अदालती फैसले और सरकार की अपील के कारण फंसा पेच
हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे शिक्षकों के अर्जित अवकाश के बदले नकद वित्तीय लाभ पाने की उम्मीदों पर फिलहाल अदालती प्रक्रिया का पहरा लग गया है। स्कूल शिक्षा विभाग ने इस संबंध में 15 शिक्षकों की ओर से दिए गए अभ्यावेदनों या रिप्रजेंटेशन का विधिवत निपटारा करते हुए अपनी स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट कर दी है। विभाग ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि जब तक इस संदर्भ में चल रही न्यायिक कार्यवाही का अंतिम निर्णय सामने नहीं आ जाता, तब तक इन वित्तीय दावों पर किसी भी प्रकार का अग्रिम विचार किया जाना संभव नहीं है।
शिक्षकों ने की थी पूर्वव्यापी नियमितीकरण की मांग
इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब संबंधित शिक्षकों ने अपनी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से सेवाओं को पूर्वव्यापी आधार पर नियमित मानते हुए अर्जित अवकाश के बदले नकद वित्तीय लाभ जारी करने की गुहार लगाई थी। शिक्षकों का मुख्य तर्क यह था कि वे पूर्वव्यापी नियमितीकरण के दायरे में आते हैं, इसलिए वे सेवाकाल के दौरान मिलने वाले इन वित्तीय परिलाभों के पूर्ण हकदार हैं। अपने दावों को मजबूती प्रदान करने के लिए शिक्षकों ने हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के एक चर्चित मामले, 'अनीता कुमारी बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार' के निर्णय को अपने आधार के रूप में पेश किया था।
राज्य सरकार ने उच्च स्तर पर दायर कर रखी है अपील
शिक्षकों की इन मांगों और तर्कों पर स्कूल शिक्षा विभाग ने अपनी विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया है कि जिस अदालती निर्णय का हवाला शिक्षकों द्वारा दिया जा रहा है, वह अभी अंतिम रूप से प्रभावी नहीं हुआ है। राज्य सरकार ने इस विषय से जुड़ी कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगियों को देखते हुए उच्चतर अदालत में अपील दायर कर रखी है। विभाग का मानना है कि कानूनी प्रक्रिया के दायरे में चल रहे इस मामले पर जल्दबाजी में कोई भी प्रशासनिक कदम उठाना सही नहीं होगा।
न्यायिक फैसले के बाद ही तय होंगे वित्तीय दायित्व
शिक्षा विभाग के इस स्पष्ट रुख से यह साफ हो गया है कि शिक्षकों को अपनी छुट्टियों के नकदीकरण और वित्तीय एरियर के लिए अभी न्यायिक फैसले का लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। कानूनी प्रक्रिया पूरी होने और सरकार की अपील पर अंतिम फैसला आने के बाद ही यह तस्वीर साफ होगी कि शिक्षकों को यह लाभ मिलेगा या नहीं। विभाग का कहना है कि जब तक न्यायिक प्रक्रिया अपने अंतिम मुकाम तक नहीं पहुंच जाती, तब तक कोई भी वित्तीय दायित्व तय नहीं किया जा सकता। भविष्य में आने वाले अंतिम न्यायिक फैसले और उस समय लागू होने वाले सरकारी नियमों व निर्देशों के अनुरूप ही इस मामले में आगामी कदम उठाया जाएगा।