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ड्रैगन-हाथी के खेल में सिर्फ सरहद नहीं, बहुत कुछ दांव पर है!

ड्रैगन-हाथी के खेल में सिर्फ सरहद नहीं, बहुत कुछ दांव पर है!

कूटनीतिक गलियारों में इन दिनों एक बार फिर भारत और चीन के रिश्तों की गर्माहट और ठंडेपन दोनों की चर्चा जोरों पर है। हाल ही में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने बीजिंग का दौरा किया और अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष प्रतिनिधियों (Special Representative) की 25वीं बैठक में हिस्सा लिया। साल 2020 की गलवान घाटी की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद से दोनों देशों के बीच जो कूटनीतिक बर्फ जमी थी, वह धीरे-धीरे पिघल तो रही है, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया के पीछे की कहानी सिर्फ जमीन के टुकड़ों या सरहद की सुरक्षा तक सीमित नहीं है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और चीन का यह रिश्ता एक ऐसे पक्के चौराहे पर खड़ा है, जहां हर एक कदम के कई गहरे मायने निकाले जा रहे हैं। आइए गहराई से समझते हैं कि आखिर बीजिंग की रणनीतिक बिसात पर ड्रैगन की असल चाल क्या है और इस पूरी कूटनीति के पीछे की सियासत क्या कहती है।

पाँच साल की खामोशी और मुलाकातों का नया दौर

अगर इतिहास के पन्नों को पलटें तो साल 2003 से ही यह विशेष प्रतिनिधि तंत्र (Special Representative Mechanism) दोनों देशों के बीच सीमा से जुड़े सवालों को हल करने और शांति बनाए रखने का सबसे बड़ा जरिया रहा है। हालांकि, 2020 के तनाव के बाद यह संवाद लगभग पाँच वर्षों तक ठप पड़ा रहा।

इस खामोशी को तोड़ने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की अक्टूबर 2024 में कजान (रूस) में हुई द्विपक्षीय मुलाकात ने अहम भूमिका निभाई। इसके बाद से मुलाकातों का सिलसिला तेजी से आगे बढ़ा:

  • दिसंबर 2024: बीजिंग में 23वें दौर की बैठक हुई, जो पाँच साल में पहली थी।
  • अगस्त 2025: नई दिल्ली में 24वीं बैठक के दौरान सीमा प्रबंधन को प्रभावी बनाने और पूर्वी व मध्य सेक्टरों में जनरल-लेवल के मैकेनिज्म तैयार करने पर आम सहमति बनी।
  • अगस्त 2026: हाल ही में संपन्न हुई 25वीं बैठक ने इसी गति को आगे बढ़ाने का काम किया, जिसमें सीमा के साथ-साथ द्विपक्षीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी खुलकर चर्चा हुई।

समय का खेल: जब अरुणाचल प्रदेश और जापान से बढ़ी तल्खी

अजीत डोभाल की इस बीजिंग यात्रा की टाइमिंग ने रणनीतिक विश्लेषकों का सबसे ज्यादा ध्यान खींचा है। एक तरफ जहाँ बातचीत की मेज पर सौहार्द दिखाने की कोशिश हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर तनाव के नए बादल मंडरा रहे थे।

बैठक से कुछ ही हफ्ते पहले, पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के इलाकों के नामों को लेकर दोनों देशों में फिर ठन गई। भारत ने सर्वे ऑफ इंडिया के आधिकारिक नक्शों में अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों के मानक नाम तय किए। जवाब में चीन, जो इस पूरे इलाके को "दक्षिण तिब्बत" के रूप में देखता है, बुरी तरह भड़क गया और उसने इस कदम को "अवैध और अमान्य" करार दिया। बीजिंग अपनी हरकतों से बाज आते हुए अप्रैल 2026 में भी एक बार फिर क्षेत्रों के नाम बदलने की नाकाम कोशिश कर चुका है।

इतना ही नहीं, चीन की त्यौरियां तब और चढ़ गईं जब भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और जापानी रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी के बीच समुद्री सुरक्षा सहयोग (Maritime Security) को लेकर एक अहम समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में दोनों देशों ने क्षेत्र में बल प्रयोग या जबरदस्ती से यथास्थिति बदलने की किसी भी कोशिश का पुरजोर विरोध किया। जापान के साथ ड्रैगन के खराब होते रिश्तों के बीच भारत का यह कदम बीजिंग को बिल्कुल रास नहीं आया और वहां की मीडिया ने इसे भारत की "दोहरी नीति" करार दिया।

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और 'ग्लोबल साउथ' का समीकरण

इन तमाम मतभेदों के बावजूद, चीनी रणनीतिकार इस बात को बहुत अच्छे से समझते हैं कि डोभाल-वांग यी की यह बैठक आने वाले दिनों के लिए कितनी अहम है। सितंबर 2026 में भारत की मेजबानी में होने वाले ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन से ठीक पहले इस मुलाकात के बहुत गहरे मायने हैं। भारत इस साल ब्रिक्स की रोटेटिंग अध्यक्षता संभाल रहा है और इसके बाद साल 2027 के लिए कमान चीन को सौंपेगा।

यही वजह है कि बीजिंग में हुई इस चर्चा का असर सीधे तौर पर अगले दो वर्षों तक ब्रिक्स के कामकाज की गति पर पड़ने वाला है। मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में, खासकर जब अमेरिकी प्रशासन रूस और ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने पर विचार कर रहा है, वैसी स्थिति में चीन और भारत के बीच किसी भी तरह का मनमुटाव 'ग्लोबल साउथ की एकजुटता' के संदेश को कमजोर कर सकता है।

आर्थिक मोर्चे पर राहत और ड्रैगन की 'थ्री नो पॉलिसी'

चीनी इंटरनेट और मीडिया में इस बैठक को लेकर एक मिली-जुली और सतर्क रूप से सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। भारत की ओर से उठाए गए कई कदमों की वहां सराहना की गई, जैसे:

  • कैलाश-मानसरोवर यात्रा की फिर से शुरुआत।
  • तीन पारंपरिक सीमा व्यापार बंदरगाहों को दोबारा खोलना।
  • सांस्कृतिक और क्रॉस-बॉर्डर आदान-प्रदान को बढ़ावा।
  • प्रत्येक उड़ानों (Direct Flights) की बहाली और चीनी कंपनियों पर निवेश प्रतिबंधों में ढील देना।

हालाँकि, आधिकारिक बयानों में चीन ने अपनी पुरानी चाल चलते हुए एक बार फिर सीमा विवाद को द्विपक्षीय संबंधों में "उचित स्थान" पर रखने की अपनी मांग दोहराई और "ड्रैगन और हाथी का एक साथ नृत्य" करने जैसे मुहावरों के जरिए अपनी नरम कूटनीति (Charm Offensive) का प्रदर्शन भी किया।

दूसरी ओर, आंतरिक चर्चाओं में वांग यी द्वारा दिए गए "थ्री नो पॉलिसी" (Three No's) यानी— कोई ठहराव नहीं, कोई पीछे हटना नहीं, और कोई भटकाव नहीं —की काफी चर्चा रही। चीनी मीडिया के अनुसार, इसका सीधा मतलब यह है कि बीजिंग ने अपनी लाल रेखाएँ (Red Lines) खींच दी हैं ताकि स्थानीय मुद्दों के चलते द्विपक्षीय संबंधों की सकारात्मक गति और आपसी भरोसे को नुकसान न पहुँचे।

असली मकसद: बातचीत का चैनल खुला रखना

चीनी विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि एनएसए डोभाल की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य सिर्फ "सीमा समझौते" तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका असली मकसद दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संचार माध्यमों (High-level communication channels) को दोबारा खोलना और उन्हें मजबूत करना था।

यह बैठक आने वाले दिनों में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के संभावित भारत दौरे (जो सात साल बाद हो सकता है) की एक मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करती है। चीन का आकलन है कि जब तक यह उच्च स्तरीय संपर्क मार्ग खुला रहेगा, सीमा पर तनाव बढ़ने की आशंका कम रहेगी। साथ ही, यह अमेरिका को क्वाड (Quad) और इंडो-पैसिफिक रणनीति के जरिए दक्षिण एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने और चीन पर दबाव बनाने के मौकों को भी सीमित करता है।

निष्कर्ष: जो भारतीय नागरिक या विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि विशेष प्रतिनिधियों की इन बैठकों से सीमा विवाद का कोई रातों-रात स्थायी समाधान निकल आएगा, उन्हें चीनी जनमानस और रणनीतिक सोच की गहराई को समझना होगा। सीमा विवाद भले ही इस खेल का एक हिस्सा हो, लेकिन चीन के लिए यह पूरा ताना-बाना वैश्विक कूटनीति और वर्चस्व की एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा है।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

Content Writer (देश खबरें)

अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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