हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले लेक्चरर्स की लंबी खामोशी अब मुखर विरोध और मांगों के रूप में सामने आने लगी है। दो दशक से भी ज्यादा समय यानी 20 से 25 साल तक अपनी निष्ठावान सेवाएं देने के बाद भी जब करियर में एक कदम आगे बढ़ने का रास्ता बंद दिखे, तो किसी का भी विचलित होना स्वाभाविक है। राज्य के शिक्षक वर्ग में इन दिनों यही सुगबुगाहट सबसे ऊपर है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश स्कूल लेक्चरर्स एसोसिएशन (HPSLA) का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल रोहड़ू दौरे पर पहुंचे मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से मिला और उन्हें एक ऐसा 10 सूत्रीय मांगपत्र सौंपा, जिसने राज्य की शिक्षा व्यवस्था के भीतर चल रही विसंगतियों को खुलकर उजागर कर दिया है।
400 से अधिक स्कूल बिना कैप्टन के, कैसे सुधरेगी शिक्षा?
मुख्यमंत्री के समक्ष रखे गए आंकड़ों ने प्रशासनिक गलियारों में भी चर्चा छेड़ दी है। एसोसिएशन के मुताबिक, पहाड़ी राज्य हिमाचल के लगभग 400 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ऐसे हैं जो इस वक्त बिना नियमित प्रधानाचार्यों (Principals) के भगवान भरोसे चल रहे हैं। एक तरफ जहां स्कूलों में मुखिया का पद खाली पड़ा है, वहीं दूसरी तरफ वे शिक्षक जो पिछले 20 से 25 वर्षों से अपनी कक्षाएं संभाल रहे हैं, वे मामूली पदोन्नति के लिए भी तरस रहे हैं। यह स्थिति न सिर्फ शिक्षकों के मनोबल को तोड़ती है, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है कि आखिर इतने लंबे अंतराल के बाद भी डीपीसी (Departmental Promotion Committee) समय पर क्यों नहीं हो पा रही है?
एसोसिएशन की 10 प्रमुख मांगें और उनका गहराई से विश्लेषण
रोहड़ू में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के समक्ष रखे गए इस विस्तृत मांगपत्र में कई ऐसे अहम बिंदु शामिल हैं जिन पर राज्य सरकार को तत्काल प्रभाव से नीतिगत फैसले लेने पड़ सकते हैं। आइए जानते हैं उन प्रमुख मांगों के बारे में जो इस बैठक के केंद्र में रहीं:
- प्रधानाचार्य कोटे में संशोधन: एसोसिएशन ने मांग की है कि प्रधानाचार्य (Principal) के पदों पर स्कूल लेक्चरर्स की पदोन्नति का कोटा बढ़ाकर सीधे 95 प्रतिशत किया जाए ताकि अधिक से अधिक अनुभवी शिक्षकों को इसका सीधा लाभ मिल सके।
- वित्तीय बकाये का भुगतान: कर्मचारियों के लंबे समय से लंबित पड़े 15 प्रतिशत डीए (महंगाई भत्ते) और नए वेतन आयोग के एरियर का एकमुश्त या जल्द भुगतान करने की जोरदार मांग उठाई गई है।
- पदनाम और शुरुआती वेतन में बदलाव: 'स्कूल लेक्चरर (न्यू)' शब्द को हमेशा के लिए समाप्त कर केवल 'स्कूल लेक्चरर' रखने की वकालत की गई है। इसके साथ ही शुरुआती मूल वेतन को 42 हजार रुपये से बढ़ाकर सीधे 47 हजार रुपये करने का प्रस्ताव दिया गया है।
- कॉलेज लेक्चरर पद पर पदोन्नति का रास्ता: जिन स्कूल लेक्चरर्स के पास नेट (NET), सेट (SET) या पीएचडी (PhD) जैसी उच्च शैक्षणिक डिग्रियां हैं, उन्हें कॉलेज लेक्चरर के पद पर पदोन्नत करने का विशेष अवसर दिया जाए।
- एसएमसी (SMC) शिक्षकों के लिए नीति: दुर्गम, ग्रामीण, कठिन और जनजातीय क्षेत्रों में वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे एसएमसी लेक्चरर्स के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी सेवा नीति बनाई जाए।
सीबीएसई स्कूलों की व्यवस्था और अटेंडेंस पर भी चर्चा
सिर्फ वित्तीय और पदोन्नति के मुद्दों तक ही यह मुलाकात सीमित नहीं रही, बल्कि स्कूलों के रोजमर्रा के संचालन से जुड़ी व्यावहारिक कठिनाइयों पर भी गंभीर मंथन हुआ। प्रतिनिधिमंडल ने सरकार का ध्यान उन सरकारी सीबीएसई स्कूलों की ओर आकर्षित किया जहां हाल ही में दिन में तीन बार अटेंडेंस (हाजिरी) लगाने की एक नई व्यवस्था शुरू की गई है। शिक्षकों का मानना है कि इससे पढ़ाई के बहुमूल्य समय का एक बड़ा हिस्सा केवल कागजी औपचारिकताओं में ही नष्ट हो जाता है, इसलिए इस नियम पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही, नए शैक्षणिक सत्र से स्कूली यूनिफॉर्म को अधिक व्यवस्थित और व्यावहारिक तरीके से लागू करने की बात कही गई। डिजिटल युग की मांग को समझते हुए 11वीं और 12वीं कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए कंप्यूटर साइंस और वोकेशनल आईटी (Information Technology) की पढ़ाई पूरी तरह निशुल्क करने और इसके लिए राज्य के बजट में विशेष प्रावधान करने का पुरजोर आग्रह किया गया है।
मुख्यमंत्री का सकारात्मक रुख, क्या जल्द निकलेगा समाधान?
मुलाकात के बाद एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय नेगी ने मीडिया से बातचीत करते हुए बताया कि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने सभी बिंदुओं को बेहद संवेदनशीलता और गंभीरता के साथ सुना है। सरकार के मुखिया ने प्रतिनिधिमंडल को यह आश्वासन दिया है कि इन तमाम जायज मांगों का अध्ययन करवाकर चरणबद्ध तरीके से समाधान निकाला जाएगा। इस प्रतिनिधिमंडल में राज्य सलाहकार विकेश जनार्था, संरक्षक सुरेश चौहान, एक्शन कमेटी के अध्यक्ष डॉ. उमेश दाउटू और वेब सचिव वीरेंद्र वाशिंगटा सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने पूरी मजबूती के साथ शिक्षकों का पक्ष रखा।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रशासनिक अमला इन 10 सूत्रीय मांगों पर कितनी तेजी से अमल करता है। यदि समय रहते इन पर मुहर लगती है, तो न केवल हजारों शिक्षकों का वर्षों पुराना इंतजार खत्म होगा, बल्कि हिमाचल की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को भी एक नई गति और मजबूती मिलेगी।