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क्या कमजोर पड़ रही है भारतीय मुसलमानों की लीडरशिप? जंतर-मंतर के बहाने उठ रहे बड़े सवाल

क्या कमजोर पड़ रही है भारतीय मुसलमानों की लीडरशिप? जंतर-मंतर के बहाने उठ रहे बड़े सवाल

देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में घटी दो घटनाओं ने राजनीतिक गलियारों और सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या भारत के करोड़ों मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली लीडरशिप अब कमजोर होती जा रही है? सितंबर महीने के आखिरी हफ्तों में दो अलग-अलग संगठनों द्वारा तय किए गए प्रदर्शनों का परवान न चढ़ पाना इस बहस के केंद्र में है। क्या यह सिर्फ प्रशासनिक पाबंदियों का नतीजा है या इसके पीछे संगठनात्मक विफलता और अंदरूनी कलह बड़ी वजह है?

जंतर-मंतर पर क्यों नहीं गूंज पाई आवाज?

घटना की शुरुआत 17 सितंबर 2026 को होती है, जब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने 'संविधान बचाओ-शरिया बचाओ' अभियान के तहत जंतर-मंतर पर बड़े धरने की योजना बनाई थी। बोर्ड का दावा था कि उसने प्रशासन को पूरी आश्वस्ति दी थी कि विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेगा और भीड़ तय सीमा के भीतर होगी। बावजूद इसके, ठीक कार्यक्रम से एक दिन पहले दिल्ली पुलिस ने अनुमति रद्द कर दी।

आपात स्थिति में बोर्ड के शीर्ष अधिकारियों—अध्यक्ष मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी, प्रवक्ता डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास और महासचिव मौलाना फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना आक्रोश जताया। हालांकि, धरना स्थल पर विरोध दर्ज कराने के बजाय कार्यक्रम को प्रेस क्लब तक सीमित कर दिया गया और देश भर के लोगों से दिल्ली न आने की अपील की गई।

दूसरी कोशिश और वही पुराना नतीजा

ठीक 12 दिन बाद, यानी 29 सितंबर 2026 को मॉनिटरिंग कमेटी ऑफ इंडियन मुस्लिम्स (MCIM) ने एक बार फिर जंतर-मंतर पर उतरने का ऐलान किया। इस बार पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने भी वीडियो संदेश जारी कर लोगों से जुटने की अपील की। वोटर लिस्ट से विशेष समुदाय के नाम हटाने, मस्जिदों और दरगाहों पर बुलडोजर कार्रवाई तथा चुनाव आयोग की भूमिका जैसे गंभीर मुद्दों पर यह प्रदर्शन होना था।

लेकिन नतीजा पिछले जैसा ही रहा। जंतर-मंतर पर पहुंचते ही पुलिस ने कई विपक्षी सांसदों और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया। समाजवादी पार्टी के सांसद जिया उर रहमान बर्क ने इस दौरान कहा कि 'हम आखिरी सांस तक लड़ते रहेंगे', लेकिन जमीन पर प्रदर्शन धरे का धरा रह गया।

ऐतिहासिक साख बनाम वर्तमान वास्तविकता

विश्लेषकों का मानना है कि AIMPLB का यह घटनाक्रम केवल पुलिस की सख्ती का मामला नहीं है, बल्कि यह बोर्ड की सार्वजनिक घोषणाओं और उसकी जमीनी तैयारियों के बीच की बड़ी खाई को उजागर करता है। एक वक्त था जब शाह बानो मामले के दौरान बोर्ड की दबाव-राजनीति ने सरकार के फैसलों तक को बदल दिया था। लेकिन आज स्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं। वर्तमान में बोर्ड की छवि एक 'प्रतिक्रियावादी' संस्था की बन गई है, जो किसी मुद्दे पर पहल करने के बजाय केवल प्रतिक्रिया देने तक सीमित रह गई है।

अंदरूनी विरोध और बुद्धिजीवियों का रुख

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प और गंभीर पहलू यह रहा कि सवाल सिर्फ बाहर से नहीं, बल्कि समुदाय के भीतर से भी उठ रहे हैं। गत 23 सितंबर 2026 को देश के 92 प्रतिष्ठित मुस्लिम बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक हस्तियों ने एक साझा बयान जारी कर AIMPLB के अभियान को सिरे से खारिज कर दिया।

इस बयान पर हस्ताक्षर करने वालों में नसीरुद्दीन शाह, मल्लिका साराभाई, तीस्ता सीतलवाड़, जाकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज जैसे बड़े नाम शामिल थे। इनका कहना था कि बोर्ड केवल संविधान के अनुच्छेद 25 से 30 (धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार) का हवाला देता है, लेकिन अनुच्छेद 14 और 15 (समानता का अधिकार) की अनदेਖी करता है। जब समुदाय के ही प्रबुद्ध वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपने ही शीर्ष धार्मिक संगठन के खिलाफ खड़ा हो जाए, तो लीडरशिप की वैधानिकता पर सवालिया निशान लगना स्वाभाविक है।

राजनीतिक मोर्चे पर भी विफलता

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो तथाकथित 'मुस्कान और अल्पसंख्यक कार्ड' खेलने वाले तमाम बड़े नेता चुनाव दर चुनाव कमजोर होते दिखे हैं। बंगाल से लेकर असम तक, कई दिग्गज नेताओं के प्रभाव क्षेत्र सिमटते नजर आए हैं। जानकारों का मानना है कि मुस्लिम समाज के भीतर राजनीतिक नेतृत्व और धार्मिक नेतृत्व के बीच एक बड़ी खाई है। अन्य धर्मों के उलट, जहां धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व अक्सर एक साझा मंच पर तालमेल बिठाते हैं, वहीं मुसलमानों के मामले में राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए समुदाय का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन वास्तविक और सशक्त नेतृत्व उभरने नहीं देते।

आगे की राह और निष्कर्ष

शादाब सैफी जैसे विश्लेषकों का साफ तौर पर कहना है कि जब तक मुस्लिम समाज खुद आगे आकर एक साझा, मजबूत और पारदर्शी मंच तैयार नहीं करेगा, तब तक जंतर-मंतर जैसे प्रदर्शन केवल कागजी घोषणाओं तक ही सीमित रहेंगे। आज जरूरत इस बात की है कि धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व दोनों मिलकर एक ऐसी बौद्धिक और संस्थागत ताकत पैदा करें, जिसे कोई भी सरकार या प्रशासन आसानी से नजरअंदाज न कर सके। 17 और 29 सितंबर के वाकये इस बात की गवाही देते हैं कि बदलाव का यह वक्त अब आ चुका है, बशर्ते नेतृत्व इसे सही दिशा दे सके।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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