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काम के बोझ की आड़ नहीं ले सकते: रिमांड में मजिस्ट्रेट की लापरवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

काम के बोझ की आड़ नहीं ले सकते: रिमांड में मजिस्ट्रेट की लापरवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिमांड अर्जियों की उचित जांच किए बिना आरोपियों को हिरासत में भेजने पर जताई गंभीर चिंता, JTRI को दिए निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिमांड अर्जियों की बिना उचित जांच किए आरोपियों को नियमित रूप से पुलिस या न्यायिक हिरासत में भेजने की बढ़ती घटनाओं पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने ज्यूडिशियल ट्रेनिंग एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट (JTRI) लखनऊ को मजिस्ट्रेटों के लिए एक विशेष प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार करने और इसे जल्द-से-जल्द उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मजिस्ट्रेट रिमांड की कार्यवाही के दौरान अत्यधिक काम के बोझ का हवाला देकर अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते, क्योंकि ऐसे मामलों का सीधा संबंध नागरिकों के मौलिक अधिकारों से है।

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने चेतावनी दी है कि भविष्य में मजिस्ट्रेटों की ओर से कर्तव्य की ऐसी किसी भी उपेक्षा को उच्च न्यायालय बेहद गंभीरता से लेगा। जरूरत पड़ने पर ऐसे मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई की संस्तुति भी की जा सकती है। अदालत ने यह सख्त रुख अरविंद पांडेय और एक अन्य व्यक्ति की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई के दौरान अपनाया, जिसमें साइबर धोखाधड़ी के एक मामले में अरविंद पांडेय की हिरासत को चुनौती दी गई थी।

कुशीनगर के जिला जज से मांगा गया था स्पष्टीकरण

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पहले कुशीनगर के जिला जज से स्पष्टीकरण तलब किया था कि गिरफ्तारी मेमो में गंभीर कमियां होने के बावजूद आरोपी को रिमांड पर कैसे भेज दिया गया। आगामी 3 अक्टूबर, 2026 को दिए गए अपने स्पष्टीकरण में संबंधित मजिस्ट्रेट ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए अदालत से माफी मांगी थी। उन्होंने तर्क दिया था कि न्यायिक कार्य, विशेषकर जमानत अर्जियों के अत्यधिक दबाव के कारण वे पुलिस की रिमांड अर्जी की आवश्यक सतर्कता के साथ जांच नहीं कर सके।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस स्पष्टीकरण को सिरे से खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि रिमांड से जुड़ा दायित्व अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है, जिसका सीधा संबंध संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के अंतर्गत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों से है।

'रिमांड देना महज औपचारिक प्रक्रिया नहीं'

खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि रिमांड के मामले भी न्यायिक कामकाज का एक अनिवार्य हिस्सा हैं, जिनमें मजिस्ट्रेट को अपने स्वतंत्र विवेक का इस्तेमाल करना होता है। यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों, तो किसी विशेष मामले में रिमांड देने से इनकार भी किया जा सकता है और आवश्यक होने पर आरोपी को निजी मुचलके पर रिहा करने का विकल्प भी खुला रहता है।

अदालत ने कहा कि संबंधित मजिस्ट्रेट ने पुलिस की रिमांड अर्जी को केवल एक औपचारिकता मानकर सतही तरीके से आगे बढ़ा दिया। यदि उन्होंने कानून के मुताबिक उचित सतर्कता बरती होती, तो इस मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने की नौबत ही नहीं आती। बेंच ने यह भी रेखांकित किया कि मजिस्ट्रेट की यह चूक कोई इקकात या अकेली घटना नहीं है, बल्कि कई मामलों में वे एक सतर्क प्रहरी की भूमिका निभाने में विफल रहे हैं।

गिरफ्तारी मेमो में कमियों पर पुलिस की मंशा पर सवाल

मामले के तथ्यों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का गिरफ्तारी मेमो महत्वपूर्ण विवरणों के लिहाज से गंभीर रूप से अधूरा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, आरोपी का बैंक खाता एक म्यूल अकाउंट (Mule Account) था, जिसके जरिए सह-आरोपियों ने साइबर धोखाधड़ी से हासिल की गई अवैध धनराशि का लेनदेन किया था।

जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तारी के सटीक कारणों, जब्त सामग्री के ब्योरे, संबंधित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और आरोपी के निकटतम परिजनों के संपर्क विवरण जैसे अहम तथ्य या तो खाली छोड़ दिए गए थे या उन्हें पर्याप्त रूप से दर्ज नहीं किया गया था। अदालत ने माना कि गिरफ्तारी मेमो की ये कमियां सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य' और 'मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य' के मामलों में निर्धारित दिशा-निर्देशों के बिल्कुल विपरीत थीं।

गिरफ्तारी मेमो में बार-बार आ रही ऐसी खामियों पर गहरी चिंता जताते हुए अदालत ने आशंका जताई कि ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस कभी-कभी जानबूझकर इस तरह की त्रुटियां छोड़ती है, ताकि आरोपी इसका कानूनी लाभ उठाकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए आसानी से रिहाई का आदेश हासिल कर सके। ऐसा उन मामलों में भी हो सकता है जहां यदि गिरफ्तारी मेमो नियमों के अनुसार सही ढंग से भरा गया होता, तो शायद आरोपी को सामान्य प्रक्रिया में जमानत भी न मिलती।

तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता नंबर एक को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते किसी अन्य मामले में उनकी कानूनी हिरासत आवश्यक न हो।

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रोली सिंह

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रोली सिंह पिछले 2 सालों से पत्रकारिता और न्यूज़ रिपोर्टिंग से जुड़ी हैं। वह लोकल न्यूज़ और लोगों से जुड़े मुद्दों को पढ़ने वालों तक पहुंचाने का काम...

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