संतान की लंबी उम्र, यशस्वी जीवन और उत्तम स्वास्थ्य के लिए रखे जाने वाले कठिनतम व्रतों में शुमार 'जितिया व्रत' (जीवित्पुत्रिका व्रत) को लेकर माताओं में भारी उत्साह और निष्ठा देखने को मिल रही है। 3 अक्टूबर 2026 को पूरे दिन और रात बिना अन्न-जल के कठिन निर्जला उपवास रखने के बाद, अब व्रती महिलाओं को बेसब्री से अगले दिन यानी पारण के समय का इंतजार है। आखिरकार 4 अक्टूबर 2026 को जितिया व्रत का पारण किस समय किया जाएगा और इस दौरान किन-किन नियमों का पालन करना अनिवार्य है, आइए जानते हैं पूरी और सटीक जानकारी।
4 अक्टूबर को किस समय खुलेगा जितिया व्रत?
पंचांग की गणना और खगोलीय स्थितियों के अनुसार, इस वर्ष आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 3 अक्टूबर को सुबह शुरू हुई थी और इसका समापन 4 अक्टूबर की सुबह लगभग 5:51 बजे हो रहा है। इसके तुरंत बाद नवमी तिथि का आरंभ हो जाएगा।
धार्मिक परंपराओं और मान्यताओं के अनुसार, जितिया व्रत का पारण हमेशा नवमी तिथि में ही किया जाता है। ताजा पंचांगीय गणनाओं के मुताबिक, रविवार, 4 अक्टूबर 2026 को सुबह 7:28 बजे के बाद व्रत का पारण करना सबसे उत्तम रहेगा। कुछ स्थानीय पंचांगों और खगोलीय गणनाओं में यह समय 7:29 बजे के बाद भी बताया गया है। सूर्योदय और स्थानीय समयानुसार एक-दो मिनट का यह अंतर स्वाभाविक है, इसलिए अपनी क्षेत्रीय परंपरा या स्थानीय पंडित जी के मार्गदर्शन को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।
7:28 या 7:29 बजे? क्यों है समय में एक मिनट का अंतर
कई व्रती महिलाओं के मन में यह सवाल आ रहा है कि अलग-अलग जगहों या रिपोर्टों में पारण का समय 7:28 बजे और 7:29 बजे क्यों दिखाया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अंतर देश के अलग-अलग शहरों में सूर्योदय के समय (Sunrise Time) में आने वाले मामूली अंतर की वजह से होता है।
चूंकि पंचांग की गणना स्थानीय अक्षांश और देशांतर के आधार पर तय होती है, इसलिए आपके शहर के पंचांग में दिया गया समय ही सबसे सटीक माना जाएगा। हालांकि, सामान्य तौर पर 7:28 बजे के बाद नवमी तिथि और पारण के लिए सभी जरूरी शुभ योग बन रहे हैं।
अष्टमी तिथि समाप्त होने पर तुरंत क्यों नहीं खोल सकते व्रत?
यह एक बेहद आम सवाल है जो अक्सर महिलाओं के मन में उठता है। चूंकि अष्टमी तिथि 4 अक्टूबर की सुबह करीब 5:51 बजे ही समाप्त हो रही है, तो क्या उसी समय व्रत खोल लेना चाहिए?
सनातन धर्म की शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार, केवल तिथि समाप्त होने भर से व्रत का पारण नहीं किया जाता है। जितिया व्रत के नियमों में स्पष्ट निर्देश है कि पारण हमेशा सूर्योदय के बाद और नवमी तिथि के निश्चित वेला में ही होना चाहिए। इसके अलावा, पारण से पहले भगवान जीमूतवाहन की पूजा, सूर्य देव को अर्घ्य और कथा स्मरण का विधान है। इसलिए सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ संपन्न करने के बाद ही भोजन या जल ग्रहण करना सही परंपरा है।
जितिया व्रत पारण की संपूर्ण विधि
पारण के दिन सुबह की शुरुआत एक निश्चित धार्मिक अनुष्ठान के साथ होती है:
- स्नान और शुद्धि: 4 अक्टूबर की सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर साफ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल की सफाई: घर के पूजा स्थल और जितिया व्रत के स्थान को अच्छी तरह साफ कर लें।
- सूर्य को अर्घ्य: उगते हुए सूर्य को तांबे के लोटे से जल अर्पित करें और उनका आशीर्वाद लें।
- जीमूतवाहन की पूजा: भगवान जीमूतवाहन और अपनी संतान की मंगल कामना करते हुए उनका स्मरण करें।
- प्रसाद ग्रहण करना: पूजा के बाद भगवान को भोग लगाएं और सबसे पहले प्रसाद व जल ग्रहण कर अपना निर्जला उपवास खोलें।
पारण के बाद सबसे पहले क्या खाना चाहिए?
लगातार लगभग 24 से 36 घंटे तक बिना पानी के रहने के बाद शरीर अंदर से कमजोर हो जाता है। ऐसे में अचानक भारी या मसालेदार भोजन करना सेहत के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार:
- सबसे पहले थोड़ा सा सादा पानी या गुनगुना पानी पिएं ताकि शरीर में हाइड्रेशन का स्तर सुधरे।
- इसके बाद हल्का, आसानी से पचने वाला सात्विक भोजन लें।
- बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कई पारंपरिक संस्कृतियों में पारण के दौरान नोनी का साग, झिंगनी (तोरी) की सब्जी और मड़ुआ की रोटी जैसी पौष्टिक चीजों को शामिल करने की पुरानी परंपरा है, जो शरीर को अंदर से ऊर्जा देती है।
- बहुत ज्यादा तली-भुनी या मिर्च-मसाले वाली चीजों से शुरुआती घंटों में पूरी तरह परहेज करें।
किन क्षेत्रों में रखा जाता है यह कठिन व्रत?
जितिया (जीवित्पुत्रिका) व्रत मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों जैसे बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए इस कठिन निर्जला उपवास को रखती हैं। लोक कथाओं के अनुसार, गंधर्वराज जीमूतवाहन की कृपा से ही व्रती महिलाओं की संतानों की रक्षा होती है और उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है।
पारण के दिन इन जरूरी बातों का रखें ख्याल
व्रत का समापन करते समय किसी भी प्रकार की हड़बड़ी न करें। समय को लेकर यदि कोई भ्रम की स्थिति हो, तो अपने आस-पास के विद्वान पंडित या पारिवारिक परंपराओं से सलाह अवश्य लें। निर्जला उपवास के बाद अत्यधिक कमजोरी महसूस होने पर तुरंत आराम करें और डॉक्टर की सलाह से ही आहार लेंसंक्षेप में समझें जितिया पारण 2026 की मुख्य बातें
- व्रतः जीवित्पुत्रिका (जितिया) 2026
- पारण की तिथि: 4 अक्टूबर 2026, रविवार
- अष्टमी तिथि समाप्ति: सुबह 5:51 बजे
- पारण का शुभ समय: सुबह 7:28 बजे के बाद
- मुख्य नियम: स्नान, सूर्य अर्घ्य और पूजा के बाद ही जल ग्रहण करें।
कुल मिलाकर, 4 अक्टूबर की सुबह सूर्योदय के ठीक बाद अपनी पूजा-अर्चना को समय पर पूरा कर लें और 7:28 बजे के बाद विधि-विधान से अपने इस कठिन व्रत का पारण करें। आपकी संतान का जीवन सुखमय और मंगलमय हो, इसी कामना के साथ सभी व्रती महिलाओं को जितिया पर्व की अनंत शुभकामनाएं।।