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कैसे जापान का सबसे पसंदीदा भोजन बना 'करी', जो कभी था इसका विरोधी

कैसे जापान का सबसे पसंदीदा भोजन बना 'करी', जो कभी था इसका विरोधी

जब भी हमारे जहन में जापानी व्यंजनों की बात आती है, तो सबसे पहले ताजी सूशी, उबलते हुए रामेन नूडल्स या फिर टेम्पुरा की तस्वीरें उभरती हैं। जापानी भोजन अपनी नजाकत, प्राकृतिक स्वादों और हल्की सामग्री के लिए दुनिया भर में मशहूर है। ऐसे में यह सोचना भी थोड़ा अजीब लगता है कि एक ऐसा देश जो अपनी पारम्परिक डाइट के लिए जाना जाता है, वहां का आज का सबसे लोकप्रिय और कम्फर्ट फूड कोई और नहीं बल्कि 'करी' (Curry) है। यह कहानी न केवल एक विदेशी डिश को अपनाने की है, बल्कि यह इंसानी संस्कृति के मेल-मिलाप और वक्त के साथ बदलती प्राथमिकताओं का एक बेहतरीन दस्तावेज भी है।

एक ऐसा व्यंजन जो जापानी संस्कृति के बिल्कुल उलट था

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि शुरुआती दौर में करी को जापान के पारंपरिक खान-पान के ठीक विपरीत यानी इसका 'एंटीथीसिस' माना जाता था। पारंपरिक जापानी भोजन में मसालों की तेज गंध, भारीपन और कृत्रिम रंगों के लिए कोई जगह नहीं थी। वहां जोर इस बात पर होता था कि सामग्री का अपना मूल स्वाद बरकरार रहे। इसके विपरीत, करी अपनी गाढ़ी ग्रेवी, मसालों के अनूठे मिश्रण और तीखेपन के लिए जानी जाती है। शुरुआत में जब यह विदेशी पकवान जापानी तटों पर पहुंचा, तो लोगों ने इसे एक बड़ी चुनौती और अजीबोगरीब विदेशी जायके के रूप में देखा था।

लेकिन जैसा कि इतिहास गवाह है, संस्कृतियां जब आपस में मिलती हैं, तो दीवारें नहीं बल्कि नए रास्ते बनते हैं। जापान ने भी इस विदेशी जायके को न केवल स्वीकार किया, बल्कि इसे पूरी तरह से अपने रंग में रंग लिया। आज 'कारे राisu' (करी राइस) वहां के हर घर, स्कूल की कैंटीन और रेस्टोरेंट के मेन्यू का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।

ब्रिटिश साम्राज्य के जरिए जापान तक पहुंचा जायका

यह जानना बेहद दिलचस्प है कि जापान तक करी भारत से सीधे नहीं पहुंची थी। इसके पीछे एक लंबा भू-राजनीतिक सफर जुड़ा हुआ है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में, जब जापान ने अपनी सदियों पुरानी बंद दरवाजे की नीति (सकोकु) को खत्म किया और दुनिया के लिए अपने दरवाजे खोले, तब ब्रिटिश नौसेना के माध्यम से यह पकवान वहां पहुंचा।

ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान अंग्रेज भारत से करी पाउडर और इस व्यंजन को अपने साथ ब्रिटेन ले गए थे। वहां उन्होंने इसे अपनी पसंद के अनुसार थोड़ा बदला और एक सुविधाजनक 'करी सॉस' या पाउडर का रूप दिया। जब ब्रिटिश नौसेना के जहाज जापानी बंदरगाहों पर पहुंचे, तो उनके नाविकों और अधिकारियों के जरिए यह महकती हुई डिश जापानी सेना और नौसेना के किचन तक पहुंच गई।

सैन्य छावनियों से निकलकर आम नागरिकों की थाली तक

शुरुआती दौर में करी को जापानी सेना और नौसेना में बड़े पैमाने पर अपनाया गया। इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण भी था। सेना के जवानों को एक ऐसा पौष्टिक और ऊर्जा से भरपूर भोजन चाहिए था जिसे आसानी से तैयार किया जा सके और जो लंबे अभियानों के दौरान खराब न हो। करी पाउडर ने इस समस्या को चुटकियों में हल कर दिया।

जब सैनिक अपनी सेवा पूरी करके वापस अपने गांवों और शहरों में लौटे, तो वे अपने साथ इस स्वादिष्ट व्यंजन की रेसिपी भी लेते आए। धीरे-धीरे यह डिश सैनिकों की बैरकों से निकलकर आम नागरिकों के घरों के डाइनिंग टेबल तक पहुंच गई। जापान के तेजी से होते आधुनिकीकरण और शहरीकरण के दौर में यह व्यंजन लोगों के बीच एक स्टेटस सिंबल के साथ-साथ एक बेहद लोकप्रिय वीकेंड मील भी बन गया।

कैसे जापानी स्वाद के अनुकूल ढली 'करी'?

भारतीय करी और जापानी करी में जमीन-आसमान का फर्क है। जहां भारतीय करी में मसालों की विविधता, ताजी मिर्च और तीखेपन की प्रधानता होती है, वहीं जापानी करी ने अपने देश के मौसम और स्वाद के मिजाज को ध्यान में रखते हुए खुद को पूरी तरह बदल लिया।

  • कम तीखापन और हल्का मिठास: जापानी करी का स्वाद आमतौर पर थोड़ा मीठा, गाढ़ा और कम तीखा होता है। इसमें अक्सर सेब और शहद का इस्तेमाल किया जाता है जो इसके तीखेपन को संतुलित करता है।
  • रूक्स (Roux) का प्रयोग: जापानी करी को गाढ़ा करने के लिए मक्खन, मैदे और करी पाउडर के मिश्रण से 'रूक्स' तैयार किया जाता है, जो इसे एक अलग ही मखमली टेक्सचर देता है।
  • सब्जियों और मांस का चयन: इसमें पारंपरिक रूप से आलू, गाजर और प्याज का इस्तेमाल होता है, साथ ही सुअर का मांस (पोर्क), बीफ या चिकन इसके मुख्य घटक बनते हैं।

यह लोकलाइजेशन (Localisation) ही इस बात की सबसे बड़ी वजह बनी कि यह विदेशी भोजन जापानी दिलों में अपनी गहरी जगह बना सका। उन्होंने इसे अपनी संस्कृति पर थोपा हुआ नहीं माना, बल्कि इसे अपनी रसोई की मौलिकता के साथ जोड़कर एक नया रूप दे दिया।

आधुनिक जापान में 'करी' का सांस्कृतिक महत्व

आज के आधुनिक जापान में करी सिर्फ पेट भरने का जरिया नहीं है, बल्कि यह वहां की पॉप कल्चर और नॉस्टैल्जिया (पुरानी यादों) से जुड़ा एक अहम हिस्सा है। हर साल जापान में लाखों टन करी रूक्स बेचे जाते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर किसी की पहली पसंद 'करी राइस' होती है।

स्कूलों में मिड-डे मील के रूप में करी का परोसा जाना इस बात का प्रमाण है कि यह बच्चों के बीच कितना लोकप्रिय है। इसके अलावा, जापानी रेलवे स्टेशनों और हाइवे के किनारे बने रेस्टोरेंट्स में मिलने वाली 'कात्सु करी' (जिसमें करी के साथ डीप-फ्राइड पोर्क कटलेट परोसा जाता है) पर्यटकों के बीच भी आकर्षण का मुख्य केंद्र रहती है।

निष्कर्ष: खान-पान की सीमाओं से परे एक सफर

जापान में करी की यह कहानी हमें सिखाती है कि संस्कृतियां कभी भी स्थिर नहीं होतीं। वे हमेशा एक-दूसरे से सीखती हैं, बदलती हैं और एक नया रूप अख्तियार करती हैं। जो व्यंजन कभी जापानियों के लिए पूरी तरह अजनबी और उनके खान-पान के सिद्धांतों के खिलाफ था, आज वही उनकी राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। यह इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे वैश्वीकरण और स्थानीय प्राथमिकताओं का मेल एक ऐसी चीज को जन्म दे सकता है जो पीढ़ियों तक दिलों पर राज करती है।

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अल्का सिंह

अल्का सिंह

Senior Content Writer

अल्का सिंह स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विषयों पर गहन शोध के साथ लेखन करती हैं। उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को केवल सामान्य जानकारी ही नहीं, बल...

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