धापेवाड़ा सिंचाई परियोजना के अंतिम छोर पर बसे गांवों में पानी की भारी किल्लत, किसानों ने दी आंदोलन की चेतावनी
महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के तिरोड़ा क्षेत्र में धापेवाड़ा सिंचाई परियोजना के चरण-1 के अंतिम छोर पर बसे गांवों के किसानों के सामने गंभीर जल संकट खड़ा हो गया है। परियोजना का पानी समय पर और पर्याप्त मात्रा में न मिलने के कारण चांदोरी बुजुर्ग, सोनोली, बिरोली और घाटकुरोडा गांवों में धान की लहलहाती फसलें सूखने लगी हैं। शुरुआती दौर में अत्यधिक बारिश के कारण मार झेलने वाले अन्नदाताओं को अब सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे उनकी पूरे साल की मेहनत पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
प्रशासनिक उदासीनता और अव्यवस्थित वितरण का आरोप
क्षेत्र के किसानों का आरोप है कि धापेवाड़ा सिंचाई परियोजना के अधिकारियों की उदासीनता और लचर प्रशासनिक नियोजन के कारण हजारों एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि में सिंचाई का संकट पैदा हुआ है। परियोजना के नियमों के तहत अंतिम छोर तक के गांवों को जलापूर्ति सुनिश्चित की जानी चाहिए, लेकिन वर्तमान में ऐसा नहीं हो रहा है। फसल को जिस नाजुक समय में सबसे ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है, उस दौरान नहरों और जलापूर्ति प्रणालियों में पानी नहीं छोड़ा जा रहा है। किसानों का कहना है कि वे लगातार परियोजना कार्यालय के चक्कर काटकर थक चुके हैं, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिलता।
खेती की बढ़ती लागत और टैंकर से सिंचाई की मजबूरी
सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध न होने के कारण किसानों को अपनी जेब से भारी रकम खर्च कर निजी पानी के टैंकर मंगवाने पड़ रहे हैं। इससे खेती की लागत बेतहाशा बढ़ गई है। पहले से ही रासायनिक खादों की बढ़ती कीमतों, धान के उचित बाजार भाव न मिलने और प्राकृतिक आपदाओं के कारण आर्थिक तंगी झेल रहे किसानों के लिए यह स्थिति दोहरी मार साबित हो रही है। किसानों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो उत्पादन से होने वाली आय पूरी तरह समाप्त हो जाएगी और वे कर्ज के दलदल में फंस जाएंगे।
किसानों का दर्द और प्रशासनिक लापरवाही
क्षेत्र के किसान गुड्डू सोनवने ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि उनके पास 10 एकड़ कृषि भूमि है, लेकिन पानी की कमी के कारण वे केवल एक एकड़ में ही टैंकर के पानी से सिंचाई कर पाए हैं। उनकी 5 से 6 एकड़ धान की फसल पूरी तरह सूख चुकी है। उन्होंने कहा कि परियोजना के अधिकारी पानी के बिल की वसूली के लिए तो लगातार तकादा करते हैं, परंतु समय पर पानी उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रहे हैं। उन्होंने मांग की है कि इस बड़े नुकसान की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी परियोजना के अधिकारियों को लेनी चाहिए।
एक अन्य प्रभावित किसान रितिक ठाकरे ने बताया कि परियोजना कार्यालय में चार में से फिलहाल केवल दो मोटरें ही चालू हालत में हैं, जिसके कारण पानी बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा है। वर्तमान में पानी केवल सरांडी तक ही पहुंच पाया है। नहर के अंतिम छोर पर स्थित होने के कारण उनके गांवों तक पानी पहुंचेगा या नहीं, इसकी कोई निश्चितता नहीं है। उनकी खुद की साढ़े तीन एकड़ धान की फसल पानी के अभाव में पूरी तरह बर्बाद हो गई है। किसानों के बीच पानी को लेकर अब आपसी विवाद की स्थिति भी बनने लगी है।
किसानों की प्रमुख मांगें और आंदोलन की चेतावनी
प्रभावित किसानों ने एकजुट होकर चेतावनी दी है कि यदि धापेवाड़ा सिंचाई परियोजना के अधिकारियों ने तुरंत हस्तक्षेप कर क्षेत्र में नियमित जलापूर्ति बहाल नहीं की और फसल नुकसान का उचित मुआवजा नहीं दिया, तो वे मजबूरन तीव्र आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे। किसानों ने मांग की है कि नहर प्रणाली को दुरुस्त किया जाए ताकि चरण-1 के अंतिम छोर के गांवों तक भी बिना किसी बाधा के पानी पहुंच सके।