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चुनाव आयोग में आंतरिक कलह पर सियासत गरमाई, संजय राउत ने की CEC पर कार्रवाई की मांग

चुनाव आयोग में आंतरिक कलह पर सियासत गरमाई, संजय राउत ने की CEC पर कार्रवाई की मांग

भारतीय लोकतंत्र के सबसे मजबूत और स्वायत्त स्तंभ माने जाने वाले निर्वाचन आयोग के गलियारों से एक ऐसी खबर बाहर आई है, जिसने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच कार्यप्रणाली को लेकर मतभेद की खबरों ने तूल पकड़ लिया है। पिछले 10 महीनों के भीतर आयोग के भीतर हुए फैसलों पर लिखित आपत्तियों का यह मामला सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने सरकार और चुनाव आयोग के शीर्ष नेतृत्व पर तीखे हमले शुरू कर दिए हैं। महाराष्ट्र के सियासी गलियारों में इसे लेकर हलचल सबसे ज्यादा तेज है, जहां महाविकास आघाडी के नेताओं ने खुलकर मोर्चा खोल दिया है।

दस महीने और चौदह आपत्तियां: क्या है अंदरखाने की कहानी?

मीडिया में आई एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। निर्वाचन आयोग के दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में आयोग द्वारा लिए गए विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी असहमति और आपत्तियां दर्ज कराई हैं। यह अपने आप में एक असाधारण घटना है, क्योंकि अमूमन संवैधानिक संस्थाओं के भीतर इस तरह के नीतिगत मतभेद सार्वजनिक नहीं होते हैं।

सामने आई जानकारी के मुताबिक, इन आपत्तियों का दायरा काफी व्यापक है। इनमें मुख्य रूप से मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, फॉर्म-6 में किए गए बदलाव, मतदाता सूचियों से नाम हटाने की प्रक्रिया और संवेदनशील चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। एक ही दिन में चार-चार आपत्तियां दर्ज किए जाने की बात भी सामने आई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि आयोग के भीतर आम सहमति बनाने में किस तरह की प्रशासनिक चुनौतियां आ रही थीं।

संजय राउत और उद्धव ठाकरे का आक्रामक रुख

इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के बाद शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सांसद संजय राउत ने केंद्र सरकार और मुख्य चुनाव आयुक्त पर बेहद तीखा हमला बोला है। राउत ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को सीधे तौर पर इस विवाद के घेरे में लेते हुए उन्हें मंत्रिमंडल से हटाने तक की मांग कर डाली है। इसके साथ ही, उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निलंबन और कानूनी कार्रवाई शुरू करने की भी मांग की है। राउत का आरोप है कि चुनाव आयोग के फैसलों पर राजनीतिक प्रभाव काम कर रहा है, हालांकि इन गंभीर राजनीतिक आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं की गई है।

इसी कड़ी में पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी इस पूरे प्रकरण पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। ठाकरे ने कहा कि चुनाव प्रणाली की पारदर्शिता पर अब गंभीर सवालिया निशान लग चुके हैं। उन्होंने मांग की है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता के भरोसे को बहाल रखने के लिए भविष्य के सभी चुनाव दोबारा से बैलट पेपर (मतपत्र) के जरिए ही कराए जाने चाहिए। ठाकरे ने भी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाने की वकालत की है।

सुप्रिया सुले ने की सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की मांग

विपक्ष की ओर से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले ने इस पूरे मामले को बेहद संवेदनशील और चिंताजनक करार दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार से तुरंत प्रभाव से एक सर्वदलीय बैठक बुलाए जाने की मांग की है। सुले का तर्क है कि यह मामला सीधे तौर पर देश के हर नागरिक के मूल मतदान अधिकार से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की हीला-हवाली बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए।

सुप्रिया सुले ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जब चुनाव आयोग के भीतर काम करने वाले शीर्ष अधिकारी ही आंतरिक प्रक्रियाओं और फैसलों पर सवाल उठाने लगे हैं, तो यह स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए सभी राजनीतिक दलों को एक मंच पर आकर इस पर व्यापक चर्चा करनी चाहिए। साथ ही, उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त से अपनी नैतिक जवाबदेही तय करने की भी बात कही है।

आयोग का पक्ष और SIR से जुड़े फैसले

एक तरफ जहां विपक्षी दल इस रिपोर्ट के आधार पर हमलावर हैं, वहीं दूसरी तरफ निर्वाचन आयोग के सूत्रों का कहना है कि तमाम अहम फैसले पूरी प्रक्रिया का पालन करते हुए और आपसी सहमति के आधार पर ही लिए गए हैं। आयोग से जुड़े जानकारों का यह भी दावा है कि SIR (सिस्टमैटिक रिफॉर्म्स) से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले सभी संबंधित पक्षों की मंजूरी के बाद ही लागू किए गए थे। हालांकि, लिखित आपत्तियों के सार्वजनिक होने से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर जनता के मन में उठ रहे सवालों का जवाब देना अब आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

लोकतंत्र की साख पर मंडराते सवाल

भारत का चुनाव आयोग दुनिया भर में अपनी निष्पक्षता और विशाल चुनावी आयोजनों के कुशल प्रबंधन के लिए जाना जाता है। ऐसे में, संस्था के भीतर से ही इस तरह के नीतिगत मतभेदों का बाहर आना भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में एक दुर्लभ घटना है। चुनाव सुधारों और मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता पर जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि इस विवाद का पारदर्शी समाधान निकाला जाए।

आने वाले दिनों में यह राजनीतिक बहस और अधिक तूल पकड़ सकती है, क्योंकि विपक्षी दल इस मुद्दे को संसद से लेकर सड़क तक उठाने की पूरी तैयारी में हैं। क्या सरकार इस मामले में विपक्ष की मांग के अनुसार कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण देगी या फिर सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी? इन तमाम सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिल सकेंगे, लेकिन फिलहाल इस हाई-प्रोफाइल विवाद ने देश की राजनीति का पारा जरूर चढ़ा दिया है।

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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