पंद्रह अगस्त 1947 को जब पूरा देश ब्रिटिश राज की गुलामी की जंजीरों को तोड़कर आजादी का जश्न मना रहा था, तब भारत के नक्शे के बीचों-बीच स्थित हैदराबाद रियासत में एक अलग ही सुगबुगाहट चल रही थी। भौगोलिक रूप से देश के दिल में बसने वाला यह भूभाग एक स्वतंत्र और संप्रभु देश बनने के सपने देख रहा था। इस रियासत के निजाम मीर उस्मान अली खान अपनी रियासत को न तो भारत में मिलाना चाहते थे और न ही पाकिस्तान में। लेकिन, एक राष्ट्र के रूप में खड़े हो रहे नए भारत के लिए यह स्थिति रणनीतिक और भौगोलिक रूप से कतई स्वीकार्य नहीं थी। देश की अखंडता के सामने खड़े इस सबसे बड़े संकट को टालने के लिए आखिरकार भारत सरकार और देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को एक कड़ा फैसला लेना पड़ा। इसी फैसले का परिणाम था 'ऑपरेशन पोलो', जो भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अभियानों में शुमार है।
आखिर क्या था हैदराबाद का वह पेंच, जिसने बढ़ा दी थी केंद्र की चिंताएं?
वर्ष 1947 के मध्य में जब ब्रिटिश हुकूमत ने भारत छोड़ने का ऐलान किया, तब देश में 500 से अधिक रियासतें थीं। अंग्रेजों ने इन सभी रियासतुलों के सामने यह विकल्प रखा था कि वे चाहें तो भारत में शामिल हों, पाकिस्तान का हिस्सा बनें या फिर स्वतंत्र रहें। देश के अधिकांश राजा-महाराजाओं और नवाबों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए भारत या पाकिस्तान के साथ जाने का फैसला किया। हालांकि, कुछ रियासतें ऐसी थीं जिन्होंने अपनी जिद और महत्वाकांक्षाओं के चलते भारत की एकता के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दीं।
इनमें जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद सबसे प्रमुख थीं। हैदराबाद इन सभी में सबसे बड़ी और सबसे अमीर रियासत थी। यहां के निजाम मीर उस्मान अली खान दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में गिने जाते थे। उनकी अपनी सेना थी, अपना मुद्रा चलन था, और उनका झुकाव पाकिस्तान की तरफ अधिक था। हैदराबाद की बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी, लेकिन शासन पूरी तरह से मुस्लिम निजाम और उनके चुनिंदा सलाहकारों के हाथ में था। निजाम ने भारत सरकार के साथ 'स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट' यानी यथास्थिति समझौता किया था, लेकिन वे अंदर ही अपनी सैन्य ताकत मजबूत करने में जुटे हुए थे।
रजाकारों का आतंक और बढ़ती हिंसा
निजाम के शासनकाल में कासिम रिजवी के नेतृत्व में 'रजाकार' नाम का एक कट्टरपंथी अर्धसैनिक संगठन सक्रिय हो गया था। ये रजाकार हैदराबाद रियासत में रहने वाली हिंदू जनता पर तरह-तरह के अत्याचार कर रहे थे। गांवों के गांव जलाए जा रहे थे, महिलाओं के साथ हिंसा हो रही थी और जो भी व्यक्ति भारत में विलय की बात करता था, उसे बेरहमी से कुचल दिया जाता था।
इस अराजकता और हिंसा के कारण हैदराबाद से बड़ी संख्या में शरणार्थी भागकर भारतीय सीमा के भीतर आने लगे थे। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी थी कि दक्षिण भारत के इस हिस्से में एक नया पाकिस्तान बनने का खतरा मंडराने लगा था। ऐसे में, भारत सरकार हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती थी। सरदार वल्लभभाई पटेल और देश के शीर्ष नेतृत्व ने महसूस किया कि कूटनीतिक वार्ताओं का दौर अब समाप्त हो चुका है और अब कड़े कदम उठाने का समय आ गया है।
'ऑपरेशन पोलो' नाम क्यों पड़ा?
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि इस सैन्य अभियान का नाम 'ऑपरेशन पोलो' क्यों रखा गया था? क्या इसका संबंध खेल से है? इतिहासकार इसके पीछे एक बहुत ही दिलचस्प और रणनीतिक कारण बताते हैं।
- पोलो के मैदानों की बहुतायत: हैदराबाद रियासत में दुनिया भर में सबसे ज्यादा पोलो खेलने के मैदान (Polo Grounds) हुआ करते थे। निजाम और वहां के अमीरों को इस खेल का बहुत शौक था।
- कूटनीतिक और खुफिया कोड: जब भारतीय सेना और सरकार इस अभियान की रूपरेखा तैयार कर रही थी, तब इसे पूरी तरह गोपनीय रखा गया था। अभियान के कोडनेम के रूप में 'पोलो' शब्द का चयन किया गया, क्योंकि रियासत में पोलो मैदानों की भरमार थी।
- कार्रवाई की अवधि: इस अभियान को आधिकारिक तौर पर 'पुलिस एक्शन' का नाम दिया गया था, ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे युद्ध की बजाय आंतरिक कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई के रूप में पेश किया जा सके।
मेजर जनरल जे.एन. चौधरी के नेतृत्व में हुई कार्रवाई
सितंबर 1948 का महीना भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो चुका है। 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने सरदार पटेल के आदेश पर चौतरफा हमला बोल दिया। इस सैन्य अभियान का नेतृत्व मेजर जनरल जे.एन. चौधरी ने किया था। थल सेना के साथ-साथ वायु सेना ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई।
निजाम की सेना और रजाकार इस तीव्र और सुनियोजित हमले के आगे टिक नहीं सके। भारतीय सेना ने विभिन्न मोर्चों से हैदराबाद में प्रवेश किया और महज 108 घंटों (यानी लगभग पांच दिनों) के भीतर ही रियासत की रक्षापंक्ति को ध्वस्त कर दिया। 17 सितंबर 1948 को निजाम की सेना ने पूरी तरह आत्मसमर्पण कर दिया।
ऑपरेशन पोलो का असर और ऐतिहासिक परिणाम
इस सैन्य कार्रवाई के तुरंत बाद निजाम मीर उस्मान अली खान ने अपनी हार स्वीकार कर ली और रेडियो पर प्रसारण के जरिए हैदराबाद के भारत में औपचारिक विलय का ऐलान किया। इसके साथ ही, भारत के नक्शे को एक मुकम्मल और अखंड स्वरूप मिल गया।
विलय के बाद निजाम को रियासत का 'राजप्रमुख' (Governor equivalent) बनाया गया और उनके सम्मान की रक्षा की गई। हालांकि, रजाकारों के प्रमुख कासिम रिजवी को गिरफ्तार कर लिया गया और बाद में उन्हें पाकिस्तान जाने की अनुमति दे दी गई।
निष्कर्ष
ऑपरेशन पोलो केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि यह उस मजबूत इच्छाशक्ति का प्रतीक था जिसके बल पर सरदार वल्लभभाई पटेल ने बिखरे हुए भारत को एक सूत्र में पिरोया। यदि उस समय यह सख्त कदम न उठाया जाता, तो आज भारत का नक्शा कुछ और ही होता। आज जब भी देश की संप्रभुता और अखंडता की बात होती है, 1948 के उस सितंबर महीने और ऑपरेशन पोलो की यादें हर भारतीय के मन में गर्व का भाव जगा देती हैं।