लोकसभा में विपक्ष के नेता ने टाटा समूह के प्रबंधन विवाद पर तीखा हमला बोला है, जिस पर देश के व्यापारिक जगत में चर्चा तेज हो गई है।
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने बुधवार को टाटा समूह के चल रहे गवर्नेंस विवाद की स्थिति पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि इस दिग्गज कारोबारी समूह को 'आपराधिक तरीके से नष्ट' किया जा रहा है। इसके साथ ही उन्होंने देश के अन्य कारोबारी दिग्गजों पर इस मामले में चुप्पी साधने का गंभीर आरोप भी लगाया है।
राहुल गांधी का यह बयान ऐसे समय में आया है जब टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा और समूह की मुख्य होल्डिंग कंपनी टाटा संस के बोर्ड के बीच तकरार लगातार बढ़ती जा रही है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा करते हुए राहुल गांधी ने लिखा कि टाटा को आपराधिक रूप से तबाह किया जा रहा है और किसी भी कारोबारी नेता में एक शब्द बोलने की हिम्मत नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि लोग कब तक चुप रहेंगे, क्या तब तक जब तक वे आपको खरीद नहीं लेते। उन्होंने आगे कहा कि भारतीय व्यापार मोदी और शाह का खिलौना नहीं है। आपमें साहस की कमी है, लेकिन हममें नहीं है। हम इन अपराधों के लिए न्याय सुनिश्चित करेंगे।
टाटा समूह के भीतर नियंत्रण और दिशा को लेकर छिड़ा विवाद
टाटा समूह हाल के वर्षों के अपने सबसे गंभीर गवर्नेंस संकट से गुजर रहा है। यह विवाद इस बुनियादी सवाल पर खड़ा हुआ है कि भारत के सबसे प्रतिष्ठित व्यावसायिक समूहों में से एक पर वास्तविक नियंत्रण किसका होना चाहिए। सितंबर 2026 में यह संघर्ष तब और गहरा गया जब टाटा संस के बोर्ड ने एन चंद्रशेखरन के लिए पांच साल के नए कार्यकाल को मंजूरी दी और कंपनी को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने यानी स्टॉक मार्केट लिस्टिंग की ओर कदम बढ़ाया। नोएल टाटा ने इन दोनों ही फैसलों का विरोध किया। उनका तर्क था कि ये निर्णय टाटा ट्रस्ट्स के रुख के खिलाफ हैं और बोर्ड की प्रामाणिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हैं।
इस बीच, टाटा ट्रस्ट्स के दो ट्रस्टियों वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने गवर्नेंस के मुद्दों को लेकर चैरटी कमिश्नर का रुख किया था। वहीं, कोरम पूरा न होने के कारण टाटा संस की वार्षिक आम बैठक (एजीएम) को भी स्थगित करना पड़ा था। टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में सामूहिक रूप से लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिससे उनके पास बहुमत का मालिकाना हक और समूह के संचालन पर मजबूत प्रभाव रहता है। अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन का पद संभाला था। तब से लेकर अब तक ट्रस्टियों की नियुक्तियों, बोर्ड में प्रतिनिधित्व और समूह की भविष्य की दिशा को लेकर लगातार मतभेद सामने आते रहे हैं।
लिस्टिंग, आरबीआई की भूमिका और व्यावसायिक प्रदर्शन पर मतभेद
इस पूरे विवाद का एक बड़ा केंद्र यह भी है कि टाटा संस को निजी तौर पर काम करते रहना चाहिए या अपने शेयर शेयर बाजारों में सूचीबद्ध करने चाहिए। मार्च 2024 में टाटा संस के बोर्ड ने कंपनी को गैर-सूचीबद्ध रखने का सर्वसम्मति से समर्थन किया था। इसके बाद 2025 में पारित प्रस्तावों में दो प्रमुख टाटा ट्रस्ट्स ने भी इस स्थिति को फिर से पुष्ट किया था।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा सितंबर 2026 में टाटा संस के पंजीकरण सरेंडर करने के आवेदन को खारिज किए जाने से यह मुद्दा फिर से चर्चा के केंद्र में आ गया। एक अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) के रूप में वर्गीकृत होने के कारण इसके विनियामक निहितार्थ हैं, जिसमें संभावित लिस्टिंग की आवश्यकता भी शामिल है। नोएल टाटा का तर्क था कि आरबीआई के संदेश में स्पष्ट रूप से लिस्टिंग का आदेश नहीं दिया गया था और कंपनी को इसके वैकल्पिक समाधान तलाशने चाहिए।
यह विवाद केवल कॉरपोरेट रणनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर भी गहराया। नोएल टाटा के नेतृत्व वाले टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के फैसले की वैधता पर सवाल उठाया, विशेष रूप से चेयरमैन के कास्टिंग वोट को लेकर जब नोएल टाटा ने प्रस्ताव का विरोध किया और उनके साथी ट्रस्टी नॉमिनी वेणु श्रीनिवासन ने इसका समर्थन किया। ट्रस्ट्स का तर्क था कि टाटा संस के आर्टिकल ऑफ एसोसिएशन के तहत उनके नामितों के सकारात्मक समर्थन की आवश्यकता थी। हालांकि, टाटा संस का पक्ष रहा है कि बोर्ड ने बहुमत के वोट से इस पुनर्नुयुक्ति को मंजूरी दी थी।
समूह की वित्तीय और व्यावसायिक प्रदर्शन ने भी इन तनावों को और हवा दी है। नोएल टाटा ने एयर इंडिया और टाटा डिजिटल जैसे गैर-सूचीबद्ध उपक्रमों में बढ़ते घाटे के साथ-साथ पूंजी आवंटन और कार्यकारी पारिश्रमिक को लेकर चिंताएं जताई हैं। इसके अलावा, ट्रस्टियों के बीच आपसी असहमति औपचारिक शिकायतों और सार्वजनिक बयानों के रूप में सामने आने लगी है, जिससे यह संस्थागत संकट और गहरा गया है। यह टकराव अब केवल कॉरपोरेट रणनीति पर मतभेद नहीं रह गया है, बल्कि बहुमत के मालिकाना हक, बोर्ड की स्वतंत्रता और उन शासन व्यवस्थाओं के बीच संतुलन की लड़ाई बन गया है जिन्होंने पीढ़ियों से टाटा समूह को आकार दिया है।