पहाड़ों की गोद में बसी उत्तराखंड की संस्कृति जितनी खूबसूरत है, उतनी ही गहरी इसकी लोक परंपराएं और संगीत भी हैं। आधुनिकता की दौड़ में जहां एक ओर पारंपरिक चीजें लुप्त होने की कगार पर हैं, वहीं कुछ ऐसे समर्पित लोग भी हैं जो अपनी माटी की खुशबू को सहेजने में दिन-रात एक किए हुए हैं। इसी कड़ी में उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोक संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के संरक्षण व संवर्धन के क्षेत्र में आजीवन समर्पित रहने वाले प्रतिष्ठित साहित्यकार और संस्कृति मर्मज्ञ डॉ. डी.आर. पुरोहित को एक बेहद खास सम्मान से नवाजा गया है।
डांडी कांठी क्लब परिवार का अनूठा आयोजन
राजधानी देहरादून में आयोजित एक गरिमामय समारोह के दौरान डॉ. डी.आर. पुरोहित को 'राज्य वाद्ययंत्र सम्मान' से अलंकृत किया गया। यह कार्यक्रम डांडी कांठी क्लब परिवार की ओर से आयोजित किया गया था, जिसमें प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को संवारने वाले विशिष्ट जनों की उपस्थिति ने माहौल को पूरी तरह से लोक-रंग में रंग दिया। इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य उन शख्सियतों को मंच प्रदान करना और सम्मानित करना था, जिन्होंने अपनी कला और शोध के जरिए पहाड़ी संस्कृति को जिंदा रखा है।
समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे प्रदेश के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने अपने हाथों से डॉ. पुरोहित को यह सम्मान प्रदान किया। इस दौरान सभागार में मौजूद तमाम प्रबुद्धजनों और कलाकारों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ इस पल का स्वागत किया।
कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने की मुक्तकंठ से सराहना
समारोह को संबोधित करते हुए कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने कहा कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति और हमारी लोक परंपराएं ही हमारी असली पहचान हैं। यह हमारी वह अमूल्य विरासत है, जिसे हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना होगा। पारंपरिक वाद्ययंत्र हमारी संस्कृति का एक अनिवार्य और जीवंत हिस्सा हैं, और इनके संरक्षण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर एक वर्ग की है।
मंत्री जोशी ने डॉ. डी.आर. पुरोहित के योगदान की सराहना करते हुए कहा, "डॉ. पुरोहित ने उत्तराखंड की लोक कला, लोक संगीत, और पारंपरिक वाद्ययंत्रों के क्षेत्र में जो अमूल्य कार्य किया है, वह इतिहास के पन्नों में हमेशा दर्ज रहेगा। उनका यह समर्पण और कार्य आज की युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने का एक मजबूत माध्यम बन रहा है।"
पारंपरिक वाद्ययंत्रों को ग्लोबल मंच दिलाने की जरूरत
अपने संबोधन में कैबिनेट मंत्री ने इस बात पर भी जोर दिया कि राज्य के पारंपरिक वाद्ययंत्रों—जैसे हुड़की, ढोल, दमाऊ, मशकबीन और रणसिंघा—को केवल क्षेत्रीय स्तर तक सीमित न रखकर, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी पहचान दिलाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि इसके लिए सामूहिक प्रयासों की बेहद जरूरत है। सरकार अपने स्तर पर लगातार प्रयास कर रही है, लेकिन जब तक जन-सहयोग नहीं मिलेगा, संस्कृति का यह दीप पूरी रोशनी के साथ नहीं जल पाएगा।
- लोक संस्कृति की पहचान: ढोल-दमाऊ और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्र हमारी पहाड़ी संस्कृति की धड़कन हैं।
- नई पीढ़ी का जुड़ाव: युवाओं को अपनी लोक कलाओं के प्रति जागरूक करना आज की सबसे बड़ी मांग है।
- सामूहिक प्रयास: सरकारी योजनाओं के साथ-साथ सामाजिक संगठनों की सक्रिय भागीदारी से ही संस्कृति का संरक्षण संभव है।
समारोह में मौजूद रहे कई दिग्गज और गणमान्य लोग
इस भव्य और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध आयोजन में देहरादून के कई जाने-माने लोग और कलाकार उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शोभा बढ़ाने वालों में प्रमुख रूप से पार्षद कमली भट्ट, डांडी कांठी क्लब के अध्यक्ष विजय भूषण उनियाल, प्रमोद नौटियाल, गीता पुरोहित, मोहित जायसवाल और संजय नौटियाल सहित कई अन्य गणमान्य लोग शामिल रहे। सभी ने डॉ. पुरोहित को बधाई दी और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।
कार्यक्रम के अंत में पारंपरिक धुनों और लोक संगीत की प्रस्तुतियों ने उपस्थित सभी लोगों का मन मोह लिया। यह आयोजन न केवल डॉ. डी.आर. पुरोहित के योगदान का सम्मान था, बल्कि यह उत्तराखंड की उस मिट्टी को भी नमन था जो सदियों से अपनी अनूठी संस्कृति और संगीत के दम पर पूरी दुनिया में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए है।