सिनेमा की दुनिया में कई ऐसे चेहरे आए जिन्होंने मुख्य अभिनेता यानी हीरो के तौर पर अपनी पारी की शुरुआत की, लेकिन इतिहास में उनके नाम के आगे 'विलेन' या खलनायक का ठप्पा हमेशा के लिए चस्पा हो गया। सिल्वर स्क्रीन पर जब भी क्रूर हंसी, आंखों में चालाकी और जुबान पर जनता को डराने वाले संवादों की बात होती है, तो एक ही नाम सबसे पहले जेहन में उभरता है - प्रेम चोपड़ा। उनका एक बेहद मशहूर संवाद आज भी बच्चे-बच्चे की जुबान पर है, जो न सिर्फ भारतीय सिनेमा का बल्कि पॉप कल्चर का भी एक अहम हिस्सा बन चुका है। लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि यह दिग्गज अभिनेता मुंबई की मायानगरी में अपनी किस्मत आजमाने हीरो बनने के इरादे से पहुंचा था।
सपनो की नगरी मुंबई और एक अनजाना सफर
हर युवा कलाकार की तरह प्रेम चोपड़ा के मन में भी सिल्वर स्क्रीन पर चमकने और मुख्य भूमिकाएं निभाने की हसरत थी। पंजाब की वादियों से निकलकर जब उन्होंने मायानगरी का रुख किया, तो रास्ते आसान बिल्कुल नहीं थे। कड़ा संघर्ष, अनगिनत ऑडिशन और भविष्य को लेकर गहरी अनिश्चितता के दौर से गुजरते हुए उन्हें सबसे पहले क्षेत्रीय सिनेमा यानी पंजाबी फिल्मों में काम करने का मौका मिला। उनकी पहली फिल्म 'चौधरी करनैल सिंह' थी, जो बॉक्स ऑफिस पर काफी सराही गई। इस फिल्म में उन्होंने मुख्य अभिनेता के तौर पर काम किया और अपने अभिनय का लोहा मनवाया। यह फिल्म उनके करियर की पहली बड़ी सीढ़ी साबित हुई, जिसने उन्हें अभिनय की दुनिया में एक ठोस पहचान दिलाई।
लेकिन तकदीर को कुछ और ही मंजूर था। पंजाबी सिनेमा में मुख्य भूमिका निभाने के बाद जब उन्होंने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री (बॉलीवुड) का रुख किया, तो यहां का माहौल बिल्कुल अलग था। उस दौर में इंडस्ट्री में पहले से ही कई स्थापित और बड़े रोमांटिक हीरो मौजूद थे। ऐसे में प्रेम चोपड़ा को मुख्य अभिनेता के रूप में वो मुकाम हासिल करने में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हालांकि, उनकी गहरी आंखें, तीखे नैन-नक्श और एक अलग ही प्रकार की संवाद अदायगी ने फिल्ममेकर्स का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। निर्देशकों ने भांप लिया कि जिस चेहरे को लोग हीरो के रूप में देखने से कतरा रहे हैं, वही चेहरा परदे पर सबसे खूंखार और असरदार विलेन बन सकता है。
जब विलेन की भूमिका ने बदल दी तकदीर
हिंदी सिनेमा में खलनायक की परिभाषा को गढ़ने में प्रेम चोपड़ा का योगदान ऐतिहासिक रहा है। उन्होंने परदे पर ऐसे कई किरदार निभाए जिन्हें दर्शकों ने नफरत के साथ-साथ भरपूर प्यार भी दिया। उनका यह मानना था कि एक बेहतरीन खलनायक के बिना हीरो की जीत का कोई मतलब नहीं रह जाता। जब तक परदे पर विलेन दमदार और खौफनाक न हो, तब तक हीरो की महानता साबित नहीं हो सकती। उन्होंने इस सोच को अपने अभिनय में उतारा और एक के बाद एक कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी खतरनाक अदाकारी से तहलका मचा दिया।
साठ और सत्तर के दशक में जब बॉलीवुड मसाला फिल्मों का दौर अपने चरम पर था, तब प्रेम चोपड़ा इंडस्ट्री के सबसे व्यस्त और महंगे खलनायकों में शुमार हो चुके थे। निर्देशक मनोज कुमार, राज कपूर और यश चोपड़ा जैसे दिग्गजों के साथ उन्होंने काम किया। 'उपकार', 'पूरब और पश्चिम', 'कटी पतंग', 'दो रास्ते', 'बॉबी' और 'क्रांति' जैसी फिल्मों में उनके किरदारों ने दर्शकों के दिलों में खौफ पैदा कर दिया था। खास तौर पर फिल्म 'बॉबी' का उनका वो डॉयलाग आज भी सिने प्रेमियों के जेहन में ताजा है, जो हर पीढ़ी के बीच लोकप्रिय है।
परदे का खूंखार खलनायक और असल जिंदगी का सज्जन इंसान
सिनेमाई परदे पर औरतों पर जुल्म ढाने वाले, गरीबों को लूटने वाले और हर तरह के गलत काम करने वाले प्रेम चोपड़ा असल जिंदगी में इसके बिल्कुल विपरीत हैं। उनके करीबी दोस्तों और इंडस्ट्री के जानकारों का हमेशा से यही कहना रहा है कि वे अपने निजी जीवन में बेहद शांत, अनुशासित और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति हैं। उन्होंने कभी भी अपने फिल्मी किरदारों को अपनी असली जिंदगी पर हावी नहीं होने दिया। यही कारण है कि निर्देशक भी उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे क्योंकि वे जानते थे कि सेट पर आते ही यह शांत इंसान कैमरे के सामने सबसे खतरनाक विलेन में बदल जाता है।
- करियर की शुरुआत: पंजाबी फिल्म 'चौधरी करनैल सिंह' से बतौर मुख्य अभिनेता।
- बदलाव: हिंदी सिनेमा में खलनायक के रूप में अपनी एक अलग और अमर पहचान बनाई।
- प्रमुख फिल्में: कटी पतंग, दो रास्ते, बॉबी, उपकार, क्रांति और शौकीन।
- विशेषता: अपनी अनूठी संवाद अदायगी और आंखों के बेहतरीन इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं।
एक युग का अंत और अभिनय का नया मानक
आज के दौर में जब सिनेमा का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है और विलेन की पारंपरिक परिभाषाएं भी अब पुरानी हो चुकी हैं, तब भी प्रेम चोपड़ा के काम का स्तर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बना हुआ है। उन्होंने जिस शिद्दत और ईमानदारी के साथ नेगेटिव रोल निभाए, उसने हिंदी सिनेमा में खलनायक के किरदार को एक नया सम्मान दिलाया। हीरो बनने की हसरत से शुरू हुआ उनका यह सफर भले ही एक विलेन की कुर्सी पर आकर रुका, लेकिन इस मुकाम ने उन्हें भारतीय सिनेमा के अमर कलाकारों की श्रेणी में ला खड़ा किया।
आज भी जब पुराने दौर के सिनेमा को याद किया जाता है, तो प्रेम चोपड़ा का नाम उन चुनिंदा कलाकारों में लिया जाता है जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर अपनी एक अलग लकीर खींची। उनका यह सफर इस बात का जीता-जागता सबूत है कि मंजिल चाहे जो भी तय की गई हो, अगर लगन सच्ची हो तो रास्ता कोई भी आपको इतिहास के पन्नों में अमर कर सकता है। प्रेम चोपड़ा ने साबित कर दिया कि परदे पर बुराई का चेहरा बनना भी कला की पराकाष्ठा है, जिसे केवल एक मंजा हुआ कलाकार ही बखूबी निभा सकता है।