सिनेमा की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल फिल्में नहीं बनाते बल्कि पर्दे पर जादू बुनते हैं। इन निर्देशकों की कार्यशैली अक्सर आम निर्देशकों से काफी अलग और बेहद कठिन होती है। ऐसे ही दो दिग्गज फिल्ममेकर्स का जिक्र करते हुए हिंदी सिनेमा के जाने-माने अभिनेता रजा मुराद ने हाल ही में कुछ ऐसे राज खोले हैं, जिन्हें सुनकर हर कोई हैरान है। रजा मुराद ने भारतीय सिनेमा के ‘शोमैन’ राज कपूर और आधुनिक दौर के ‘विजुअल जीनियस’ संजय लीला भंसाली की तुलना करते हुए दोनों को परफेक्शनिस्ट करार दिया है।
परफेक्शन की जिद और सेट का माहौल
एक हालिया इंटरव्यू में रजा मुराद ने अपने लंबे फिल्मी सफर के पन्नों को पलटते हुए उन दिनों को याद किया जब वे इन दिग्गजों के साथ काम कर रहे थे। उन्होंने बताया कि राज कपूर और संजय लीला भंसाली दोनों में एक गजब की समानता है—वह है अपने काम के प्रति दीवानगी और परफेक्शन की हद तक जाने की जिद। ये दोनों ही निर्देशक जानते हैं कि एक कलाकार से उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कैसे निकलवाना है, खासकर तब जब अभिनेता बेहद संवेदनशील (Sensitive) स्वभाव के हों।
रजा मुराद ने मुस्कुराते हुए एक पुराना किस्सा साझा किया और बताया कि कैसे इन निर्देशकों की ऊर्जा सेट पर देखने लायक होती थी। उन्होंने कहा कि सेट पर कई बार ऐसा समय आता था जब निर्देशक अपना आपा खो बैठते थे और उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता था।
सितारों पर चिल्लाने से लेकर आसमान को कोसने तक
रजा मुराद ने उस दौर को याद करते हुए कहा, 'मैंने ऐसे दिग्गजों को सेट पर तारों और आसमान की तरफ देखकर चिल्लाते हुए देखा है।' उनका यह बयान सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह गुस्सा किसी के प्रति नफरत या दुर्भावना का नहीं होता था, बल्कि यह उस रचनात्मक छटपटाहट का हिस्सा होता था जो एक बेहतरीन शॉट को पाने के लिए निर्देशक के भीतर चलती रहती है।
राज कपूर के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि राज साहब हर एक फ्रेम को लेकर बहुत ही बारीक सोच रखते थे। संगीत, लाइटिंग, कलाकारों के हाव-भाव—हर एक चीज उनके नियंत्रण में और बिल्कुल परफेक्ट होनी चाहिए थी। यदि थोड़ा सा भी कुछ मनमुताबिक न हो, तो उनका गुस्सा फूट पड़ता था, लेकिन वह गुस्सा पल भर में प्यार में भी बदल जाता था क्योंकि कलाकारों को पता होता था कि यह सब फिल्म की भलाई के लिए हो रहा है।
संजय लीला भंसाली की कार्यशैली
ठीक इसी तरह, संजय लीला भंसाली के साथ काम करने के अनुभव को साझा करते हुए रजा मुराद ने बताया कि भंसाली भी किसी से कम नहीं हैं। भंसाली के सेट पर अनुशासन और भव्यता का जो स्तर देखने को मिलता है, वह हर किसी के बस की बात नहीं है। वे कलाकारों से उनकी क्षमता से भी ज्यादा मेहनत करवाते हैं।
- कड़ी मेहनत: भंसाली अपने कलाकारों को तब तक रिहर्सल कराते हैं जब तक कि सीन में जान न आ जाए।
- संवेदनशीलता: संवेदनशील कलाकारों के साथ डील करने का उनका तरीका अनूठा होता है।
- विजुअल ट्रीट: हर एक सीन पेंटिंग की तरह खूबसूरत नजर आए, इसके लिए वे घंटों काम करते हैं।
रजा मुराद के मुताबिक, यही वह कारण है कि राज कपूर और संजय लीला भंसाली की फिल्में इतिहास के पन्नों में अमर हो जाती हैं। आज के समय में इस तरह के निर्देशक बहुत कम देखने को मिलते हैं जो सिर्फ कमर्शियल सफलता के पीछे न भागकर अपनी कला के साथ पूरी तरह न्याय करते हैं।
संवेदनशील कलाकारों को संभालना एक कला है
अभिनय की दुनिया में कलाकारों को बहुत ही इमोशनल और सेंसिटिव माना जाता है। ऐसे में उनसे काम निकलवाना हर किसी के बाएं हाथ का खेल नहीं होता। रजा मुराद का मानना है कि राज कपूर और भंसाली जैसे निर्देशक इस कला में माहिर हैं। वे जानते हैं कि किस अभिनेता की रग में क्या दौड़ रहा है और उससे किस तरह के इमोशन बाहर निकाले जा सकते हैं।
यही वजह है कि इन दोनों निर्देशकों के साथ काम करने वाले अभिनेता हमेशा से खुद को भाग्यशाली मानते आए हैं, भले ही इसके लिए उन्हें सेट पर काफी तनाव या डांट का सामना क्यों न करना पड़ा हो। रजा मुराद के इन खुलासों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सिनेमा के पर्दे पर दिखने वाली भव्यता के पीछे पसीना, खून और निर्देशकों का वह पागलपन होता है जो साधारण को असाधारण बना देता है।