देश में बैंक, एनबीएफसी और फिनटेक कंपनियों के सॉफ्टवेयर साइबर अपराधियों के निशाने पर हैं। AI आधारित हमलों से बचने के लिए एजेंसियों ने एडवाइजरी जारी की है।
देशभर के वित्तीय संस्थानों के डिजिटल बुनियादी ढांचे पर मंडराया बड़ा खतरा, एजेंसियों ने जारी की संयुक्त चेतावनी
भारतीय वित्तीय क्षेत्र में साइबर सुरक्षा को लेकर एक गंभीर चेतावनी सामने आई है। देश के बैंक, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFCs) और फिनटेक फर्मों के सॉफ्टवेयर इस समय साइबर अपराधियों के मुख्य निशाने पर हैं। इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर के तहत काम करने वाली नेशनल साइबरक्राइम थ्रेट एनालिसिस यूनिट (NCTAU) और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाली एजेंसी CERT-In ने इस बढ़ते ट्रेंड को लेकर संयुक्त रूप से एक एडवाइजरी जारी की है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का हो रहा है दुरुपयोग
जारी की गई एडवाइजरी के मुताबिक, इन साइबर हमलों का मुख्य उद्देश्य वित्तीय लाभ कमाना है। इन वारदातों को अंजाम देने के लिए हमलावर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एजेंटों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। एआई के उपयोग से हमलों की गति इतनी तेज हो जाती है कि सिस्टम को बहुत कम समय में भारी नुकसान पहुंचता है। कुछ चुनिंदा मामलों में अपराधियों ने फंड डिस्बर्समेंट सिस्टम और एपीआई (API) में सेंध लगाकर करोड़ों रुपये के अनधिकृत लेनदेन को अंजाम दिया है।
कमजोरियों और बिना अपडेट सॉफ्टवेयर का फायदा
जांच में यह बात सामने आई है कि हमलावर मुख्य रूप से उन सॉफ्टवेयर और आईटी सिस्टम का फायदा उठाते हैं जिन्हें समय पर अपडेट या पैच नहीं किया गया है। इसके अलावा, इंटरनेट से जुड़े ऐसे सर्वर जिनकी कॉन्फ़िगरेशन गलत तरीके से की गई है, वे भी आसानी से साइबर अपराधियों की गिरफ्त में आ जाते हैं। इस दायरे में वित्तीय संस्थानों के ग्राहकों की शिकायत दर्ज करने वाले इंटरफेस भी शामिल हैं। इसके बाद हैकर सीधे फंड बांटने वाले ऑटोमेटेड सिस्टम या पेमेंट ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल होने वाले विशेष एपीआई को निशाना बनाते हैं।
म्यूल खातों के जरिए पैसों की निकासी और सबूत मिटाना
एडवाइजरी में बताया गया है कि एजेंटिक एआई फ्रेमवर्क के उपयोग से हमले अत्यधिक तीव्र गति से होते हैं। सेंध लगाने के बाद चुराए गए पैसों को तुरंत 'म्यूल' अकाउंट्स में ट्रांसफर कर दिया जाता है। म्यूल अकाउंट्स ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल अवैध तरीके से प्राप्त धन को मंगाने और आगे भेजने के लिए किया जाता है। ये खाते विभिन्न बैंकों में फैلاए जाते हैं, ताकि आईएमपीएस (IMPS) और एनईएफटी (NEFT) के जरिए रकम को तुरंत निकाला जा सके। इसके बाद अपराधी सिस्टम से डिजिटल रिकॉर्ड और अपने निशान मिटा देते हैं, जिससे जांच एजेंसियों के लिए मामलों की तह तक पहुंचना बेहद कठिन हो जाता है।
वित्तीय संस्थानों के लिए जरूरी सुरक्षा निर्देश
इस तरह के साइबर खतरों से निपटने के लिए एजेंसियों ने वित्तीय संस्थानों को कई अहम कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। संस्थानों से कहा गया है कि वे अपने भुगतान से जुड़े सभी डिजिटल इंटरफेस की पूरी सूची तैयार करें और पुराने, अप्रयुक्त या टेस्ट के लिए बनाए गए इंटरफेस को तुरंत बंद कर दें। एपीआई हमलों के जोखिम को न्यूनतम करने के लिए बैंक के चीफ इंफॉर्मेशन सिक्योरिटी ऑफिसर (CISO), ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग और आईटी टीमों को आपसी तालमेल के साथ काम करना होगा।
संस्थानों को दैनिक और प्रति-लेनदेन की सीमाएं तय करने, लाभार्थी के नाम व खातों की सख्त पुष्टि करने तथा असामान्य गति से होने वाले लेन-देन पर निरंतर निगरानी रखने की सलाह दी गई है। इसके अलावा, बैंकों से यह भी जांच करने को कहा गया है कि क्या गैर-श्वेतसूची (non-whitelist) आईपी पतों से एनबीएफसी के एक्सेस टोकन विफल हो रहे हैं या नहीं।