राजधानी दिल्ली में एक बार फिर स्वाइन फ्लू यानी H1N1 वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक, इस साल अगस्त के आखिरी हफ्ते तक दिल्ली में H1N1 के 1,777 मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जो पिछले साल इसी अवधि के मुकाबले काफी ज्यादा हैं। पिछले साल इस दौरान केवल 229 मामले ही सामने आए थे। हालांकि, इस भारी बढ़ोतरी को देखकर लोगों के मन में डर बैठ गया है कि क्या कोई नया और खतरनाक वायरस आ गया है, लेकिन इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने साफ कर दिया है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि कोई नया स्ट्रेन सर्कुलेट नहीं हो रहा है।
क्यों बढ़ रहे हैं मामले? डॉक्टरों ने बताई असली वजह
एम्स दिल्ली के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. अनिमेष का कहना है कि इन्फ्लूएंजा वायरस की यह प्रवृत्ति होती है कि वह समय के साथ अपने जेनेटिक स्ट्रक्चर में छोटे-छोटे बदलाव (Minor Genetic Changes) करता रहता है। इसे एंटीजेनिक ड्रिफ्ट कहा जाता है। चूंकि वायरस थोड़ा बदल जाता है, इसलिए आबादी की इम्यूनिटी उस नए वैरिएंट के खिलाफ थोड़ी कमजोर पड़ जाती है और लोग जल्दी संक्रमित हो जाते हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक, इस बार के मामलों में कुछ नए लक्षण भी देखने को मिल रहे हैं, जो पहले के मुकाबले थोड़े अलग हैं:
- लंबे समय तक रहने वाली खांसी: इस बार मरीजों को जो खांसी हो रही है, वह बहुत जिद्दी है और ठीक होने में सामान्य से ज्यादा समय ले रही है।
- पेट से जुड़ी समस्याएं: श्वसन संबंधी समस्याओं के साथ-साथ इस बार मरीजों में डायरिया, पेट में ऐंठन और जी मिचलाने जैसे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल लक्षण भी प्रमुखता से दिख रहे हैं।
- गंभीर जटिलताएं: कुछ मरीजों में निमोनिया, सांस लेने में तकलीफ (Respiratory Distress) और यहां तक कि किडनी इंजरी के मामले भी सामने आ रहे हैं।
ICMR और विशेषज्ञों की साफ चेतावनी: क्या यह कोई नया स्ट्रेन है?
एम्स में वायरोलॉजी विभाग के इंचार्ज प्रोफेसर डॉ. आशीष चौधरी ने स्पष्ट किया है कि वर्तमान में फैलने वाला pdmH1N1 स्ट्रेन वही है जो 2009 के स्वाइन फ्लू महामारी के बाद से चला आ रहा है। यह समय के साथ मौसमी इन्फ्लूएंजा (Seasonal Influenza) में बदल चुका है।
डॉ. चौधरी का कहना है, "यह कोई नया या ज्यादा घातक स्ट्रेन नहीं है। इन्फ्लूएंजा में हर कुछ सालों में ऐसा पीक (Peak) आता है जब मामलों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। इस साल पिछले साल की तुलना में H3N2 की बजाय H1N1 मुख्य रूप से हावी रहा है।"
किन लोगों को ज्यादा खतरा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वस्थ लोगों के लिए यह फ्लू आमतौर पर खुद-ब-खुद ठीक होने वाला (Self-limiting) है, लेकिन कुछ खास वर्ग के लोगों को बेहद सतर्क रहने की जरूरत है:
- बुजुर्ग और छोटे बच्चे
- वे लोग जिन्हें पहले से ही सांस की बीमारी या फेफड़ों की कोई पुरानी समस्या है
- दिल के मरीज, डायबिटीज और अन्य गंभीर बीमारियों (Co-morbidities) से पीड़ित लोग
फोर्टिस हॉस्पिटल की सीनियर कंसलटेंट डॉ. नेहा रस्तोगी का कहना है कि प्री-मानसून बारिश का जल्दी आना, प्रदूषण का स्तर और लोगों का एक-दूसरे शहर आना-जाना भी इस वायरस के तेजी से फैलने की बड़ी वजहें हैं।
क्या हर मरीज को एंटीवायरल दवा की जरूरत है?
अक्सर लोग बुखार या खांसी होते ही एंटीवायरल दवाएं या एंटीबायोटिक्स ढूंढने लगते हैं। इस पर क्रिटिकल केयर एक्सपर्ट्स का कहना है कि हर मरीज को एंटीवायरल दवा की बिल्कुल जरूरत नहीं होती है।
PSRI इंस्टीट्यूट के पल्मोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन के चेयरमैन डॉ. जी.सी. खिलनानी ने सलाह दी है कि ओसेलटैमिविर (Oseltamivir) जैसी दवाएं केवल गंभीर मरीजों या हाई-रिस्क वाले लोगों के लिए होती हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि ये दवाएं लक्षण शुरू होने के शुरुआती 48 घंटों के भीतर असरदार होती हैं, इसलिए देरी न करें और समय पर डॉक्टर से सलाह लें।
बचाव के लिए क्या करें?
डॉक्टरों की सलाह है कि पैनिक होने के बजाय सूझबूझ से काम लें। संक्रमण से बचने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:
- भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनकर जाएं।
- बार-बार हाथ धोएं और सैनिटाइज़र का इस्तेमाल करें।
- यदि आपको तेज बुखार, लगातार खांसी या सांस लेने में परेशानी हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।
समय पर फ्लू की वैक्सीन लगवाना भी बचाव का एक कारगर तरीका है।
