मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी में संगठनात्मक फेरबदल के बीच पूर्व गृह मंत्री और वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के प्रदेश कोर ग्रुप के पुनर्गठन में उनका नाम शामिल नहीं किया गया है, जिसके बाद प्रदेश की राजनीति में सुगबुगाहट तेज हो गई है।
भारतीय जनता पार्टी के नए प्रदेश प्रभारी बिप्लब कुमार देब के दूसरे प्रवास के बाद यह संगठनात्मक बदलाव सामने आया है। तैयार की गई नई सूची के अनुसार, पहले जहां प्रदेश कोर ग्रुप में कुल 20 सदस्य हुआ करते थे, वहीं अब नई सूची में 19 नेताओं को जगह दी गई है। इस बदलाव को मध्य प्रदेश भाजपा में बदलते राजनीतिक समीकरणों और संगठन के भीतर वरिष्ठ नेताओं की भूमिका के पुनर्संतुलन के रूप में देखा जा रहा है।
कभी सरकार में माने जाते थे दूसरे सबसे ताकतवर नेता
नरोत्तम मिश्रा लंबे समय तक पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार में अत्यंत प्रभावशाली मंत्री रहे हैं। उन्हें प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में सरकार के सबसे ताकतवर मंत्रियों में गिना जाता था। इतना ही नहीं, विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों में मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों के रूप में भी उनका नाम प्रमुखता से चर्चा में रहता था। ऐसे में पार्टी के सर्वोच्च नीति-निर्धारण मंच यानी कोर ग्रुप से उनकी अनुपस्थिति ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है।
दतिया उपचुनाव के बाद बदले समीकरण
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरोत्तम मिश्रा के संगठनात्मक समीकरणों में बदलाव की पृष्ठभूमि इसी साल हुए दतिया विधानसभा सीट के उपचुनाव से तैयार हुई थी। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में दतिया सीट से पराजय मिलने के बाद उन्हें पूरी उम्मीद थी कि पार्टी उपचुनाव में उन्हें एक बार फिर मैदान में उतरेगी। उन्होंने इसके लिए अपनी तैयारियां भी शुरू कर दी थीं और आधिकारिक तौर पर नामांकन पत्र तक खरीद लिए थे। हालांकि, पार्टी ने उनकी दावेदारी को दरकिनार करते हुए आशुतोष तिवारी को अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया।
टिकट न मिलने के बाद से ही नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों की नाराजगी खुलकर सामने आई थी। चुनाव के दौरान उनके समर्थकों पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने के गंभीर आरोप लगे, जिससे संगठन के भीतर भारी असंतोष फैल गया। इस आपसी कलह और विरोध के बीच भाजपा को इस सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा। चुनावी परिणाम के तुरंत बाद पार्टी ने सख्त कदम उठाते हुए नरोत्तम समर्थक जिलाध्यक्ष और पूरी जिला कार्यकारिणी को भंग कर दिया था। हालांकि, पार्टी के किसी भी आधिकारिक सूत्र ने उपचुनाव के परिणामों और कोर ग्रुप से नाम हटाए जाने के बीच किसी सीधे संबंध की पुष्टि नहीं की है, लेकिन दोनों घटनाओं के क्रम को उनकी सांगठनिक स्थिति में आए बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
अक्टूबर की बैठकों से भी रहे दूर
प्रदेश भाजपा के कोर ग्रुप की बैठकों का दौर अक्टूबर के महीने में भी चला था, जिसमें नरोत्तम मिश्रा को आमंत्रित नहीं किए जाने की चर्चा जोरों पर थी। अब प्रदेश प्रभारी और प्रदेश संगठन महामंत्री के दायित्वों में बदलाव के बाद कोर ग्रुप की पूरी सूची को नए सिरे से गढ़ा गया है। इस नई सूची में भी नरोत्तम मिश्रा को जगह न मिलने से यह स्पष्ट हो गया है कि संगठन अब एक नई कार्यशैली और प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश भाजपा में सत्ता और संगठन के बीच आपसी समन्वय को और अधिक मजबूत करने के उद्देश्य से वर्ष 2020 में कोर ग्रुप की इस व्यवस्था की शुरुआत की गई थी। इस महत्वपूर्ण मंच पर सरकार और संगठन से जुड़े तमाम नीतिगत, रणनीतिक और राजनीतिक विषयों पर गहन चर्चा होती है। ऐसे में इस समूह से किसी दिग्गज और वरिष्ठ नेता का बाहर होना संगठनात्मक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम घटना है।
भाजपा में पीढ़ीगत बदलाव के संकेत
पार्टी के भीतर चल रहे इन हालिया संगठनात्मक फेरबदल को केंद्रीय नेतृत्व की प्राथमिकताओं के अनुरूप नेतृत्व और जिम्मेदारियों के पुनर्संतुलन के तौर पर देखा जा रहा है। प्रदेश में एक नई टीम और मजबूत समन्वय प्रणाली विकसित करने के प्रयासों के बीच नरोत्तम मिश्रा का कोर ग्रुप से बाहर होना यह संकेत देता है कि पार्टी भविष्य की रणनीतियों के तहत नए चेहरों को आगे बढ़ा रही है।
फिलहाल इस संगठनात्मक बदलाव को लेकर नरोत्तम मिश्रा की भविष्य की भूमिका पर पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है। लेकिन कोर ग्रुप की इस नई फेरबदल सूची ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में दशकों तक प्रमुख केंद्र बिंदु रहे इस वरिष्ठ नेता की राजनीतिक यात्रा अब किस दिशा में आगे बढ़ेगी।