-अलग फूड डिलीवरी और डाइन-आउट प्लेटफॉर्म्स पर मिलने वाले डिस्काउंट, ऑफर्स और कम कीमतों के झांसे में आकर हम टेबल बुक कर लेते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि ऐप पर जो चमकती हुई कीमत आपको दिखाई जाती है, बिल आते ही वह अचानक से आसमान छूने लगे तो क्या होगा? हाल ही में ऐसा ही कुछ दिल्ली के एक उपभोक्ता के साथ हुआ, जिसके बाद जो कानूनी कार्रवाई सामने आई, वह ऑनलाइन ऐप्स के जरिए खाने-पीने का आर्डर करने वाले हर शख्स के लिए एक बड़ी सीख और चेतावनी है।

दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने एक कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मशहूर फूड एग्रीगेटर प्लेटफॉर्म 'स्विगी' (Swiggy) और एक लोकप्रिय रेस्टोरेंट को तगड़ा झटका दिया है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बुफे की भ्रामक और गलत कीमत दिखाने के मामले में आयोग ने दोनों को संयुक्त रूप से दोषी माना है। पीड़ित ग्राहक को मानसिक उत्पीड़न, असुविधा, मानसिक परेशानी और कानूनी मुकदमे के खर्च के रूप में कुल एक लाख रुपये का मुआवजा देने का सख्त निर्देश दिया गया है। यह फैसला उन तमाम लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो अक्सर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की मनमानी और छिपे हुए शुल्कों का शिकार होते रहते हैं।

क्या था पूरा मामला? जानिए कैसे हुआ खेल

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब आवेदनकर्ता और पेशे से अधिवक्ता प्रवीण कुमार सिंह ने आगामी सात अप्रैल को अपने परिवार और दोस्तों के लिए खाने का प्लान बनाया। उन्होंने शहर के चर्चित 'थेमिस बारबेक्यू हाउस' (Themis Barbecue House) में 14 लोगों के लिए टेबल बुक करने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने लोकप्रिय ऑनलाइन फूड प्लेटफॉर्म स्विगी के डाइन-आउट (Dineout) सेक्शन का इस्तेमाल किया।

जब उन्होंने ऐप पर रेस्टोरेंट के बुफे की लिस्टिंग देखी, तो वहां दो लोगों के लिए कुल खर्च 1,500 रुपये दिखाया गया था। सीधे शब्दों में कहें तो ऐप के हिसाब से प्रति व्यक्ति बुफे की कीमत 750 रुपये बैठती थी। इस आकर्षक और किफायती दाम को देखकर उन्होंने 14 लोगों की टेबल बुक कर ली। उन्हें लगा कि यह एक बेहतरीन डील है। लेकिन, असली खेल तो तब शुरू हुआ जब रेस्टोरेंट में खाने के बाद उनके हाथ में बिल थमाया गया।

ऐप की कीमत और बिल में था 40 से 47 प्रतिशत का भारी अंतर

जब दावत खत्म हुई और बिल आया, तो आंकड़े देखकर अधिवक्ता महोदय के होश उड़ गए। रेस्टोरेंट ने शाकाहारी (Veg) बुफे के लिए प्रति व्यक्ति 1,050 रुपये और मांसाहारी (Non-Veg) बुफे के लिए प्रति व्यक्ति 1,100 रुपये चार्ज किए थे। ऐप पर दिखाई गई 750 रुपये प्रति व्यक्ति की कीमत के मुकाबले यह वसूली काफी ज्यादा थी। शाकाहारी ग्राहकों से प्रति व्यक्ति 300 रुपये और मांसाहारी ग्राहकों से प्रति व्यक्ति 350 रुपये अतिरिक्त वसूले गए।

जब इस भारी-भरकम अंतर के बारे में रेस्टोरेंट और ऐप से सवाल किया गया, तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद उपभोक्ता ने चुप बैठने के बजाय कानूनी रास्ता चुना और दिल्ली उपभोक्ता आयोग में इसकी औपचारिक शिकायत दर्ज करा दी।

उपभोक्ता आयोग की खंडपीठ ने क्या कहा?

इस मामले की सुनवाई दिव्या ज्योति जयपुरियार की अध्यक्षता वाली उपभोक्ता आयोग की पीठ ने की। आयोग ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जो टिप्पणियां कीं, वे टेक कंपनियों और रेस्टोरेंट संचालकों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगाती हैं।

आयोग ने स्पष्ट रूप से कहा कि स्विगी की ऐप लिस्टिंग में दूर-दूर तक इस बात का कोई संकेत या डिस्क्लेमर नहीं था कि दो लोगों के खर्च वाला यह आंकड़ा केवल एक 'अनुमान' (Estimate) है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जो कीमत दिखाई गई थी और रेस्टोरेंट में जो असल कीमत वसूली गई, उसके बीच लगभग 40 से 47 प्रतिशत का भारी अंतर था। आयोग ने इसे सीधे तौर पर उपभोक्ताओं को गुमराह करने और उनके साथ वित्तीय धोखाधड़ी के समान माना।

आईटी एक्ट की धारा-79 की आड़ लेने से स्विगी को किया इनकार

सुनवाई के दौरान स्विगी की तरफ से अपनी सफाई में यह तर्क दिया गया कि वह केवल एक 'मध्यस्थ' (Intermediary) है और उसे इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT) एक्ट की धारा-79 के तहत कानूनी सुरक्षा प्राप्त है। कंपनी का कहना था कि रेस्टोरेंट द्वारा तय की गई कीमतों पर उसका सीधा नियंत्रण नहीं होता है, इसलिए उसे इस मामले में जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए।

लेकिन उपभोक्ता आयोग ने स्विगी के इस बचाव को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग की पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि स्विगी केवल आईटी एक्ट के प्रावधानों का रट्टा लगाकर और मध्यस्थ होने का ढोल पीटकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। कंपनी को यह साबित करना होगा कि उसने संबंधित कानूनों और उनके नियमों के मुताबिक हर संभव जरूरी सावधानी बरती थी। यदि कोई प्लेटफॉर्म अपने ऐप पर कोई कीमत प्रदर्शित करता है, तो उसकी विश्वसनीयता बनाए रखने की नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी भी उसी प्लेटफॉर्म की होती है।

अतिरिक्त सर्विस चार्ज भी ब्याज सहित लौटाना होगा

सिर्फ गलत कीमत का मामला ही नहीं, बल्कि आयोग ने बिल में जोड़े गए अवैध शुल्कों पर भी कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि स्विगी डाइन-आउट के माध्यम से ग्राहक से जो 254 रुपये का अतिरिक्त और गैर-कानूनी सर्विस चार्ज वसूला गया था, उसे भी रेस्टोरेंट या प्लेटफॉर्म को वापस करना होगा।

यह रिफंड साधारण तरीके से नहीं होगा, बल्कि आयोग ने आदेश दिया है कि इस अतिरिक्त राशि को 9 प्रतिशत सालाना ब्याज (Annual Interest) के साथ ग्राहक को वापस लौटाया जाए। इसके अलावा मानसिक परेशानी, उत्पीड़न और कानूनी कार्यवाही में हुए खर्च के एवज में एक लाख रुपये का मुआवजा अलग से देना होगा।

आम उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी नजीर

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश भर के उपभोक्ताओं के लिए एक बड़ी नजीर पेश करता है। अक्सर लोग होटलों और रेस्टोरेंट में इस तरह की छोटी-मोटी ओवरचार्जिंग को नजरअंदाज कर देते हैं या फिर केवल बहस करके मामला रफा-दफा कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि कुछ सौ रुपये के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर कौन काटेगा। लेकिन इस मामले ने साबित कर दिया है कि अगर ग्राहक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो और सही मंच पर आवाज उठाए, तो बड़ी से बड़ी टेक कंपनियों और सर्विस प्रोवाइडर्स को जवाबदेह बनाया जा सकता है।

यह फैसला उन तमाम फूड डिलीवरी और डाइन-आउट ऐप्स के लिए भी एक कड़ी चेतावनी है जो अपनी ऐप्स पर आकर्षक और फर्जी कीमतें दिखाकर ग्राहकों को आकर्षित करते हैं और बाद में बिल के समय जेब ढीली करवाते हैं। आने वाले समय में इस फैसले का असर डिजिटल मार्केटप्लेस कीPricing Policies पर साफ देखने को मिल सकता है।

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रोली सिंह

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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