महाराष्ट्र के अमरावती जिले से एक बेहद दुखद और झकझोर देने वाली खबर सामने आ रही है। भातकुली स्थित एक आदिवासी आश्रमशाला में पढ़ने वाली पांचवीं कक्षा की एक मासूम छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई है। इस घटना के बाद से पूरे इलाके में शोक और गुस्से का माहौल है। परिजनों ने स्कूल प्रशासन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं, जिसके बाद प्रशासनिक अमले में हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए एक विशेष जांच समिति का गठन कर दिया है और मात्र सात दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए हैं।
अचानक बिगड़ी तबीयत और फिर अस्पताल में तोड़ा दम
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मृतका की पहचान प्रिया मावसकर के रूप में हुई है, जो भातकुली के शासकीय आश्रमशाला में रहकर अपनी पांचवीं कक्षा की पढ़ाई पूरी कर रही थी। हॉस्टल में रहने के दौरान अचानक प्रिया के पेट में तेज दर्द उठा। शुरुआत में इसे सामान्य दर्द या पेट की कोई हल्की समस्या समझा गया, लेकिन जब उसकी हालत लगातार बिगड़ने लगी, तो स्कूल प्रबंधन की नींद खुली।
सूत्रों और मिली जानकारी के मुताबिक, हालत गंभीर होने पर उसे तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इतनी कम उम्र में अचानक हुई इस मौत ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर हॉस्टल में रहने वाले बच्चों की सेहत को लेकर इतनी बड़ी लापरवाही क्यों बरती गई? क्या समय पर उसे सही मेडिकल सहायता नहीं मिल पाई थी?
परिजनों का फूटा गुस्सा, न्याय की गुहार
घटना की सूचना मिलते ही मृतका प्रिया मावसकर के माता-पिता और अन्य रिश्तेदार बदहवास हालत में अस्पताल और आश्रमशाला पहुंचे। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है। उनका सीधा आरोप है कि अगर स्कूल प्रशासन ने समय रहते उनकी बेटी की तबियत पर ध्यान दिया होता और तुरंत अस्पताल पहुंचाया होता, तो शायद आज उनकी बच्ची जिंदा होती।
परिजनों और स्थानीय नागरिकों ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच की मांग की है। उनका कहना है कि सरकारी और अनुदानित आश्रमशालाओं में पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा और स्वास्थ्य भगवान भरोसे चल रहा है, जिसकी कीमत अक्सर मासूमों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है।
प्रशासन हरकत में: सात दिन में मांगी गई जांच रिपोर्ट
मामले के तूल पकड़ने और सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर पर आक्रोश फैलने के बाद जिला प्रशासन और संबंधित आदिवासी विकास विभाग तुरंत एक्शन मोड में आ गया है। घटना की गूंज प्रशासनिक गलियारों तक पहुंचने के बाद एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन कर दिया गया है।
प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस मामले में किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। गठित की गई समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वे घटना के हर एक पहलू की बारीकी से जांच करें—चाहे वह हॉस्टल का मेस का खाना हो, पीने का पानी हो, या फिर तबीयत बिगड़ने के बाद बरती गई कथित लापरवाही हो। समिति को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि वे आगामी सात दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपें, जिसके आधार पर आगे की कानूनी और विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
आश्रम स्कूलों की व्यवस्था पर उठ रहे बड़े सवाल
इस दुखद घटना ने एक बार फिर से राज्यभर के आदिवासी आश्रमशालार्ओं और आवासीय विद्यालयों में मिलने वाली सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आए दिन ऐसे मामले सामने आते हैं जहां बच्चों की सेहत के साथ खिलवाड़ होता है या फिर देखरेख में कमी पाई जाती है।
- आश्रम स्कूलों की व्यवस्था को लेकर मुख्य बिंदु:
- मेडिकल स्टाफ की कमी: अधिकांश ग्रामीण और आदिवासी आश्रम स्कूलों में पूर्णकालिक डॉक्टर या नर्स की तैनाती नहीं होती है।
- समय पर सूचना का अभाव: बच्चों की तबीयत खराब होने पर अक्सर परिजनों और उच्च अधिकारियों को देरी से सूचना दी जाती है।
- गुणवत्तापूर्ण भोजन और पानी: कई बार हॉस्टल में मिलने वाले भोजन और पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल उठते हैं, जिससे बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है।
आगे की कार्रवाई पर टिकी सबकी निगाहें
फिलहाल, अमरावती पुलिस और प्रशासन मामले की तफ्तीश में जुटा हुआ है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही मौत के असली कारणों (किन परिस्थितियों में और किस बीमारी या कारण से जान गई) का आधिकारिक खुलासा हो सकेगा। लेकिन इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर अभी भी जमीनी स्तर पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। सात दिन बाद आने वाली जांच रिपोर्ट में क्या खुलासे होते हैं और प्रशासन दोषियों पर क्या कार्रवाई करता है, इस पर पूरे जिले की निगाहें टिकी हुई हैं।