गाजीपुर में कागजों पर साफ हुए नाले, हकीकत में डूबीं सड़कें
बारिश का मौसम आते ही देश के कई शहरों की पोल खुलनी शुरू हो जाती है। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से एक ऐसा ही चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां प्रशासन और नगर पालिका के दावों की धज्जियां पहली ही बारिश ने उड़ा कर रख दीं। शहर के नालों की सफाई के नाम पर हाल ही में करीब 8 लाख रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की गई थी, लेकिन जैसे ही आसमान से पानी बरसा, सड़कें तालाब में तब्दील हो गईं। इस स्थिति को देखकर आम जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर है और हर तरफ एक ही सवाल गूंज रहा है—आखिर वो 8 लाख रुपये गए कहां?
लाखों के बजट का क्या हुआ हस्र?
प्रशासनिक दस्तावेजों और फाइलों में गाजीपुर के सभी प्रमुख नालों की तल्लीझाड़ सफाई कराई जा चुकी है। इसके लिए स्थानीय स्तर पर टेंडर पास हुए और बाकायदा ठेकेदारों को भुगतान भी किया गया। कुल मिलाकर लगभग आठ लाख रुपये की सरकारी धनराशि इस मद में ठिकाने लगा दी गई। कागजों के मुताबिक, शहर की जनता को इस बार जलभराव की समस्या से दो-चार नहीं होना पड़ेगा। मगर जमीन पर उतरी हकीकत इसके बिल्कुल उलट निकली।
मंगलवार को हुई तेज बारिश ने सिस्टम के तमाम दावों की पोल खोल दी। सड़कों पर इतना पानी भर गया कि दोपहिया वाहन चालकों के लिए निकलना मुश्किल हो गया। कई इलाकों में तो पानी लोगों के घरों और दुकानों तक में घुसने लगा। राहगीरों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
जनता का फूटा गुस्सा, भ्रष्टाचार के लगाए आरोप
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नाला सफाई का यह पूरा खेल सिर्फ कागजों पर खेला गया है। धरातल पर किसी भी नाले की ढंग से सफाई नहीं की गई। अगर सफाई हुई होती, तो पानी की निकासी इतनी बाधित नहीं होती।
"हर साल बरसात के मौसम से पहले नालों की सफाई के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं, लेकिन नतीजा सिफर रहता है। इस बार भी आठ लाख रुपये खर्च करने का दावा किया गया, लेकिन बारिश होते ही सड़कें डूब गईं। यह सीधे तौर पर जनता के गाढ़े पसीने की कमाई की बर्बादी और बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है," एक स्थानीय दुकानदार ने अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहा।
लोगों का आरोप है कि ठेकेदारों और स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया है। नालों में जमी गाद और कचरा जस का तस बना हुआ है, जिसके कारण पानी का बहाव रुक जाता है और वह सड़क पर फैल जाता है।
प्रशासनिक लापरवाही और मौन
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद से स्थानीय प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। हालांकि, खबर लिखे जाने तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी की तरफ से कोई ठोस सफाई या बयान सामने नहीं आया है। अधिकारियों का यह मौन कई तरह के संदेहों को जन्म दे रहा है।
- लापरवाही की हद: मानसून की दस्तक से पहले पुख्ता इंतजाम करने के दावे फेल हो चुके हैं।
- जवाबदेही का अभाव: आठ लाख रुपये के खर्च का हिसाब मांगने पर कोई भी अधिकारी खुलकर बोलने को तैयार नहीं है।
- आम जनता की पीड़ा: जलभराव के कारण न केवल ट्रैफिक व्यवस्था चरमराई, बल्कि गंदे पानी की वजह से संक्रामक बीमारियों का खतरा भी मंडराने लगा है।
आगे क्या कदम उठाएगा प्रशासन?
गाजीपुर की इस घटना ने एक बार फिर से देश के स्थानीय निकायों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या शासन स्तर पर इस मामले की कोई उच्चस्तरीय जांच बैठाई जाएगी? क्या उन भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई होगी जिनकी वजह से जनता को इतनी मुसीबत उठानी पड़ रही है? ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब गाजीपुर की जनता जानना चाहती है।
फिलहाल, स्थिति यह है कि हल्की सी बारिश भी शहरवासियों की जिंदगी को मुहाल करने के लिए काफी साबित हो रही है। जब तक जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगाई जाती और विकास कार्यों में पारदर्शिता नहीं लाई जाती, तब तक गाजीपुर जैसी जगहों पर 'साफ-सफाई' के नाम पर लाखों रुपये खर्च होना सिर्फ सरकारी खजाने को चपत लगाने जैसा ही रहेगा।