झारखंड की वादियों और प्राकृतिक संपदाओं पर किस तरह कागजी जालसाजी के जरिए कब्जा किया जा रहा है, इसका एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। राज्य के बोकारो जिले में सरकारी फाइलों और राजस्व दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ का एक ऐसा नायाब खेल खेला गया, जिसके बारे में जानकर अच्छे-अच्छे शातिर भी हैरान रह जाएंगे। यहाँ महज सवा एकड़ जमीन को सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर करके सीधे 103 एकड़ में तब्दील कर दिया गया और वह भी वन विभाग की संरक्षित ज़मीन! इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड कोई आम व्यक्ति नहीं, बल्कि ज़मीनों की खरीद-फरोख्त की आड़ में बड़ा जालसाज निकला है।
झारखंड हाईकोर्ट में सीआईडी का सनसनीखेज हलफनामा
बोकारो के बहुचर्चित तेतुलिया मौजा ज़मीन घोटाले की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, वैसे-वैसे चौंकाने वाले खुलासे सामने आ रहे हैं। इस मामले में गिरफ्तार मुख्य आरोपी और मास्टरमाइंड शैलेश सिंह की जमानत याचिका का विरोध करते हुए सीआईडी की अनुसंधानकर्ता डीएसपी सरिता मुर्मू ने झारखंड हाईकोर्ट में एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। इस हलफनामे में शैलेश सिंह को 'ऑथर ऑफ़ फ्रॉडिज्म' यानी जालसाजी का शहंशाह करार दिया गया है।
सीआईडी की अब तक की जांच से पता चला है कि आरोपी ने फर्जीवाड़े की ऐसी पटकथा लिखी, जिसमें सरकारी तंत्र और कागजों की धज्जियां उड़ा दी गईं। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई थी कि वन विभाग की अनुमति के नाम पर फर्जी एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) तैयार किया गया और उसी के आधार पर करोड़ों की सरकारी ज़मीन को निजी कंपनी के नाम पर ट्रांसफर कर दिया गया।
ऐसे रचा गया पूरा षड्यंत्र: 1.03 एकड़ बन गई 103 एकड़
जांच एजेंसी द्वारा अदालत को सौंपी गई रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरे फर्जीवाड़े की शुरुआत राजस्व रिकॉर्ड से छेड़छाड़ करके की गई थी। तेतुलिया मौजा के जमाबंदी रजिस्टर में सुनियोजित तरीके से ओवरराइटिंग और काट-छांट की गई। कागजों पर खेल करते हुए मात्र 1.03 एकड़ (सवा एकड़) भूमि के क्षेत्रफल को बढ़ाकर सीधे 103 एकड़ कर दिया गया। इतना ही नहीं, ज़मीन का लगान भी 35 रुपये से भारी कटौती करते हुए महज 5 रुपये कर दिया गया ताकि किसी को शक न हो।
आरोपी शैलेश कुमार सिंह ने दो स्थानीय व्यक्तियों, इजहार हुसैन और अख्तर हुसैन को ज़मीन का असली रैयत (مالک) बताया। इसके बाद उनसे पावर ऑफ एट्रोनी ले ली। हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों के नाम पर पावर ऑफ एट्रोनी ली गई, उन्हें खुद इस बात की कोई भनक तक नहीं थी कि उनकी आड़ में इतना बड़ा खेल खेला जा रहा है।
सिर्फ 18 दिन में बनाई कंपनी और कर दी रजिस्ट्री
घोटाले की शातिरता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि मास्टरमाइंड ने अपने बेटे आयुष कुमार सिंह और अपने एक कर्मचारी ललन सिंह के नाम पर 23 जनवरी 2021 को 'मेसर्स उमायुष मल्टीकाम प्राइवेट लिमिटेड' नाम से एक फर्जी कंपनी का गठन किया। कंपनी के अस्तित्व में आने के ठीक 18 दिन बाद यानी 10 फरवरी 2021 को इस फर्जी कंपनी के पक्ष में 74.38 एकड़ वन भूमि की रजिस्ट्री भी करा दी गई।
चेकों का फर्जी खेल और बैंक खातों का लेनदेन
- रजिस्ट्री डीड में 10.30 करोड़ रुपये के भुगतान के लिए आईसीआईसीआई बैंक के चार चेक दिखाने का दावा किया गया था।
- जब पुलिस और जांच एजेंसियों ने पूछताछ की, तो आरोपी ने खुद स्वीकार किया कि वे चेक कभी बैंक में भुनाए ही नहीं गए थे।
- जिस कंपनी के नाम पर करोड़ों की ज़मीन की रजिस्ट्री हुई, उसके खाते में कभी उतनी धनराशि थी ही नहीं।
- जांच में यह भी सामने आया कि मेसर्स राजबीर कंस्ट्रक्शन कंपनी ने उमायुष मल्टीकाम के खाते में कुल 3.40 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए थे।
- कंपनी ने 2 फरवरी 2021 को खाता खोलकर शुरुआती तौर पर मात्र एक लाख रुपये जमा किए थे, जिसके बाद किस्तों में राजबीर कंस्ट्रक्शन से फंड्स आए।
- ज़मीन की इस अवैध रजिस्ट्री के एवज में लगने वाला रजिस्ट्रेशन शुल्क सह-आरोपी पुनीत कुमार अग्रवाल द्वारा भरा गया था।
सीआईडी की नजरों में कैसे आया यह मामला?
इस पूरे मामले की सुगबुगाहट तब शुरू हुई जब बोकारो के सेक्टर 12 थाने में 18 मार्च 2024 को प्राथमिकी (कांड संख्या 32/2024) दर्ज की गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए बाद में अनुसंधान का जिम्मा सीआईडी को सौंप दिया गया। सीआईडी ने 9 जनवरी 2025 को अपना नया केस दर्ज कर इस सिंडिकेट की गहराई से छानबीन शुरू की।
जांच में यह साफ हो गया कि जिन कथित रैयतों (इजहार हुसैन और अख्तर हुसैन) के ज़रिए ज़मीन का सौदा दिखाया गया था, उनके पास न तो कोई वैध कागजात थे और न ही उन्हें इस बात की कोई जानकारी थी कि उनकी मुलाकात 2011 में शैलेश सिंह से होने के बाद उनके नाम का इस्तेमाल इस तरह के बड़े घोटाले में किया जाएगा।
पर्यावरण और सरकारी संपत्तियों पर बड़ा खतरा
यह मामला सिर्फ कागजी हेराफेरी का नहीं है, बल्कि देश कीमती वन संपदा को निजी स्वार्थ के लिए निगलने की एक खतरनाक साजिश का उदाहरण है। झारखंड जैसे राज्य में जहाँ खनिज और वन संपदा प्रचुर मात्रा में मौजूद है, इस तरह के ज़मीन घोटाले प्रशासनिक और कानूनी व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करते हैं। बहरहाल, झारखंड हाईकोर्ट में सीआईडी के इस कड़े रुख और पुख्ता हलफनामे के बाद मास्टरमाइंड शैलेश सिंह की मुश्किलें और अधिक बढ़ गई हैं, तथा इस पूरे सिंडिकेट से जुड़े अन्य चेहरों पर भी कानून का शिकंजा कसना तय माना जा रहा है।