मध्य प्रदेश के जंगलों से इन दिनों एक बेहद हैरान करने वाली और उतनी ही डरावनी खबर सामने आ रही है। प्रकृति के बीच इंसानी दखल और वन्यजीवों के बदलते व्यवहार का एक ऐसा ही जीवंत उदाहरण इन दिनों बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के इलाकों में देखने को मिल रहा है। यहां के एक बागी हाथी ने ऐसा तांडव मचा रखा है कि पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। इस हाथी का नाम 'जेन अल्फा' (Gen Alpha) रखा गया है, जो अपनी जिद और गुस्से के लिए अब वन्यजीव विशेषज्ञों के बीच भी चर्चा का विषय बन चुका है।
टाइगर रिजर्व से 70 किलोमीटर दूर गोरसरी घाटी में डेरा
मिली जानकारी के मुताबिक, जेन अल्फा नाम का यह विशालकाय हाथी अपने मूल रहवास यानी बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व की सीमा को पार कर चुका है। रिजर्व से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित गोरसरी घाटी में इस हाथी ने अपना नया ठिकाना बना लिया है। टाइगर रिजर्व से इतनी लंबी दूरी तय करके रिहायशी और जंगली इलाकों के बीच इस तरह से खुलेआम घूमना और डेरा जमाना यह साबित करता है कि इस हाथी के व्यवहार में कितना बड़ा बदलाव आ चुका है।
स्थानीय लोगों और वन विभाग के सूत्रों के अनुसार, जब यह हाथी गुस्से में होता है तो इसे रोकना नामुमकिन सा हो जाता है। इसकी नाराजगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाल ही में एक घटना के दौरान यह लगातार 12 घंटे तक बिना रुके चलता रहा और अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को तहस-नहस करता गया।
12 घंटे का नॉन-स्टॉप तांडव और एक की जान
गुस्से से भरे इस हाथी का यह सफर सामान्य नहीं था। अपनी इस लंबी और आक्रामक यात्रा के दौरान इसने एक बेकसूर की जान भी ले ली है। इस घटना के बाद से स्थानीय ग्रामीणों में भारी रोष और डर का माहौल है। लोग अपने घरों से बाहर निकलने में भी डर रहे हैं। किसानों ने अपने खेतों की ओर जाना बंद कर दिया है, क्योंकि किसी को नहीं पता कि यह बागी हाथी कब किस दिशा से आ धमके।
वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यह हाथी पहले भी बेहद आक्रामक रवैया दिखा चुका है। अपने अब तक के सफर में यह हाथी तीन बेकसूर इंसानों की जान ले चुका है। बार-बार इंसानी बस्तियों की ओर रुख करना और हमलों को अंजाम देना इसे एक बेहद खतरनाक वन्यजीव बना देता है, जिस पर तुरंत नियंत्रण पाना बेहद जरूरी हो गया है।
कौन है यह 'जेन अल्फा' हाथी?
वन्यजीव प्रेमियों और विशेषज्ञों के मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि इस हाथी का नाम 'जेन अल्फा' क्यों पड़ा और इसका ऐसा आक्रामक बर्ताव क्यों सामने आ रहा है। जानकारों का मानना है कि हाथियों के झुंड से अलग होने के बाद कई बार नर हाथी अत्यधिक आक्रामक हो जाते हैं। 'मस्त' की स्थिति या फिर अपने ही झुंड के अन्य हाथियों के साथ संघर्ष के बाद जब ये अकेले पड़ जाते हैं, तो इनका व्यवहार अनिश्चित और खतरनाक हो जाता है।
इस हाथी के मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है। यह अकेला घूम रहा है और किसी भी इंसानी आहट या बाधा को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है।
वन विभाग की कड़ी मशक्कत और काबू पाने की कवायद
गोरसरी घाटी में हाथी के डेरा जमाने की सूचना मिलते ही मध्य प्रदेश वन विभाग और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व का अमला हरकत میں आ गया है। हाथी की हर एक गतिविधि पर सैटेलाइट और ड्रोन कैमरों के जरिए कड़ी नजर रखी जा रही है। मौके पर विशेष दल को तैनात किया गया है, जो लगातार यह रणनीति बना रहा है कि इस भारी-भरकम और गुस्से से भरे जानवर को सुरक्षित तरीके से कैसे काबू में किया जाए।
- विशेष ट्रैनर्स और महावतों की मदद: हाथी को नियंत्रित करने के लिए अन्य प्रशिक्षित हाथियों (कुमकी हाथियों) और अनुभवी महावतों की मदद ली जा रही है।
- गाइडलाइंस और अलर्ट: आसपास के दर्जनों गांवों में मुनादी करवा दी गई है कि लोग जंगलों की तरफ बिल्कुल न जाएं और सुरक्षित स्थानों पर रहें।
- सेफ रेस्क्यू ऑपरेशन: विभाग की प्राथमिकता यह है कि बिना किसी अन्य नुकसान के हाथी को या तो वापस जंगल के गहरे इलाकों में खदेड़ दिया जाए या फिर उसे सुरक्षित ट्रेंकुलाइज (बेहोश) कर रेस्क्यू किया जाए।
इंसान और वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती चुनौती
यह घटना एक बार फिर इस गंभीर मुद्दे को सामने लाती है कि इंसान और वन्यजीवों के बीच का संघर्ष लगातार विकराल रूप धारण कर रहा है। जंगलों का दायरा सिकुड़ना और वन्यजीवों के कॉरिडोर में इंसानी दखल इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं। जब प्राकृतिक रास्ते बाधित होते हैं, तो वन्यजीव भटककर रिहायशी इलाकों की तरफ आ जाते हैं, जिसका खामियाजा दोनों पक्षों को भुगतना पड़ता है।
फिलहाल, वन विभाग की टीमें गोरसरी घाटी में डटी हुई हैं और आने वाले कुछ घंटे इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन के लिहाज से बेहद अहम होने वाले हैं। हर कोई यही दुआ कर रहा है कि यह अभियान सुरक्षित रूप से पूरा हो जाए ताकि आगे किसी भी तरह के जान-माल का नुकसान न हो सके।