हिमालय की गोद में बसे पड़ोसी देश नेपाल इन दिनों कुदरत के एक बेहद भयानक और डरावने तांडव से गुजर रहा है। देश के विभिन्न हिस्सों में हाल ही में आई अचानक बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड (Flash Flood) ने ऐसा हाहाकार मचाया है कि चारों तरफ सिर्फ तबाही और बर्बादी के निशान ही दिखाई दे रहे हैं। भोटे कोशी और त्रिशूली कॉरिडोर के आसपास का इलाका मानो किसी युद्धक्षेत्र में तब्दील हो चुका है, जहां पानी के तेज बहाव ने बस्तियों की बस्तियां और जिंदगियों को अपनी आगोश में ले लिया है।
त्रासदी का भयावह आंकड़ा: 469 लोगों की मौत
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इस हृदयविदारक प्राकृतिक आपदा में मरने वालों की संख्या तेजी से बढ़कर 469 तक जा पहुंची है। नेपाल पुलिस और राहत एजेंसियों द्वारा दी गई ताजा जानकारी के अनुसार, इस आपदा में अब तक 1,545 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है, जो मौत के मुंह से वापस लौटे हैं। हालांकि, संकट अभी टला नहीं है। आपदा प्रबंधन अधिकारियों का अनुमान है कि अभी भी लगभग 1,000 लोग लापता हैं, जिनकी तलाश में सुरक्षा बलों की सांसें अटकी हुई हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस बचाव अभियान के दौरान सुरक्षा में जुटे 28 पुलिसकर्मी भी लापता बताए जा रहे हैं, जो इस त्रासदी की भीषणता को बयां करता है।
भारत और चीन समेत कई देशों के मदद प्रस्ताव को नेपाल ने ठुकराया
इस संकट की घड़ी में इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए भारत समेत दुनिया के कई ताकतवर देश नेपाल की मदद के लिए आगे आए थे। भारत की राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ (NDRF) की टीमों के अलावा चीन, अमेरिका, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों ने भी अपनी विशेष रेस्क्यू टीमों और राहत सामग्री को नेपाल भेजने की पेशकश की थी।
लेकिन इन तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रस्तावों के बीच नेपाल सरकार ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। नेपाल ने स्पष्ट शब्दों में इन सभी देशों की मदद को विनम्रता के साथ अस्वीकार कर दिया है। नेपाल का कहना है कि उसे इस वक्त किसी भी विदेशी रेस्क्यू टीम की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसकी अपनी सेना और सुरक्षा एजेंसियां इस आपदा से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार हैं।
विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट की स्थिति
शुक्रवार को नेपाल के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता लोक बहादुर छेत्री ने मीडिया के सामने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा, 'विभिन्न मित्र देशों द्वारा मदद की पेशकश किया जाना बेहद स्वाभाविक है और हम उनके प्रति आभारी हैं। हमारी अपनी सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां पूरी मुस्तैदी के साथ युद्धस्तर पर खोज और बचाव अभियान चला रही हैं। फिलहाल हमारे पास पर्याप्त संसाधन और बल हैं, इसलिए हमें किसी भी बाहरी या विदेशी मदद की कोई जरूरत महसूस नहीं हो रही है।'
स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स और द काठमांडू पोस्ट में छपी जानकारियों के अनुसार, विदेश मंत्रालय के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी ने भी इस बात की पुष्टि की है कि उन्हें भारत और चीन के साथ-साथ अन्य पश्चिमी और एशियाई देशों से भी सहायता के लिए आधिकारिक अनुरोध प्राप्त हुए थे, जिन्हें कूटनीतिक रूप से और पूरी विनम्रता के साथ अस्वीकार करना पड़ा।
2015 के कड़वे अनुभवों से लिया गया सबक
आखिर नेपाल ने ऐसा कदम क्यों उठाया? इसके पीछे का मुख्य कारण साल 2015 में आए उस विनाशकारी भूकंप की यादें हैं, जो आज भी नेपाल के लोगों के जेहन में ताजा हैं। उस वक्त नेपाल में आई आपदा के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंची कई रेस्क्यू टीमों और विदेशी पोर्टलों के समन्वय में नेपाल सरकार को कई तरह की प्रशासनिक और रणनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था।
विश्लेषकों का मानना है कि उसी कड़वे अनुभव से सीख लेते हुए इस बार नेपाली हुक्मरानों ने विदेशी दखल या बाहरी टीमों की भीड़भाड़ से बचने का फैसला किया है। सरकार का यह सोचना है कि स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों, नदी के बहाव और दुर्गम पहाड़ी रास्तों से नेपाल के अपने सुरक्षा बल जितना बेहतर तरीके से वाकिफ हैं, उतना कोई बाहरी दल नहीं हो सकता।
युद्धस्तर पर जारी है रेस्क्यू ऑपरेशन
फिलहाल, नेपाल की तीनों सेनाएं (नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल) अपनी पूरी ताकत के साथ ग्राउंड जीरो पर डटी हुई हैं। मलबे में दबे लोगों को बाहर निकालने, उफनती नदियों में बहे लोगों की तलाश करने और घायलों को तुरंत एयरलिफ्ट करके अस्पतालों तक पहुंचाने का काम लगातार जारी है। मौसम की दुश्वारियों के बावजूद राहतकर्मी हर उस जगह पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जहां इंसान के जीवित बचे होने की थोड़ी सी भी उम्मीद बाकी है।
भले ही नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय रेस्क्यू टीमों को अपने यहां आने की हरी झंडी नहीं दी हो, लेकिन इस आपदा की घड़ी में पूरा दक्षिण एशिया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय नेपाल के साथ पूरी सहानुभूति के साथ खड़ा है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या नेपाल अपने घरेलू संसाधनों के बूते इस विकट स्थिति से पूरी तरह उबर पाता है या नहीं।
