दुनिया के सबसे जटिल और लंबे खिंचते जा रहे भू-राजनीतिक संघर्षों के बीच भारत की भूमिका अब केवल एक मूक दर्शक की नहीं रह गई है। रूस और यूक्रेन के बीच फरवरी 2022 से चल रहे भीषण युद्ध को रोकने के लिए नई दिल्ली ने अब 'वकालत' (advocacy) के दायरे से बाहर निकलकर सीधे मैदान में उतरने का फैसला कर लिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित म्यूनिख लीडर्स मीटिंग के दौरान इस बात का खुलासा किया कि भारत इस जंग को समाप्त करने के लिए दोनों ही प्रमुख पक्षों—मॉस्को और कीव—के साथ बेहद सक्रिय बातचीत कर रहा है।
वकालत से आगे बढ़कर जमीनी समाधान की तलाश
विदेश मंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत इस दुर्भाग्यपूर्ण संघर्ष को जितनी जल्दी हो सके समाप्त देखना चाहता है। नई दिल्ली का रुख हमेशा से यह रहा है कि इस समस्या का कोई भी सैन्य समाधान संभव नहीं है, और इसके लिए केवल कूटनीति तथा संवाद ही एकमात्र रास्ता हैं। पिछले कई महीनों से भारत कूटनीतिक स्तर पर शांति की वकालत कर रहा था, लेकिन अब स्थिति उससे आगे बढ़ चुकी है।
एस जयशंकर ने बताया, 'हम केवल बात करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हम थोड़ा और गहराई से शामिल हुए हैं। हमारी बातचीत इस समय सीधे तौर पर रूस और यूक्रेन दोनों के साथ चल रही है। हमारा मुख्य उद्देश्य ब्लैक Sea (काला सागर) में शिपिंग की सुरक्षा, अनाज के निर्यात, ऊर्जा आपूर्ति और गैर-हमला संभावनाओं (non-attack possibilities) जैसे तात्कालिक मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच सहमति बनाना और मददगार साबित होना है।'
यूक्रेन का बड़ा बयान: 'भारत का प्रस्ताव सबसे व्यापक'
विदेश मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब कुछ ही दिन पहले यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्रेई सिबीहा (Andrii Sybiha) ने एक बड़ा दावा किया था। कीव में पत्रकारों से बात करते हुए सिबीहा ने पहली बार सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि भारत ने इस युद्ध को समाप्त करने के लिए एक बेहद 'व्यापक' और 'विस्तृत' प्रस्ताव रखा है। उन्होंने यहाँ तक कहा था कि अन्य देशों (जैसे तुर्किए, मिस्र और अमेरिका) द्वारा मिले प्रस्तावों के मुकाबले भारत का प्रस्ताव सबसे अधिक कॉम्प्रीहेंसिव है और यूक्रेन इस पर गंभीरता से विचार कर रहा है।
यूक्रेनी पक्ष के अनुसार, यदि रूस ऊर्जा बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और काले सागर में हमलों को रोकने के लिए तैयार होता है, तो कीव ऊर्जा और कृषि युद्धविराम (energy and agricultural truce) तथा संपर्क रेखा पर बिना किसी शर्त के संघर्ष विराम पर विचार करने के लिए तैयार है।
रूस के साथ ऐतिहासिक और अटूट संबंध
रूस के साथ भारत के पारंपरिक और ऐतिहासिक संबंधों पर बात करते हुए एस जयशंकर ने शीत युद्ध के दौर की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि 1950 के दशक से ही मॉस्को ने हर उस समय भारत का साथ दिया है जब हमारी क्षेत्रीय अखंडता और सुरक्षा खतरे में थी। उस दौर में जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा भारत के पड़ोसी देशों के सैन्य शासन का समर्थन कर रहा था, तब सोवियत संघ भारत के साथ मजबूती से खड़ा था।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आज का दौर 1970 और 1980 के दशक से बिल्कुल अलग है। समय के साथ हर रिश्ते में बदलाव आता है और उसे रीफ्रेश किया जाता है। आज रूस और भारत के बीच का रिश्ता केवल रणनीतिक और सैन्य सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें व्यापार, निवेश, अंतरिक्ष तकनीक, परमाणु ऊर्जा और संसाधन बड़े पैमाने पर शामिल हैं।
यूरोप और भारत के अनुभवों का अपना दृष्टिकोण
पश्चिमी देशों और यूरोप के नजरिए पर बात करते हुए भारतीय विदेश मंत्री ने बहुत ही स्पष्ट और तार्किक बात रखी। उन्होंने कहा कि यूरोप अपने अनुभवों के आधार पर दुनिया को देखता है और भारत अपने अनुभवों के आधार पर। चूँकि भारत के रूस के साथ अनुभव लगातार सकारात्मक रहे हैं, इसलिए नई दिल्ली अपनी विदेश नीति का निर्धारण अपने राष्ट्रीय हितों और ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर करती है, न कि किसी के दबाव में आकर।
व्लादिमीर पुतिन की ओर से भी आई थी प्रतिक्रिया
इससे पहले अक्टूबर की शुरुआत में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की थी। पुतिन ने कहा था कि प्रधानमंत्री मोदी लगातार इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए सवाल उठाते रहते हैं और उनके पास इस युद्ध को रोकने को लेकर 'बहुत अच्छे विचार' हैं। पुतिन के इस बयान और यूक्रेन के विदेश मंत्री के बयानों से यह साफ हो जाता है कि वैश्विक पटल पर भारत की मध्यस्थता को दोनों ही युद्धरत देश सम्मान की दृष्टि से देख रहे हैं।
आगे की राह क्या होगी?
- ब्लैक सी सुरक्षा: वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को दुरुस्त करने के लिए जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाना।
- ऊर्जा और कृषि राहत: दोनों देशों के ऊर्जा संयंत्रों और कृषि गोदामों/बंदरगाहों को हमलों से मुक्त रखना।
- संवाद के जरिए शांति: कूटनीतिक मंचों के माध्यम से एक स्थायी युद्धविराम की रूपरेखा तैयार करना।
कुल मिलाकर, वैश्विक उथल-पुथल के इस दौर में भारत ने एक बार फिर अपनी 'विश्वमित्र' वाली छवि को साबित कर दिखाया है। दुनिया की महाशक्तियां जहां एक-दूसरे पर प्रतिबंध लगाने और सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटी हैं, वहीं नई दिल्ली कूटनीति के रास्ते पर चलकर शांति का पैगाम देने में जुटी है। आने वाले दिनों में भारत के यह प्रयास कितने रंग लाएंगे, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा, लेकिन इतना तय है कि वैश्विक कूटनीति के केंद्र में इस समय भारत की स्थिति बेहद मजबूत हो चुकी है।